मजबूरियों और भीतर के अंधकार की कहानी
प्रियम्वदा,
दिनभर का रूटीन तो यही है, सवेरे उठकर ऑफिस पहुंचो, शाम होते ही घर भागो.. इसी बीच कुछ ऐसी बात ढूंढो, जिस पर यह शाम की दिलायरी निभ जाए। कईं बार दिनभर में इतनी सारी घटनाएं घटित हो जाती है, कि समझ ही न आए, कि आज मुद्दा क्या है? या फिर सरल तरीके से कहूं तो, ऐसा भी होता है, कि आपने सोचा हो, आज तो बिल्कुल खाली दिन है, आराम ही आराम, लेकिन न तो दोपहर से पहले आराम मिले, न ही दोपहर के बाद। गुरुवार ऐसा ही बीता है। सोचा कुछ और था, हुआ कुछ और ही है। जरा सा भी फालतू समय न मिल पाया। वैसे भी फालतू समय मे रील देखने के शिव सूझता भी क्या ही है। सवेरे से लेकर शाम तक बस काम काम काम.. हाँ ! बस रात को घर जाने से पहले सुरा का एक गिलास मिल गया..!
जिम्मेदारियों का बोझ और अधूरी तृप्ति
एक गिलास ही काफी था, सोचा था, किक लग जाएगी.. लेकिन नहीं.. तुम्हें क्या कहूँ.. कईं बार ऐसा हो चुका है। भरी महफ़िल से प्यासा उठ जाता हूँ। यही भाग्य है मेरा.. कुछ अपराधबोध आड़े उतर आता है, तो कुछ जिम्मेदारियों का डर। कुछ बोझ भी तो होतें है, जो नशे को फन उठाने नहीं देते। मेरे भी अपने कितने पर्दे है, सबको ही संभाले रखना पड़ता है। तुम्हे कैसे बताऊं, कुछ गांठ गले पड़ी है, कुछ सालों में ही मुझे बूढा कर गयी है वह..! कुछ धागे उलझते है, तो रेशम का कपड़ा बुनता है। लेकिन कुछ गांठें पड़ जाती है, तो पूरा ताका बिगाड़ जाती है। कुछ गलतियां हो जाती है, जिनका कोई इलाज नहीं होता। वह हमेशा ही चुपचाप सहते रहना पड़ता है। कोई न कोई एक गलती ऐसी होती है, जो हमेशा हमारी नजरों के आगे तैरती है… हम लाख भूलना चाहे, लाख सुधारना चाहे, लेकिन उसका कोई भी समाधान नहीं।
गलती, अपराधबोध और जीवनभर की गांठें
जैसे किसी अकस्मात के बाद चोट की गंभीरता को देखते हुए, एक अंग का ही बलिदान करना पड़ता है, ताकि जान बची रहे। लेकिन फिर वह जीवनभर की खोट रह जाती है। जान बचाने के लिए कुर्बान किया हुआ अंग जीवनभर खलता है। उसकी अहमियत हमेशा महसूस होती है। लेकिन उसे हटा देना जरूरी होता है, वरना विष पूरे शरीर मे फैलता है। ऐसा ही कुछ रिश्तों में भी होता है, या फिर किसी फल की टोकरी का एक सड़ा हुआ फल.. सारी टोकरी बिगाड़कर रख देता है। मजबूरी बड़ी बुरी बला है प्रियम्वदा। हमें कभी भी अपनी क्षमताओं को, अपने बल को आजमाने नहीं देती। मैं कितने ही प्रयास करूँ, एक दिन आएगा, जब यह सब्र का बांध टूटेगा, और सब कुछ ही तहसनहस हो जाएगा। मैं चाहता तो हूँ, कि ऐसा कभी न हो। मेरी पूरी कोशिश है, मैं अपनी नियंत्रण शक्ति से समझौता न करूं।
भीतर का अंधकार और उसका फैलता सन्नाटा
कुछ सत्य टाले नहीं टलते। जैसे अंधेरे को आवश्यकता नही किसी पर निर्भर होने की। प्रकाश की मर्यादा है, ध्वनि की मर्यादा है, दृष्टि की मर्यादा है, पर अंधकार की कोई मर्यादा नहीं। जहां कुछ भी नहीं, वहां घना अंधकार तो है ही..! मैं अपने भीतर के उस अंधकार को बांधे रख सकता हूँ, लेकिन कितने दिन?
प्रियम्वदा ! मैं कुछ प्रश्नों का निराकरण चाहता जरूर हूँ, लेकिन उन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं है। 'यदि' और धारणाओं के बांध पर निष्कर्ष निकलता है, लेकिन सत्य के समीप। पूर्ण नहीं। मुझे पूर्णता चाहिए उत्तर की। दशमलौत मेरे उत्तर का समाधान हो सकता है, उत्तर नहीं। मैं कुछ बन्धनों की बेड़ियों से निकलना चाहता हूँ, लेकिन खुद की असमर्थता के ऊपर नहीं। मुझे पता है, परिणाम क्या हो सकतें है, क्या क्या घटनाक्रम निर्माण होंगे, क्या क्या परिस्थितियां उत्पन्न होगी.. मैं कायर हूँ।
भाग्य, फैसले और उठती निराशा
कुछ लोग जीवन मे ऐसे टकराते है, कि कंपनो का एक चैन रिएक्शन शुरू हो जाता है। जो कभी रुकता नहीं। उस रिएक्शन को रोकने से आगे आने वाले सारे समीकरण बदल जाते है। मैं मानता हूँ, मेरे भाग्य ने कभी मेरा साथ नहीं दिया, या यूं कहूँ कि मैंने कितने ही गंभीर फेंसलें यूँही हंसी-मजाक में लिए है, कि अब उन फैंसलों का परिणाम मेरे लिए असह्य हो चुका है। मजबूरी कही थी मैंने उसे, वास्तव में यह मजबूरी तो नहीं है, उससे आगे है। मैं हररोज उठता हूँ, फिर से उन्हीं मजबूरियों के सामने खड़े होने की हिम्मत करता हूँ। लेकिन कब तक? इसका अंत भी शायद मेरे साथ होगा? निराशा के शिखर पर हूँ मैं। किससे कहूं? किससे फरियाद करूँ? फरियाद करने जितना मेरा अपना पक्ष भी सही है? और मेरी फरियाद सुने कौन? वे.. जो फरियादी के विपक्ष में बैठे हो?
तीसरा रास्ता : अकेली यात्रा, अपनी ही छाया संग
कितना आसान होता अगर समस्याएं सरल होती.. कितना आसान होता, हिम्मत ही न होती किसी मे भी। कितना आसान होता अगर प्रेम को आत्मसात किया जा सकता। कितना आसान होता अगर बातों में कटुता न होती। लेकिन कुछ भी आसान नहीं है। हमेशा हमारे सामने तीन रास्ते होतें है। एक पर कोई जा रहा है, एक से कोई आ रहा है, और एक वह रास्ता जिसे हम चुनते है.. अपनी नासमझी में। जिसपर बहुत लोग चल कर गए थे, लेकिन उस पथ का अनुभव किसी ने लिखा नही। उस रास्ते को किसी ने सराहा नही। हम वह रास्ता चुनते है, जिसे हम सही मानते है। और फिर अपनी चेतना से अनुभव को संजोने में लग जाते है। उस तीसरे रास्ते पर सहयात्री कोई नहीं मिलता। क्योंकि वहां अकेलापन ही अपना साथी होता है।
पुरुष होने का बोझ और प्रतिदिन का धीरे-धीरे दिया गया विष
जानता हूँ प्रियम्वदा, बहुत बेढंग बातें बताई है, लेकिन क्या करूँ.. मजबूरियां यहां भी आड़े उतरती है। पुरुष होने का अहम आड़े आता है। मैं बहुत कुछ करना चाहता हूँ, लेकिन मजबूरियां कहूँ या भाग्य.. मुझे बांधे रखता है, अपने पाश से, मुझे हररोज थोड़ा थोड़ा कर विष पिलाया जाता है, मैं गटक जाता हूँ। हररोज सुबह फिर से नए विष से परिचय बांधने। यही होता आ रहा है, यही होता रहेगा। मुझे अपने विष से खुद ही लड़ना है, यही प्रारब्ध की घोषणा है। सबको जीवित रहने के लिए संघर्ष करना होता है, मैं भी कर रहा हूँ।
शुभरात्रि।
०४/१२/२०२५
|| अस्तु ||
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