दैवीय चेतना पर मन के प्रश्न
प्रियम्वदा !
संसार मे जितनी भी कहानियां रची गयी, या जितने भी प्रसंग घटित हुए है, उन तमाम इतिहास के पन्नों से सदैव एक बात तो प्रकट हुई ही है। अधर्म पर धर्म की विजय। आततायिता का विनाश। दुष्कृत्यों पर दंड। सुकृत्यों पर उपहार..! दैवीय चेतना क्या होती है, कैसी होती है, मुझे स्वयं कोई भी अनुभव नहीं हुआ है। या ऐसा भी हो सकता है, कि मेरे दृष्टिकोण ने कभी देखा ही नहीं दैवीय चेतनाओं को। हमारे समाज में, हमारे आसपास ऐसे कितने ही धार्मिक अनुष्ठान के समय पर, किसी न किसी व्यक्ति के शरीर मे दैवीय चेतना का संचार होता है। उसके शरीर मे एक अलग तरह का कंपन दिखता है। वह अपने चेहरे पर अलौकिक भाव ले आता है। और वह भविष्य के प्रश्नों पर, चिंताओं पर समस्या का समाधान देता है। आस्थावान लोग उन वचनों का अनुसरण करते है। धैर्य और हिम्मत के साथ कोई भी कार्य सफल हो ही जाता है।
कांतारा चैप्टर 1 का अनुभव और प्रभाव
कांतारा चेप्टर 1 देखी। अद्भुत फ़िल्म है। मैं खुद अपने आसपास कोई व्यक्ति इस तरह ईश्वरीय चेतना के कारण कंपता दिखता है, तो मैं अनादर किए बिना चुपचाप वहां से निकल जाता हूँ। मुझे वह ठीक नहीं लगता है। क्योंकि मुझे लगता है, कि ईश्वर यदि किसी पर अपनी चेतना का प्रादुर्भाव करता है, तो क्या वह शरीर इतना सक्षम वाकई होगा? जो स्वयं ईश्वर की चेतना के बल को झेल पाए? अभी कुछ दिनों पूर्व इंस्टाग्राम में एक आदमी खूब वायरल हुआ था, क्योंकि उसका कहना था, कि उसके शरीर मे स्वयं हनुमान जी आते है। ऐसे लोगों का मैं अपमान नहीं करना चाहता, लेकिन मैं मन ही मन सोचता हूँ, हनुमान जी ने द्रोणगिरि उठाया था, यह ज्यादा नहीं 100 किलो उठाकर दस कदम चलकर दिखा दे?
लोकदेवता, परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत
कांतारा का प्रथम भाग था, वह बहुत रोचक था, और मन मे इच्छा जरूर से जन्मती थी, कि उन देवो का क्या इतिहास है, जो उस प्रथम भाग में थे। इस फ़िल्म में उन देवो के बारे में थोड़ी बहुत प्राथमिक जानकारियां दी है। अपने यहां लोकमानस में कितने सारे देव देवियां और ईश्वर के रूप तथा अवतार है। लोकदेवता और लोकदेवीयाँ अलग। प्रत्येक क्षेत्र में अलग देव है। प्रत्येक समाज मे अलग देव है। यह देवता पूजे जाते है, ताकि वे हम पर अपनी अनुकम्पा बनाए रखे। प्रत्येक अनुष्ठान में अग्नि की उपस्थिति अनिवार्य है। और प्रत्यक्ष द्रष्टा सूर्य देव के बाद जल स्वरूप इंद्र और पोषण के लिए अग्नि को हमने देव माना। इस फ़िल्म में उस कबीले के पूज्य पंजूरली थे। और पंजूरली का सहायक गुलिगादेव। पूरे भारतवर्ष में कितने ही मत मतांतर और पंथ हुए, पर भगवान शिव का स्वरूप हर जगह एक समान लिंगाकार ही रहा।
कहानी, संघर्ष और दैवीय शक्ति का उद्भव
इस फ़िल्म में शुरुआती नायिका ही फ़िल्म के अन्त भाग आते आते मुख्य खलनायिका बन चुकी थी। बहुत ही सिफत से यह सस्पेंस बनाए रखा हुआ था। फ़िल्म की मुख्य कहानी तो इसी तरह थी कि प्रथम भाग में जंगल मे बसे हुए उन आदिवासियों के पूर्वज भी उसी भूमि पर बस्ते थे। हमेशा से उनके देव के साथ, देव के समीप। और यह पूरी कहानी उन पूर्वजों के बारे में थी। कैसे एक राजा ने ईश्वर के मधुबन कि लालच में जंगल मे प्रवेश करना चाहा। दक्षिण के राज्य मसालों के लिए सुप्रसिद्ध रहे है। यह मसाले कुदरती रूप से उस जंगल मे पाए जाते थे। जंगल मे इन आदिवासियों के अलावा एक और अलग प्रजाति के आदिवासी भी बस्ते थे। सबको ही ईश्वर के मधुबन की तलाश थी। जब राजा आततायी हुआ, तो उसके विरुद्ध इस आदिवासी कबीले ने, फ़िल्म के नायक ऋषभ शेट्टी उर्फ बेरमे के नेतृत्व में, युद्ध का ब्युगल फूंक दिया। काली विद्या के साथ कुछ कहानियां बुनी गयी। जिसके प्रत्युत्तर में देवों की ओर से उनके गण समान नायक ने प्रतिरोध किया।
सिनेमेटोग्राफी, संगीत और फ़िल्म का अद्वितीय वातावरण
और अंत मे स्त्री के विरुद्ध लड़ने के लिए नायक के शरीर मे माता चावूंडी (चामुंडा) का संचार होता है। दैवीय शक्तियों से सम्पन्न होकर यह लड़ाई का दृश्य बहुत रोचक है। और फ़िल्म का म्यूजिक भी रोंगटे खड़े कर देता है। थोड़ी बहुत कॉमेडी भी है। लेकिन मजेदार बात यह है, कि परंपरा पर जरा सा भी मजाक किये बिना, फ़िल्म ने संस्कृति को उजागर किया है। जहां बॉलीवुड में pk, ओह माय गॉड जैसी फिल्में परंपराओं का उन्मूलन करने में लगी है, वहीं ऋषभ शेट्टी ने यह साबित कर दिखाया है, कि परंपरा का सन्मान करते हुए भी कहानी/फ़िल्म सुप्रसिद्ध हो सकती है।
पहले भाग की तुलना—कहानी, लय और गहराई
फिल्म के अंत में फिर से एक और कहानी के बीज भी बो दिए गए है। लेकिन एक कहानी ख़त्म होने के बाद जिस तरह नई आरम्भ होती है उसी तरह। वो फॅमिली मैन 3 की तरह आधी-अधूरी कहानी का अंत नहीं है कांतारा चैप्टर 1 का। वैसे इस फिल्म में पहले वाली मजा तो नहीं आयी, लेकिन कहानी बहुत शानदार लगी मुझे। खासकर दृश्य.. या सिनेमेटोग्राफी। एक अलग ही अंदाज़ है इस मूवी का। मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में यह भी रहेगी। ऐसी फ़िल्में वाकई तारीफ के काबिल रहती है, जो परंपरा को प्रोत्साहन देती है। न कि बॉलीवुड की तरह अपमान...
जीवन के छोटे पड़ाव—टांकों से मुक्ति और मन का समाधान
प्रियम्वदा, आज सवेरे ऑफिस पर लाइट नहीं थी। मिल भी बंद थी, बस यही कारण था, कि यह फ़िल्म पूरी करने का एनफ समय मिल गया मुझे। दोपहर को लंच समय मे यह दिलायरी लिख लेनी चाही थी, लेकिन फिर काम इतने आ गए कि यह भूल ही गया। अरे हाँ, कल रात को टांकों से आज़ादी मिल गयी थी। पूरे पन्द्रह दिन मेरे साथ जुड़ चुके टांके कल मात्र पांच मिनिट में अपनी पकड़ छोड़ गए। साथ ही निशान भी।
अच्छाई की अनंत विजय: हर कहानी का शाश्वत सूत्र
प्रियम्वदा ! फिर से एक बार मैंने समाधान कर लिया है। अपने आप से, अपनों के लिए। मन में उठे उत्पात को मैं तेजहीन कर पाया हूँ। हाँ ! इस बार समय ज्यादा लगा, क्योंकि जिह्वा के प्रहार से व्याकुलता खूब होती है। मैंने ही इस बार भी समाधान का प्रस्ताव रखा था। हर बार यही तो होता आया है, यही परंपरा है शायद। यही रीत निभायी जाती रही है। अपने आत्मसम्मान को एक तरफ रखकर शांति समझौता हर कोई करता है। मैंने भी किया। कुछ गलत नहीं है इसमें। इसी तरह धीरे धीरे मैं अपने आप को खो दूंगा.. समय के साथ वृद्धत्व यही सिखाता है।
नायक-खलनायक: समाज के नज़रिये से बदलती परिभाषाएँ
अब लौटता हूँ जहाँ से बात शुरू की थी.. दुनिया की तमाम कहानियों में कभी भी अधर्म की जीत नहीं होती। या फिर यूँ कहूं, कि कोई भी नायक कभी भी हारता नहीं है। ऐसा क्यों? इस मामले में सारी दुनिया एकता दिखाती है, कहानियों के नायक के मामले में। नायक भले मर जाए, लेकिन वह हारता नहीं है। यदि हारता है, तब भी कोई और उठ खड़ा होता है, जो संतुलन को वापिस स्थापित करता है। अपने यहाँ के देव-दानव के सारे किस्से यही कहते है। हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप, सहस्त्रार्जुन कार्तवीर्य, रावण, कौरव.. कौरवों के बाद असुरों वाली जाति ही जैसे कहीं विलीन हो गयी थी।
दिन का अंत—संध्या, शांति और आरती का समय
दैत्य पूरी कहानी में मौज-मजा करते, और अंत में किसी नायक के हाथों मारे जाते.. इसी प्लाट पर कितनी सारी कहानियां है। हमेशा अच्छाई ऐसे जीत जाती है, जैसे सूर्य उगता है, अंधकार को छंटते हुए। क्यों? बुराई हावी हो जाती है, लेकिन टिक नहीं पाती। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उन नायकों का बखान ही नहीं हुआ, जो खलनायक के सामने विद्रोही तो हुए, लेकिन जीत नहीं पाए। उनकी कहानियां कभी नहीं मिलती, जिन्होंने खलनायक के हाथों का स्वाद चखा हो.. हारे हो..!
शायद उदहारण स्थापित न हो जाए इस कारण? फिर यह तो एक तरफा बात हुई.. खलनायकों का महिमा-मंडन इसी कारणवश दबाया गया, कि वे दुष्ट थे..? आज के समय पर किम जोंग उन को अनपढ़ भी गाली देगा.. लेकिन क्या वह अपनी प्रजा को इतने वर्षों से नहीं संभाले हुए है? उसके देश की इकोनॉमी तब भी चल ही रही है न? भले ही एक मात्र चीन का सहारा है उसे, लेकिन तब भी उस देश में लोग बसते है। दुनिया की नजरों में खलनायक वह अपने लोगो के लिए एक नायक है ही।
वैसे साढ़े छह बज रहे है। संध्या आरती का समय है, क्या पता कोई ईश्वरीय चेतना आसपास हो, और मेरा लिखा हुआ यह उनपर का अविश्वास पढ़ ले, और रुष्ट हो जाए, उससे पूर्व तुमसे विदा ले लेता हूँ।
शुभरात्रि।
११/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
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