सब्र की उम्र लंबी होती है
प्रियम्वदा !
खाली दिन.. बिलकुल ही खाली..! सवेरे से बस थोड़ी साफ़-सफाई जैसा काम ही किया है। ऑफिस पर ज्यादा काम न होने से, इतने दिनों से इकठ्ठा हुए सारे दराज खाली किये, और जरुरी कागज़ात जिन अलग अलग फाइलों के थे, उन्हें सौंप दिए। लगभग दो महीने से दराज ओवरफ्लो हो रहे थे। लेकिन अब सारा सॉर्ट-आउट हो चूका है। ऐसा ही कुछ मन का प्रियम्वदा ! समय समय पर मन का भार भी सॉर्ट-आउट करते रहना चाहिए। मन जब भी खाली हो जाए, तो मजा बड़ा आता है।
एक खाली दिन और अनगिनत ख़याल
सवेरे फिर एक नया परिचय मिला.. कुछ परिचय सिमित होते है, बस चेहरे से चेहरे तक। उन्हें और कोई खैर-खबरों की पड़ी न होती है। जगन्नाथ से दूकान जाते हुए उस परिचित ने मेरे अकस्मात की कहानी मेरी जुबानी सुनी। और इस अकस्मात् से मिलते जुलते अन्य प्रसंगों की गाथाएं सुनाई गयी। साढ़े नौ बज रहे थे, ऑफिस के लिए लेट हो रहा था, कार स्टार्ट करते ही डिस्प्ले पर चित्र बना दिखा, "फ्यूल लॉ".. मानो कार जैसे स्पष्टता से कह रही है, पहले पीला, फिर चला।
ऑफिस पर आज न बराबर काम था, और आने वाले कुछ दिन ऐसे ही बीतने वाले है। सवेरे से बस टाइमपास ही कर रहा था। थोड़ा बहुत काम निपटा लेने के बाद इतना ज्यादा खाली समय मिला था, जिसका सदुपयोग मैंने न बराबर किया। कुछ लिखने के लिए विषय मिल जाता तो, काफी मजेदार हो जाता।
इंतज़ार की वह स्याही जो ज़िंदगी लिखती है
फ़िलहाल मुझे कुछ इंतजार की घड़ियां गिननी है। एक तरफ मेरी बाइक है, एक तरफ सेलरी है, एक तरफ इंस्टॉलमेंट्स.. वह रील बड़ी सही थी, हमें इंतजार होता है, कब पैसे आये, और कब गए.. पीछे क्या बचा? जो बचा वह हमारे अन्य खर्च में निकल जाता है। प्रियम्वदा ! जीवन पूरा ही एक मैनेजमेंट है। या फिर यूँ कहूं की एक सेटलमेंट है। जमा-उधार, लेना-देना, पाना-खोना.. इन सब में ही सारा जीवन खपत हो जाता है।
कुछ लोग गलत कदम उठा लेते है। कमजोर होते है.. अरे एक बार में ही निपट गए तो क्या ख़ाक निपटे.. जीवन तो ऐसा होता है, कि हररोज महसूस होना चाहिए, धीरे धीरे निपट जाने का। निपटने का वास्तविक मजा चाहिए तो प्रेम करो.. अरे प्रेम करने लायक कोई भी न मिले तो कुत्ते से करो.. कुत्ता कहीं खो जाने पर मैंने कितने ही लोगों को आंसू बहाते देखा है। वह कुत्ता, जो कभी अपने मालिक को भी काट लेता है। अश्व या गाय जैसे पशु ऐसा कभी नहीं करते।
प्रेम, पशुता और पागलपन की धुंध
प्रियम्वदा ! प्रेम और पशुता में ज्यादा अंतर नहीं है। प्रेम में इंसान पशु जैसा ही व्यवहार करता है। सुधबुध खो बैठता है न.. और पशु तो हिंसक भी होते है। तो कुछ प्रेमी भी हिंसा पर उतर आते है। पशु को काबू में किया जा सकता है, प्रेमी को चुनवाया जा सकता है। पशु का दोहन हो सकता है, प्रेमी का भी होता है, साहित्य के रूप में। ज्यादातर साहित्य यह प्रेम जगत वालों का ही दिया हुआ है। पशु कूटे जाते है, प्रेमी भी। पागल पशु को क़ैद करना पड़ता है, पागल प्रेमी को भी।
खेर, मैं सोच रहा था, कि प्रेम का मीटर होता तो कितना सही रहता.. कितने ही आशिकों की खड़े खड़े रुसवाई होती। कितने ही प्रेमी प्रेम में पड़ने से पूर्व सौ बार सोचते। और झूठ बोलना तो अपने आप पकड़ा जाता। कितने ही आशिक़ों का बिनबोले त्राटक रच जाता। कितने ही आशिक़ों को इज़हार ही न करना पड़ता। इतने सारे फायदे, लेकिन नुक्सान एक ही.. उनके लिए ज्यादा नुकसान होता, जिनकी पसंदगी का क्षेत्र किसी एक पात्र पर निर्भर नहीं है। जिनका दिल मोर (MORE) मांगता है। कईं लोग होते है, जिन्हे बहुत सारे लोगों की अलग अलग खूबियां पसंद आती है।
वैसे यह प्रेमोमीटर फिर हैक भी किया जाता। एक दूसरे के राज़ जानने के लिए। या फिर कोई बिगड़ चूका प्रेमोमीटर रिकवरी भी करवाता, क्या सही सिस्टम होता, बैकअप लेने वाला। ब्लॉक करके अदृश्य हो चुके लोगों की तस्वीर हमेशा बैकअप फाइल में जरूर से रहती। मुझे तो लगता है, यहाँ भी प्रेमोमीटर बनाने वाली कंपनियां कॉम्पेटेशन में उतरती। किसी कम्पनी के प्रेमोमीटर में विसुअल डाटा भी स्टोर होता, तो किसी कम्पनी के प्रेमोमीटर में ऑडियो+विडिओ दोनों। कल्पना है, लेकिन कितनी सही है।
प्रियम्वदा ! वैसे यह टाइमपास के लिए लिखा था, लेकिन बात तो पते की है। बहुत सारे रिश्ते इस लिए भी नहीं बनते है, क्योंकि किसी ने भी इज़हार करने का जिगर नहीं किया था। और कुछ बेमेल शादियां भी इसी कारण से निभ जाती है, कि कोई भी उस रिश्ते को तोड़ने की बात नहीं बोल पाता। अपने समाज में, अपने आसपास ही कितने ही किस्से है, जहाँ बस 'न कह पाने' के कारण लोग एक छत के तले बसते है। मुझे तो लगता है, यह जिगर की कमीं भी कितनी अच्छी है, कितने ही लोग नूतन कल्पनाओं को बुनते है।
घड़ी, यादें और लौट न आने वाला कल
अँधेरा घिर चूका है बाहर, मशीनों का कर्कश स्वर अभी भी कानों को चिढ़ाता है। मेरे हाथ की यह घड़ी जिस दिन मैं गिरा था, उसी दिन से बंद पड़ी है। फिर भी मैं पहनता हूँ। समय नहीं देखना होता मुझे, बस हाथ को यह अहसास दिलाने के लिए, कि वह खाली नहीं है, अकेला नहीं है। अकेलेपन का जब अहसास होता है, तब यह घड़ी मुझे कुछ न कुछ विचार देती है। एक ही यंत्र से जुडी है यह तीनों सुइयां, लेकिन बस कुछ देर के लिए ही नजदीक आती है, और फिर आगे बढ़ जाती है।
आगे बढ़ते रहना, या पीछेहठ करना - दोनों ही घड़ी के वश में है। कईं बार बंद घड़ियां जब चालु होती है, तो वे समय से आगे होती है। उन्हें वापिस लाना पड़ता है, अभी के काल खंड में। वापिस लाना, या लौट आना आसान कहाँ है? वर्षा स्वयं पुरे एक वर्ष का इंतजार करवाती है, लौट आने के लिए। बसंत लौटने में उतना ही समय लेता है, जितना पतझड़। शब्द नहीं लौटते, न ही नदियों का नीर, और नहीं लौट पाता है वह समय, जहाँ स्मृतियाँ क़ैद की गयी होती है। सुख दुःख के बादलों की बात अलग है, वे लौटते है, लेकिन तब भी वह कभी नहीं लौटता जिनकी हमें तलाश होती है।
तुम्हे पता है प्रियम्वदा ! वे शब्द तो कतई नहीं लौटते, जिन्हे हम दफना चुके हो, अपने ही भीतर कहीं.. क्योंकि उन्हें लौटता देखना ही नहीं चाहते, संयोग या परिस्थिति अब कुछ भिन्न होती है।
शुभरात्रि।
०३/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
अगर यह इंतज़ार आपको अपना सा लगा हो, तो इसे किसी ऐसे शख़्स तक ज़रूर पहुँचाइए जो आज भी समय से पहले टूट रहा है।
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