कभी-कभी व्यस्त नहीं होते दिन, हम ही उन्हें भर देते हैं
प्रियम्वदा !
कभी कभी कुछ दिन व्यस्त नहीं होते जीवन में.. हम ही जानबूझकर उसे व्यस्त कर देते है। दूसरी मनोकामनाएं पूर्ण करने में कुछ काम छोड़ भी देते है। जैसे कि यह दिलायरी लिखना..! है तो यह बारह तारीख की दिलायरी लेकिन इसे आज लिख रहा हूँ.. क्योंकि कल दिलायरी लिखने का जब समय हुआ, तब और कईं सारे काम आ धमके.. और मैं तो हूँ ही ऐसा आलसी.. जो मौकापरस्त होता है.. जिस समय पर जिसे ज्यादा प्राथमिकता की जरुरत जो वही करना भी चाहिए..!
ऑफिस, जिम्मेदारियाँ और आलस की दोस्ती
सवेरे वही नित्यक्रमानुसार ऑफिस आना.. दिनभर काम करना, और खाली समय में फ़िल्में देखना.. यही मेरी दिनचर्या है, पिछले कुछ चार-पांच दिनों से। तो सवेरे वही अपना नौ-साढ़े नौ बजे तक ऑफिस आ पहुंचा था। काम तो बड़ी जिम्मेदारियों वाले थे, तो सवेरे से ही लग गया। एक दो घंटे अपना सारा ध्यान लगाकर मैं जिम्मेदार बना। सही तरीके से काम पूर्ण होने पर तत्काल कोई काम था नहीं.. तो करें तो करें क्या वाला हाल हुआ.. यूँ तो नौकरी करने वालों के पास कामों की कमी होती तो नहीं है, लेकिन मैंने पहले कहा न, मुझे जब तक काम की अनिवार्यता अनुभव नहीं होती, मैं उन कामों को ठन्डे बक्शे में ही पड़े रहने देता हूँ।
फॅमिली मैन से कोरियाई ड्रामा तक
फॅमिली मैन 3 देख ली, कांतारा चेप्टर 1 देख ली.. और कोई नाम याद आ नहीं रहा था। तो यूँही ख्याल आया.. पिछले कुछ समय में कोरियाई ड्रामा बड़ा प्रसिद्द हुआ है। ऐसा तो क्या है इस ड्रामे में.. देखना-जानना चाहिए.. यही ख्याल से मैंने गूगल किया, बढ़िया कोरियाई ड्रामा की लिस्ट निकाली। एक सीरीज़ का नाम मिला, "जिनी, मेक अ विश"! प्रियम्वदा ! क्या बताऊँ तुम्हे.. यह तो एक नशा है.. मैंने एक ही दिन में छह एपिसोड देख लिए.. इतने मजेदार लगे मुझे। क्या सीरीज़ है..
लंच टाइम, कुर्सी और न जाने वाला मेहमान
वैसे आज यह भी भारी समस्या रही कि दोपहर का भोजन बड़ी देर से मिला। कुछ लोग परधान जी जैसे होतें है, "न खाऊंगा, न खाने दूंगा.." अड़े रहते है। उन्हें बेशर्म बनकर बताना पड़ता है, कि "आप महाशय अब प्रस्थान करो, तो हम दो रोटियां दाब लें.. या फिर हमारे साथ बैठ जाओ और आप भी दाब लो..!" पौने तीन बज रहे थे। और एक महाशय पता नहीं कौनसा फेविकोल पेण्ट की पिछली जेब में भरकर आए थे। कुर्सी पर डेढ़ बजे बैठे थे, तो पौने तीन तक बैठे ही रहे। आखिरकार मैं अपनी कुर्सी से उठकर चल दिया, ताकि उन्हें मालुम हो समय का।
जिन्हे जुबानी तरिके से कुछ न कहना हो, उनके सामने हम तरह तरह की एक्शन करतें है। ताकि बिना बोले अगला कोई बात समझ जाए। मैं ज्यादातर जिनसे पीछा छुड़ाना चाहता हूँ, वे जब मेरी ओर देख रहे होतें है, तो मैं घड़ी की ओर देखने लगता हूँ। बस यह एक इशारा काफी होता है, और बड़ा कारगर भी है। सारे ही लोग इस इशारे से समझ जाते है। और चलती पकड़ लेते है। लेकिन यह दोपहर वाले महाशय पर यह सिद्धि बेअसर रही। तो मैंने अपना दूसरा शस्त्र निकाला।
अक्सर जब दृष्टि का शस्त्र निरुपयोगी हो जाता है, तो मैं श्रवणेंद्रियों को सिमित कर लेता हूँ। बात को ही अनसुनी करना। इससे क्या होता है, कि अगले को यह अहसास होने लगता है, कि वह जो बात बता रहा है, वह इतनी रसप्रद या जरुरी है नहीं। और धीरे धीरे वह बात बंद करके उठने लगता है। या फिर कोई और नई बात शुरू करने की कोशिश करता है। यही हुआ भी.. मेरा श्रवणेन्द्रिय वाला हथियार भी विफल हुआ। जब वह महाशय बातें बता रहे थे, मैंने अनसुना करना जारी रखा। इससे उन्होंने एक PAUSE लिया, लेकिन तुरंत ही नई बात में मुझे बहकाने की कोशिश करने लगे।
नेत्रास्त्र, और श्रवणास्त्र की विफलता के बाद मैंने दिखावास्त्र का संधान किया। अपने आप को अन्य कामों में बहुत ज्यादा व्यस्त होने का दिखावा करने लगा। लेकिन यह शस्त्र असमय उपयोग हो चूका था। सबको ही पता है, लंच समय में कोई भी काम नहीं करता। कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो.. बशर्ते बस अनिवार्य न हो। मैंने कितने सारे कागज़ इधर उधर किये। कंप्यूटर पर कितनी सारे क्रोम खोले बंद किये, कुछ सरकारी वेबसाइट काम नहीं कर रही, और मेरा एक महत्वपूर्ण काम फंस रहा है, ऐसा नाट्य आरम्भ किया, लेकिन यह नाटक भी असरदार न हुआ। आखिरकार एक ही हथियार बचा था, बेशर्म होकर जिह्वा का उपयोग करना..!
शस्त्र विफल हों तो त्याग ही अंतिम उपाय
जब कोई इशारे न समझ रहा हो, तब हम बातों को इस तरह लपेटकर बोलते है, कि अगला समझ जाए। और कुछ प्रत्युत्तर भी न करे। मैंने बातों बातों में कह दिया, "लंच समय में भी कुछ लोग खाना खाते नहीं।" अब यह बात मैंने कही तो उन महाशय को थी, लेकिन उन्होंने इसे पर UNO REVERSE CARD खेल लिया। क्योंकि पहले मैं भी कभी लंच समय में खाना खाता नहीं था। कईं वर्षों से मैं सिर्फ सुबह और रात्रि का ही भोजन लेता था। दोपहर का लंच स्किप कर देता था। यह बात उन महाशय को पता थी। उन्होंने कहा, "हाँ ! आपने इतने वर्षों तक यही तो किया है।"
आखिरकार मेरा हथियारों का जखीरा बेअसर रहा, एक भी शस्त्र को काम करता न देख, आखिरकार मैंने अपनी कुर्सी त्यागी.. मेरे कुर्सी त्यागने से वे महाशय भी उठे.. हम लोग ऑफिस के दरवाज़े तक चले.. और वे विदा हुए। घड़ी में पौने तीन बज रहे थे। प्रियम्वदा ! इस प्रसंग से मैं कह सकता हूँ, त्याग बहुत बड़ा और असरदार हथियार है। त्याग के द्वारा भी कुछ लड़ाइयां जीती जाती है। मैंने कुर्सी त्यागी, तो मेरा काम बन गया, वे महाशय चले गए। आखिरकार तीन बजे मैंने लंच किया, और तुरंत ही ऑफिस के अन्य कामों में व्यस्त हो गया।
काम, भूल और देर से घर पहुँचना
तीन बजे के बाद शुरू हुए काम तो इतने अनिवार्य साबित हुए, कि कब रात के आठ बज गए, पता ही नहीं चला। आठ बजे घर से फोन पर फोन आने लगे। मुझे याद आया, शाम के पांच बजे घर से फोन आया था, कि मेहमान आ रहे है, और मुझे जल्दी घर पहुंचना था। मैं तो भूल ही गया था। साढ़े सात बजे भी घर से एक फोन आया था, और मैंने अपनी काम की व्यस्तता के बिच सामने से आती आवाज को सुने बिना कह दिया था, कि पंद्रह मिनिट में घर पहुँच रहा हूँ। और फिर से मैं काम की व्यस्तता में मशगूल हो गया। सवा आठ बजे फिर से फोन आया, और मुझे बात की गंभीरता का अहसास हुआ।
मैं कैसा मेजबान हूँ, जो घर बैठे मेहमान को इंतजार करवा रहा था.. कोई मेहमान अकेले खाने पर कैसे बैठेंगे? जब तक मैं ही हाजिर न होऊं..! आखिरकार माताजी की एक तीक्ष्ण डाँट सुनकर मैंने बाइक चालु की, और घर चल दिया। मेहमानों से कुछ गपशप की, फ़ौज के हालचाल सुने, फौजी की बातें सुनी.. रात के बारह बज गए, और निंद्रा ने सबको सुला दिया।
शुभरात्रि।
१२/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
और भी पढ़ें :
-
कांतारा चैप्टर 1 – दैवीय चेतना, परंपरा और अच्छाई की अनंत विजय || दिलायरी : 11/12/2025
-
The Family Man Season 3 Review: प्रियम्वदा, अधूरे प्रश्नों के बीच एक पूरा दिन | दिलायरी : 10/12/2025
-
मन, कल्पना, प्रकृति और अस्तित्व की गहराइयों में एक दिन || दिलायरी : 09/12/2025
-
प्रियम्वदा | धुंध, नींद और अतार्किक जीवन पर एक आत्मस्वीकार || दिलायरी : 08/12/2025

