मोहभंग, बाइक एक्सीडेंट और एकतरफा प्रेम | दिलायरी
प्रियम्वदा !
मोहभंग हो जाना भी आम बात ही है। कईं बार हमें मोहभंग होता है। कभी किसी वस्तु से, तो कभी किसी व्यक्ति से। मैं अपनी ही बात करूँ.. तो मुझे यह लगता है, कि मुझे जितनी ही चीजों या व्यक्ति से मोह बाँधा था, वह तमाम मुझसे बड़ी जल्दी दूर हो चुके है। या फिर मुझे ही हानि पहुंचा गए है। यह एक दृष्टिकोण है। इसे भले उदेश्य से समझूँ, तो मुझे अलप समय के लिए खुशियां भी दे गए है। लेकिन मुझे लगता है, अलप खुशियां से बेहतर है, एक लंबी मौज.. अनंत मौज..
अलिप्त रहने की कोशिश — और दिल की हार
प्रियम्वदा ! मैं जब भी अपनी बात लिखता हूँ, तो कुछ हद तक प्रोटेक्टिव हो जाता हूँ, मैं चाहता हूँ, मेरे बारे में ज्यादा धारणाएं न बाँधी जाए। अलिप्त रह पाना, या फिर किसी को भी मेरी पसंदगी का पात्र न बनने देना, मैंने बहुत समय तक यह दिवार को मजबूती से बांधे रखा था। लेकिन बहुत मुश्किल काम है यह। समय समय पर चाहनाएं बदल जाती है। कभी यहां कभी वहां पसंदगी का पात्र बदला जाता है। और जब समय और संयोग आघात करते है, सारी पसंद, सारी चाहत, सारा मोह टूटकर बिखर जाता है।
टूटी बाइक और एक लंबा रास्ता
खेर, आज सवेरे उठकर तय किया कि आज बाइक को रिपेयर करवा लेता हूँ। मैंने सरदार को इन्फॉर्म कर दिया, और अपने घायल वाछटीया को लेकर निकल पड़ा। घर से निकलकर सीधा जगन्नाथ। वहां से दुकान, और वहां से मार्किट की ओर चल दिया। बाइक चल तो रही थी, लेकिन हेंडल का दाहिना सिरा यानि की एक्सेलरेटर तो बिलकुल ही नजदीक, और बांया सिरा यानि की क्लच बड़ी दूर थी। सोसायटी से निकलते ही हाईवे आ जाता है, इतना अच्छा था, क्योंकि बाइक लेफ्ट साइड तो मुड़ सकती थी, राइट साइड मुड़ती नहीं थी।
बीस की रफ़्तार से चलती ज़िंदगी
राइट साइड मुड़ने के लिए पहले थोड़े लेफ्ट मुड़ो, फिर सीधी करके रिवर्स लो, फिर लेफ्ट मुड़ो, और फिर सीधी करके रिवर्स लेने पर राइट साइड मुड़ सकते थे। सुबह सुबह टूटी हुई बाइक लेकर निकलना दिल कचोट रहा था। मात्र बीस की स्पीड से चलते हुए आखिरकार मार्किट पहुंचा। यामाहा के शोरूम पर भीड़ लगी थी। मुझे कोई जल्दी नहीं थी। मेरी बारी आयी, और मैंने एस्टीमेट बनवाया। एस्टीमेट की रकम देखकर मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ, कि मैं बाइक का इन्शुरन्स करवाना कैसे भूल गया..?
आलस के मारे मैं टालता रहा था। यूँ तो मोटरसाइकिल बेचते समय यह विभिन्न कंपनियां पांच वर्ष का इन्शुरन्स देती है। लेकिन बाइक का सेल्लिंग प्राइस कम रखने के लिए इन्शुरन्स को डिवाइड कर देते है। 1 + 4 .. माने 1 वर्ष के लिए फर्स्ट पार्टी इन्शुरन्स। और बाकी चार साल का थर्ड पार्टी इन्शुरन्स होता है। मैं आलस में रह गया था, पिछले अप्रैल में जब फर्स्ट पार्टी इन्शुरन्स खत्म हुआ, तो मैंने सोचा था, मार्किट में जाकर आते-जाते हुए रिन्यू करवा लेंगे। लेकिन वह रिन्यू करवाने वाला दिन कभी आया नहीं। उससे पहले यह दुर्घटना हो गयी।
इंश्योरेंस की एक भूल, और पंद्रह हज़ार का सबक
मैंने यह भी सोचा था, कि मैं हमेशा बड़े केयरफुल तरिके से वाहन चलाता हूँ। तो क्या ही समस्या हो जाएगी मुझे? मैं अपने वाहन का ध्यान भी खूब रखता हूँ। इस चक्कर में आलस लम्बी चल गयी। वह पंद्रहसौ का इन्शुरन्स रिन्यूअल आज पंद्रह हजार में पड़ेगा। यामाहा वालों से नाराज होकर मैं आफ्टर मार्किट रिपेयर वर्क की तलाश में निकला। टूटी हुई बाइक जब घर से शोरूम तक आ सकती है, तो मार्किट के और भी गैरेज तक जा सकती है। दो-तीन जगह मैंने तलाश की, लगभग जगह यही कॉस्ट पड़ रहा था। तो फिर शोरूम ही क्या गलत? कम से कम बाइक में चेंज होने वाली वस्तु तो यामाहा की मिलेगी?
शौक और जेब — एक ही घर में नहीं रह सकते
एक बात और मुझे अच्छे से समझ आ गयी। आदमी या तो शौक पाल सकता है, या फिर जेब.. दोनों एक साथ नहीं रह सकती। मुझे मोह था इस बाइक से। आज टूट गया। क्योंकि यह जो रिपेयरिंग कॉस्ट बन रही है, उतने में तो स्प्लेंडर बिलकुल ही नई बन सकती है। मेरा सारा मोह तब और बिखर गया, जब मैंने यह बाइक जमा करवाई, और उन्होंने बताया की, मडगार्ड नहीं बदला जा सकता, और टैंक कवर भी। दोनों में अच्छा खासा डेंट दिखाई पड़ता है। वाछटीया अच्छा खासा घायल हुआ है।
पुष्पा का फ़ोन और ऑफिस की थकान
खेर, बाइक जमा करवाते ही पुष्पा का फोन आया, उसे टेंशन यह थी, कि कहीं मैं छुट्टी पर न होऊं। वरना आज उस पर बहुत ज्यादा काम का भार आ जाता। वह भी ऑफिस के काम से मार्किट में घूम रहा था। तो मैं उसके ही साथ ऑफिस आ पहुंचा। दोपहर बाद कईं सारे हिसाब-किताब के काम निपटाने थे मुझे। और कब यह साढ़ेसात बज गए मुझे पता भी नहीं चला। मन में अभी भी यही विषाद है, कि आखिर कब तक मेरे साथ यही होता रहेगा, जिसे मैं पसंद करता हूँ, वह मेरे भाग्य में क्यों नहीं होता। जिसे मैं अपना करना चाहता हूँ, वह कभी मेरे अधीन क्यों नहीं रहता। जिसे मैं चाहता हूँ, वह मुझसे दूर ही क्यों हो जाता है?
क्यों हमेशा वही दूर हो जाते हैं जिन्हें चाहा?
छोडो प्रियम्वदा ! यह शब्द भी तुम तक कहाँ पहुँचने वाले है। क्योंकि तुम्हे भी तो मैंने पसंद किया होगा। तभी तो यह एकतरफा पत्र व्यवहार चलता है। यहाँ से शब्द निकलते है। लेकिन अपने पते तक पहुँचते नहीं। वह बंद कवर कभी खुल नहीं पाएगा। शायद असमय है। असमय ही रहेगा। कुछ लिफ़ाफ़े कभी खुलते नहीं। या फिर कुछ खुले खत पढ़े तो जाते है, रस्ते भर पढ़े जाते है, लेकिन अपने पते तक कभी नहीं पहुँचते। उन पत्रों का यूँही भटकते रहना ही उनका भाग्य है। सदैव से था।
मोहभंग और मेरा रिश्ता बचपन से चला आ रहा है। पता नहीं मेरी इस लेखनी से कब मेरा मोहभंग होगा.. वह दिन होगा, नीरस.. बिलकुल ही किसी गंधहीन मोगरे सा। वह दिन शायद ढलेगा नहीं, बस विलीन हो जाएगा, जैसे सुबह की औंस विलीन हो जाती है। वह दिन मुश्किलों से भरपूर न होगा, बस एक रूकावट आएगी, और स्तब्धता छा जाएगी। पता है तुम्हे, उस दिन में भी इस लेखनी की इंक न खत्म होगी, न ही कीबोर्ड की खटखटाहट, उस दिन ख़त्म होगा कुछ, तो वह होगी मेरे मन की दिशा.. वह दिशा, जहाँ से यह शब्द किसी कोंपल की भाँती उगते है, और विशाल वटवृक्ष की भांति विस्तारित होते है।
वह दिन जब शब्द भी चुप हो जाएँगे
यह मोहभंग की प्रक्रिया का एक भाग होगा, कि मैं तुम्हे न पुकारूँ.. जैसे नहीं पुकारता है, समंदर कभी भी नदियों को। जैसे नहीं पुकारते पवन लताओं को। जैसे नहीं पुकारती मद्य किसी होंठ को। हाँ ! शायद वैसी ही किसी पुकारहीनता से लिप्त हुआ मैं स्तब्ध हुआ किसी दृश्य में तल्लीन होऊंगा। वह दृश्य जहां, एक चित्र है, लेकिन कागज़ बेरंग है। उस चित्र में कोई भी रेखा नहीं है। बस बेदाग़ वह कोरा कागज़, जिसपर एक भी कल्पना महेरबान न हुई होगी।
शुभरात्रि।
०१/१२/२०२५
|| अस्तु ||
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