“The Family Man Season 3 Review: प्रियम्वदा, अधूरे प्रश्नों के बीच एक पूरा दिन | दिलायरी : 10/12/2025”

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दिमाग और मूड—फिल्मों का असर

    प्रियम्वदा !

    मूवीज देखो... मूड बगैर माहवारी के भी चेंज हो जाता है। बशर्ते मूवी ढंग की हो.. अन्यथा लेने के देने पड सकते है। कल और आज मिलाकर दो दिन में मैंने फॅमिली मन का सीजन 3 देख लिया। एंडिंग को छोड़ देते है, तो एक बढ़िया तोड़फोड़ मूवी है।


“Cartoon character watching Family Man Season 3 on mobile with a plain white background.”

आत्मचेतना, ईश्वर और भीतर की उलझनें

    प्रियम्वदा ! आज सवेरे साढ़े सात बजे अपने आप उठ गया। जब किसी पर निर्भरता खत्म होने लगे, तब चेतना स्वयं हमें जागृत कर देती है। मन में बस चिंता होनी चाहिए। नचिंत व्यक्ति को किसी की परवाह नहीं होती, अपने आप की भी नहीं। बड़े खतरनाख होते है यह नचिंत व्यक्तित्व वाले लोग.. कब कहाँ बरस पड़े, पता नहीं लगाया जा सकता। सवेरे जगन्नाथ तो तब भी नहीं जा पाया। कोई अन्य कारन फिर से मुझे लेट कर गया। वैसे भी मैं ठीक होता हूँ, तो मतलबी होता हूँ। मुझे ईश्वर सिर्फ अपनी समस्याओं में याद आते है। मैं मदद मांगने नहीं जाता, उन्हें कोसने जाता हूँ। शायद नास्तिक होता जा रहा हूँ, या नास्तिक होता दिख सकता हूँ। 


‘फैमिली मैन’ सीजन 3—मेरी सीधी-सादी समीक्षा

    ऑफिस पहुंचकर ज्यादा काम न होने से बीते कल की शिड्यूलेड़ दिलायरी शेयर कर दी। और फिर मोबाइल लेकर बैठ गया। फेमिली में सीजन 3 के दो एपिसोड पुरे करने बाकी  थे। बड़ी ही धांसू लगी मुझे तो यह सीरीज़.. बस खाली एंडिंग में एक प्रश्न न छोड़ देते। चलो पूरी कहानी ही लिख डालता हूँ। 


पहले दो सीजन की चमक

    पहली सीजन में श्रीकांत तिवारी, इस कहानी का मुख्य नायक, जूझ रहा था। कभी अपने परिवार को लेकर, तो कभी अपनी ड्यूटी को लेकर। बिलकुल सटीक करैक्टर था, एक जासूस.. जो देश के भीतर रहकर बड़े बड़े संकटों का सामना करता है। और साथ ही अपने बिखरते परिवार को भी संभालने की कोशिश करता है। पहली सीजन में वह उत्तर भारत में होती इन्सर्जन्सी को रोकने में समर्थ रहता है। साथ ही अपने परिवार को भी संभालता जाता है। दूसरे सीजन में दक्षिण भारत के मुद्दे के साथ आयी इस सीरीज़ ने वाकई दमदार असर छोड़ी थी। छोटे छोटे डायलॉग में पंचलाइन जैसी कॉमेडी भी, और धमाकेदार एक्शन भी..!


इस सीजन की कमियाँ और खूबियाँ

    इस तीसरी सीजन में श्रीकांत एक फुल टाइम स्पाई बन गया लगता है। इस सीजन में वह पहले की तरह फेमिली को संभालता तो है, लेकिन वो पहले वाला मजा नहीं दिखा। जो छोटे छोटे सीन में कॉमेडी होती थी, वह मिसिंग थी। फिर भी मेरे लिए तो काफी मजेदार और रोचक लगी यह सीरीज़। खासकर जयदीप अहलावत के डायलॉग काफी जोरदार रहे। वेब सीरीज़ है, इस लिए गालियों पर तो कोई नकेल कसी नहीं है। इसी सीरीज़ में श्रीकांत और सुचित्रा डायवोर्स भी लेने जा रहे थे। वैसे इस सीजन में कॉमेडी तो श्रीकांत के लड़के ने थोड़ी बहुत जरूर डाली है। 


    श्रीकांत और उसका परिवार जब अंडरग्राउंड हुआ, और रेलवे के एक कोच में सफर करते हुए जब श्रीकांत की लड़की धृति, श्रीकांत को समझाती है, डाइवोर्स न लेने के लिए। तब श्रीकांत कहता है, "बेटा ! तुम नहीं समझोगी.. शादी बड़ी टेढ़ी खीर है।" बात तो सही भी थी.. श्रीकांत को अहसास था, वह समझ पा रहा था, विवाह जैसे बंधन में दोनों पक्षों की जिम्मेदारी बनती है, संबंध को टिकाये रखने में। एक तरफ इस सीरीज़ का विलन जयदीप अहलावत यानि की रुक्मांगद भी एक सिन में शादी के बारे बात करता है, खलनायिका भी कहती है, कि "शादी एक स्कीम है, लोगो को होम लोन बेचने के लिए।"


    इस सीरीज़ में नागालैंड पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया गया है, और पूर्वोत्तर राज्यों में होती इन्सर्जन्सी, म्यांमार बॉर्डर से होती स्मगलिंग, जैसे विषयों पर बखूबी से काम किया गया है। सातवे एपिसोड में कुछ प्रश्न अधूरे छोड़ गयी यह सीरीज़। वेब सीरीजों का मुझे यह गन्दा मामला लगता है। यह अधूरे प्रश्न वाला मामला बाहुबली को कटप्पा ने क्यों मारा वाले मीम से शुरू हुआ है। बहुत सारी ऐसी वेब सीरीज़ आती है, जो अंत में एक उत्सुकता छोड़ जाती है, अगले भाग में क्या हुआ यह जानने की। जबकि अगला भाग एक- दो साल का समय खा जाता है। 


कहानी के अधूरे प्रश्न

    इस फिल्म में मजेदार सिन एक यह भी लगा था, कि रुक्मांगद जैसा खूंखार और भावनाविहीन पात्र भी, अपनी प्रेमिका के मरने के बाद, उस प्रेमिका के लड़के को अपनी खुद की संतान न होने के बावजूद अपना लेता है। एक ममत्व बंध जाता है, उसका उस लड़के के साथ। उस सिन में एक छिपी भावना भी प्रकट होती है, जब जयदीप उस अनाथ लड़के को उसकी प्रेमिका के पिता के पास छोड़कर जाने लगता है। 


    अंतिम एपिसोड में अधूरे प्रश्न यही छोड़ दिए गए कि श्रीकांत को पेट में गोली लगी थी, वह म्यांमार में ही बेहोश हो गया था। जयदीप यानी रुक्मा भी जीवित ही बच गया, और भागने में सफल रहा। ISI वाले एजेंट ने गोली किसे मारी? और डिफेन्स वाली डील सफल हुई या नहीं? यह सब प्रश्न उत्सुकता को और बढ़ा देते है, और थोड़ा निराश भी करते है, क्योंकि जब पचास मिनिट से अधिक वाले सात एपिसोड देखे हो, और पता चले की कहानी अधूरी है..! इस कहानी का अंत अगले भाग में आएगा..! उतना मजेदार नहीं लगता। बल्कि मुझे तो गूगल करना पड़ा था, कि कहीं इसका आठवां एपिसोड मुझसे तो नहीं चूक गया। लेकिन गूगल ने हौंसला बंधाया, कि इस सीजन में सात ही एपिसोड थे। 


    सौ बात की एक बात.. मुझे मजेदार लगी थी यह कहानी.. बस खाली अंत भाग में अल्पविराम के बदले पूर्ण विराम लगा दिया जाता तो और मजा आ जाता। एक बात मुझे यह भी खली थी, कि इस पूरी सीरीज़ में कॉमेडी मिसिंग थी। विजय सेतुपति ने थोड़ा मजाक का मसाला छिड़का था, लेकिन पर्याप्त नहीं था। एक तो फॅमिलीमैन इस बार पुरे परिवार को लेकर भाग रहा था, यह भी घिसापिटा सिन लगता है। फेमिली को किडनेप कर लेना, और यह सब बातें पुराने समय से फिल्मोद्योग की कहानियों में रही है। 


जीवन के छोटे-छोटे दृश्य—गेंद, बचपन और दफ्तर

    खेर, आज का पूरा दिन बढ़िया गुजर गया। क्योंकि फ़ालतू बातें सोचने का समय न मिला। दिलायरी में भी न उतरेगी वे कलहपूर्ण बातें। दोपहर को लंच के बाद कुछ देर यूँही टहलने का विचार था तो देखा, कि सरदार वाली कार सर्विस में गयी, तो सामान खाली किया, उसमे एक गेंद भी थी। ऊबड़खाबड़ गेंद पहली बार देखी मैंने। ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था, मेड इन चाइना। किसी फोम की बनी हुई है यह गेंद.. भीतर से खाली नहीं.. पूरा ही किसी फोम से भरा हुआ.. और मजेदार बात यह थी, बड़ी तेज बाउंस बैक करती है। ऑफिस की खाली दीवार पर मैंने और पुष्पा ने कुछ देर गेंद को पटक पटककर कैच कैच खेला..!


    बचपना याद आ जाता है, जब भी इस तरह कोई गेंद हाथ में आ जाए। एक छोटी सी गेंद भी मिली.. हम जब छोटे थे, तो एक गेंद आती थी, गुजराती में गेंद को कहा जाता है, "दड़ो", और छोटी गेंद हो तो "दड़ी"! एक छोटी दड़ी आती थी, जो बड़ी खतरनाख होती थी। खतरनाख से मेरा तात्पर्य है, गलती से भी हाथ से गिर गयी, तो बहुत ज्यादा कूदती थी वो। इतने ज्यादा बॉउंसबैक करती थी, कि लगता था, जैसे गेंद पागल हो गयी है। तो उसे बचपन में हम लोग 'गांडी-दड़ी' कहते थे। गांडी मतलब पागल। आज जब वह छोटी गेंद हाथ लगी तो पुष्पा तुरंत बोला, "गांडी दड़ी डाही थई गयी।" (पागल गेंद पागल नहीं रही। डाही शब्द का हिंदी नहीं पता। पागल का विरुद्धार्थी शब्द।) क्योंकि यह छोटी गेंद आकार और देखने में बिलकुल ही उस गांडी दड़ी जैसी थी, लेकिन उसके जैसा बॉउंसबैक नहीं था। 


शाम, टाँके और थकान के बीच एक हल्का-सा सुकून

    खेर, दोपहर बाद काफी सारे काम थे। वे सारे निपटाए.. कब अँधेरे ने अतिक्रमण किया, और अपना अधिकार हस्तगत किया, कुछ भी पता नहीं चला। फ़िलहाल साढ़े सात बज रहे है। घर जाकर पहले डॉक्टर के पास जाना है, और आज तो यह टाँके निकलवा ही देने है। परेशां हो चूका हूँ मैं। अब तो ठीक चलने भी लगा हूँ, इस चक्कर में भूल जाता हूँ, कि पैर में टाँके है। कभी स्किन खींचती है, तो याद आता है। रात को पैर पर कोई कपडा लपेटकर सोना पड़ता है, ताकि यह स्टेपल की स्टिचेस कंबल में फंसे नहीं। वैसे तो फंसने का सवाल नहीं लेकिन डर तो रहता है, कहीं नसीब में और पीड़ा लिखी हो, स्टिचेस के कारण घाव कहीं फिर से खुल जाए..!


    चलो प्रियम्वदा ! विदा दो..

    शुभरात्रि।

    १०/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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