प्रियम्वदा : मन, प्रकृति और अस्तित्व की दिलायरी
सुबह का बोझ और आत्मा की थकान
प्रियम्वदा !
मुद्दा तो कुछ नहीं है, लेकिन फिर भी दोपहर के बारह बजे दिलायरी लिखने बस इस कारन से बैठ गया हूँ, कि कईं बार हम से छोटे, हम से बड़ी बड़ी बातें कर जाते है। उम्र और ज्ञान का कोई लेनदेन क्यों नहीं होता? होना चाहिए, ऐसा ही समझदार साथी होना चाहिए.. जीवन में सारे तरह के लोग मिलते है। कोई उटपटांग होता है, कोई सुलझा हुआ। लेकिन एक टीस भी उठती है, जब हम तुलना करते है, किन्ही दो लोगों की..!
मोबाइल, मूवी और मन का पलायन
आज भी सवेरे जब आँख खुलवाई गयी, तब घड़ी में आठ बज रहे थे। ब्रश करके ही पहले कुँवरुभा को स्कूल छोड़ने गया। वापिस आकर तैयार हुआ, और ऑफिस के लिए निकला तब तक सवा नौ घर पर ही बज गए थे। फिर मैं भी तो बड़ा मतलबी हूँ.. जब भी लेट होता हूँ, तो जगन्नाथ को ध्वज प्रणाम कर लेता हूँ, लेकिन दुकान पर खड़े रहकर धूम्रपान का अनादर नहीं कर सकता। ऑफिस पहुंचा तब तक साढ़े नौ बज रहे थे।
काम तो कुछ खास था नहीं इसी लिए बारह दिलायरी लिखने बैठा था। दरअसल लिखने बैठने का कारण तो यह था, कि मोबाइल में बैटरी डाउन हो गयी थी। कल शाम को पत्ते ने एक एप्लीकेशन डाउनलोड कर दी, जिसमे आप मूवीज देख सकतें है। हाँ यह प्लेस्टोर के अलावा डाउनलोड किये हुए एप्लीकेशन निजी सुरक्षा के मामले में खतरनाख हो सकते है। लेकिन ज्यादातर लोग यह वाली एप यूज़ करते है, इसी कारण से मैंने भी डाउनलोड कर ली। कल रात को बारह बजे तक एक मूवी देख रहा था। मजेदार थी, लेकिन सवेरे जल्दी उठने के बहाने तले सो गया था।
आज दोपहर तक मिले खाली समय का सदुपयोग फिल्म देखने में ही किया। पिछले कुछ दिनों में उठाये मानसिक तनाव से मुक्त होने के लिए मूवीज देखना मेरे लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त है। कल रात को कांतारा चेप्टर १ देख रहा था, लेकिन आज सवेरे ऑफिस के wifi पर वह एप्लीकेशन नहीं चल रही थी, तो दूसरे एप्लीकेशन पर फॅमिली मैन का सीजन ३ देखने लगा। ठीक एक बजते ही एक काम आया.. जिसमे पूरा एक घंटा लगा। उतनी ही देर में फोन भी चार्ज हो गया, और लंच करते हुए हमेशा की तरह तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखना तय होता है। सिर्फ लंच-लंच में देखता हूँ, फिर भी मैं 1875वे एपिसोड में पहुँच चूका हूँ।
लो फिर, आज शायद वो दुःख, दर्द, पीड़ा से मुक्त हो गयी दिलायरी.. फेमिली मैन के तीन एपिसोड्स देख चूका हूँ। और इतना तो समझ में आ गया, कि पहली सीजन में वह उत्तर भारत में था। दूसरी में दक्षिण। तीसरी में उत्तर-पूर्वी यानी के सेवन सिस्टर कहे जाते राज्यों में है। और यदि चौथा सीजन आता है, तो जरूर से वह गुजरात/राजस्थान में घूम रहा होगा। पूरा भारत कवर रहे है यह लोग सीजन के नामपर।
शिकरा की उड़ान और भीतर जागती प्रकृति
प्रियम्वदा ! अभी कुछ पहले सूर्यप्रकाश विध्यमान था। ऑफिस में बैठा बैठा बोर हो रहा था, तो यूँही आसपास टहलने चल पड़ा। बिजली एक पोल पर एक अलग पक्षी दिखा.. पहले तो लगा बाज है। लेकिन फिर ध्यान से देखा, बाज तो नहीं, लेकिन उसी के परिवार से है यह पक्षी। आम तौर पर दिखने वाला सामान्य पक्षी है भी, और नहीं भी। शिकरा.. नाम में ही शिकारीपना है। गिलहरी, छिपकली, और छोटी चिड़ियाँ जैसे शिकार पर निर्भर यह शिकरा बैठा दिखना काफी लाजवाब रहा। तुरंत अपनी जेब से फोन निकाला, धड़ाधड़ सात आठ तस्वीरें खींच ली। आज पता चला, अपना फोन 10x ज़ूम पर कितना घटिया फोटो खींचता है।
शिकरा भी काफी सुंदर पक्षी है। ग्रे रंग के पंख, लाल आँखे, और छाती तथा निचे तक धारीदार सफेद पट्टे..! अपने बड़े पंजों के साथ वह इलेक्ट्रिसिटी को पास करते वायर पर अपनी पकड़ जमाए बैठा था.. और इधर उधर झाड़ियों में भोजन की तलाश में अपनी लाल आँखें फेर रहा था। यह जब उड़ती चिड़िया पर झपट्टा मारता है, तब देखने लायक होता है। शिकारी पक्षियों का झपट्टा ही देखे बनता है। यह ज्यादा आकर्षित इस लिए भी लगता है, कि यह आसमान में हो रहा होता है। जमीनी प्राणियों के शिकार खूब देखे है। डिस्कवरी और नेटजियो पर यही प्राणी-जगत मेरा पसंदीदा होता था।
एक दुनिया – सिर्फ पुरुषों की कल्पना
प्रकृति ने इतने सुंदर निर्माण किये है, लेकिन सारी चीजे जोड़ी में.. नर मादा की.. मनुष्य में भी..! मैं सोच रहा था, कितनी अलग दुनिया होती अगर, या तो सिर्फ पुरुष होते, या सिर्फ स्त्रियां..! कल्पना करने में क्या जाता है.. क्या होता सिर्फ पुरुष ही पुरुष होते दुनिया में.. सबसे बड़ी बात होती की इंद्रधनुष के सात रंगों में कुछ रंग कम हो जाते। स्त्रियां नहीं होती तो श्रृंगार से जुड़े साधन और साहित्य.. दोनों ही न होते..! एक और मजेदार बात.. प्रेम तो शायद अस्तित्व में रहता लेकिन वह विजातीय आकर्षण वाला मामला ही न होता।
विजातीय पात्र ही नहीं है, इस लिए विवाह का तो कांसेप्ट ही नहीं होता। प्रियम्वदा, विवाह ही नहीं होते तो कितनी सारी समस्याएं जन्मती ही नहीं। एक कमरा ही काफी होता एक पुरुष के लिए। या फिर कोई पुरुष धनिक है, तो उसके लिए दो कमरों का निर्माण काफी रहता। फिर तो घरों में बस जरूरियात की चीजें ही रहती। साजो-सज्जा का साधन तो स्त्रियों के द्वारा सुंदरता की बढ़ोतरी के लिए होती है। पुरुष तो बस आवश्यकता को अनुसरता है।
मुख्य बात है, फिर जनगणना आगे कैसे बढे? अगर स्त्री का ही अस्तित्व नहीं है, तो फिर पुरुष के भीतर ही कोई ऐसी संरचना होती। वो एक समुद्री जिव है, मैंने पढ़ा था, वह अकेला है, मतलब उस जिव की प्रजाति में नर-मादा का सिस्टम ही नहीं है। पुरुष खुद ही समय आने पर अंडे दे देता है, और वंश आगे बढ़ जाता है। खेर, मजेदार बात यह भी होती कि पुरुष अपने काम से थका हुआ लौटता तो उसे स्त्री की किचकिच से परेशां न होना पड़ता।
एक दुनिया – सिर्फ स्त्रियों की परिकल्पना
और एक मजेदार बात.. यदि संसार में स्त्री ही न होती.. तो पुरुषों को तो बड़े बड़े युद्धों से भी बच जाना पड़ता। अरे रोड पर कितने सारे एक्सीडेंट होते ही नहीं। खेर, यह तो एकपक्षीय बात हुई। स्त्री को बुरा न लगे इस लिए एक और कल्पना करते है। एक संसार सिर्फ स्त्रियों का। वहां पुरुष का नामोनिशान नहीं है। उस संसार में ब्यूटी प्रोडक्ट्स भरपूर होते.. क्योंकि एक स्त्री दूसरी स्त्री के सामने तब भी सुंदर दिखना चाहती है। लेकिन यह संसार ज्यादा चलता नहीं। क्योंकि पुरुषो की गैरहाजरी में स्त्रियों द्वारा होती चुगलियों पर नियंत्रण ही नहीं होता, और यह सारी आपस में लड़ लिया करती।
पुरुषों बिना के संसार में, ताजमहल, एफिल टावर, या स्टेचू ऑफ़ यूनिटी जैसे निर्माण होते ही नहीं। स्त्रियां तो चुगलियां करने में व्यस्त रहती, फिर इन निर्माणों के लिए समय कहाँ बचता? सिर्फ स्त्रियों के संसार में कुटिलता खूब चलती। सबसे बड़ा हथियार विष ही बना रहता। परमाणुबॉम्ब की खोज करने की जरूरत ही न रहती। क्योंकि इनकी जिह्वा ही महाविनाशकारी सिद्ध है।
यह सारा अब भी एकतरफा दिखाई पड़ रहा है। एकाध तारीफ़ भी करनी पड़ेगी। स्त्रियों द्वारा संचालित इस संसार में सबसे बढ़िया काम होता मैनेजमेंट। स्त्रियां आज भी बहुत अच्छे से एक घर को मैनेज करके रख सकती है। फिर यदि उनकी अपनी सत्ता का घर हो, तो उसे तो वे महल बना सकती। बस कोई चुगली न कर जाए।
फिर तो प्रियम्वदा ! हमें कविताएं मिलती, लेकिन सारी ही एक जैसी, रूपक भी दिए जाते, लेकिन जब हीर या रांझा है ही नहीं, कैसा चाँद, या कैसी रौशनी..? बहुत सारे रूपकों का अस्तित्व ही नहीं होता। मृगनयनी जैसे शब्द तो अस्तित्वहीन ही रह जाते.. भला कौन सी स्त्री दूसरी स्त्री के विशेषणों पर व्याख्यान लिखती? न ही पुरुष लिखते। बखान होते, तो शायद ईश्वरीय, या प्रकृति के होते। दोनों ही सृष्टि में दुखों का पहाड़ तब भी होता, लेकिन वे दुःख प्राकृतिक होते.. प्रेम या विवाह जैसे भावों के जन्मे दुःख या पीड़ा का प्रवेश वर्जित होता।
वास्तविकता की स्वीकृति : अधूरापन दोनों ओर
मात्र पुरुषों के संसार में सबसे बड़ी बचत होती पैसों की। और मात्र स्त्रियों के संसार में बचत होती भावों की। लेकिन हकीकत तो यही है, कि स्त्री के बिना भी संसार अधूरा है, और पुरुष के बिना भी प्रकृति अधूरी है।
शुभरात्रि,
०९/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
“अगर यह दिलायरी आपके मन को छू गई हो, तो इसे सहेज लें — शायद कभी फिर पढ़ने की ज़रूरत पड़े।”
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