रविवार की मछलियाँ, मेला और शाम का जादू || दिलायरी : 21/12/2025

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रविवार की सुबह – आलस, आराम और धीरे चलती धूप

    प्रियम्वदा !

    फिर से एक बार काम की अनिवार्यता को नज़रअंदाज़ करते हुए, रविवार की दिलायरी सोमवार की दोपहर में लिखने बैठा हूँ। हाँ ! वैसे चाहता तो यह दिलायरी रविवार की ही शाम को लिख लेता। लेकिन नहीं.. अनिवार्यता नहीं थी न। काफी ठीक-ठाक दिन रहा वैसे रविवार का। अरे हाँ.. मेरी प्रतिदिन डायरी लिखने की इस आदत को अब एक साल पूरा होने में केवल चार दिन शेष रहे है। 


“Funfair में खड़ा cartoon character, plain white background के साथ।”

मेला – मछलियों की रंगीन दुनिया और कुँवरुभा की खुशी

    तो रविवार की सुबह हमेशा की तरह आलस से भरपूर होती है। आराम सर उठना, आराम से आफिस पहुंचना, तीन-चार बजे तक ऑफिस पर पड़े-पसरे रहना..! यही एकमात्र अनकहा नियम बंधा हुआ होता है। दोपहर को जब घर लौटना था, तब तीन बज रहे थे। कुँवरुभा की जिद्द टालते-टालते आज दूसरा रविवार था, और अगर आज मेला घुमाने नहीं ले जाता, तो शायद मुझ पर फिटकारें बरस पड़ती। कुँवरुभा की अभी वह उम्र चल रही है, जब बच्चों के लिए शब्द मात्र शब्द होते है, शब्द सही है, उपयुक्त है, या क्या प्रभाव करते है, उन्हें नही पता होता है। किसी ने कोई गाली सीखा दी हो, तो इस उम्र में वे भर भर के गालिप्रयोग करते है। क्योंकि शब्द का अर्थ और प्रतिभाव दोनों ही नही पता होते उन्हें।


मत्स्य प्रदर्शनी – रंग, रोशनी और हैरतें

    चार बजे करीब चल पड़ा मेले। एक तो यह पता नहीं किस खुशी में बिन मौसम मेला लगा है मेरे शहर में। छोटा सा ही है, लेकिन मेला तो मेला होता है। तरह तरह की राइड्स, और एक अच्छा-खासा मछली एक्वेरियम। मैन अट्रैक्शन तो यही था। मत्स्य-प्रदर्शनी। एंट्री फीस की टिकटें खरीदकर मेले में दाखिल हुए। शुरुआती सेक्शन तो बस फोटोग्राफी के लिए ही बना हुआ था। बड़े बड़े वॉल फोटोज लगे थे। अच्छा बैकग्राउंड, तो लोग भी खूब फ़ोटो खींच-खिंचवा रहे थे। उसके बाद हम आगे बढ़े तो एक छोटा सा संकरा रास्ता बना हुआ था। रास्ते के दोनों तरफ एक मीडियम साइज की कांच की पेटियों में तरह तरह की मछलियां थी.. कितनी सारी अलग अलग प्रजाति की मछलियां अलग अलग कांच के बक्शो में रखी हुई मिली। कुँवरुभा बड़े राजी थे। वे तो एक पेटी से दूसरी पेटी तक भागते, खुशी का कोई ठिकाना ही नही था। 


    दूसरे सेक्शन में कांच की पेटियों का साइज बड़ा हो गया, और मछलियों का कद भी। मुझे तो उनके नाम भी याद नही रहे। स्ट्रिंग रे, शार्क्स, ज़ेबरा, इल, लॉबस्टर बस यह गिने चुने नाम ही याद रहे। क्योंकि यह प्रजातियां मैंने देखी-पढ़ी हुई है। काफी रंगबिरंगी मछलियां थी। उन्हें इधर उधर तैरते देख मुझे भी मजा आ रहा था। और आगे बढ़े, तो एक सुरंगनुमा पाथ बना रखा था। यह सेक्शन सबसे सुंदर था। यहां चारोओर मछलियां थी। और बहुत बड़ी मछलियां। ऊपर भी मछलियां तैरती देख, एक अलग ही दुनिया मे आये हो ऐसा लगता है। वैसे यह बच्चो के लिए प्रभावकारी था। हम जैसे बड़े तो बस कुदरत की इस रचना को एकटक देखकर आगे बढ़ जाते थे। थोड़ा आगे यह मछलियों का सेक्शन खत्म हुआ, और आम मेले में लगते है, वैसे ही खरीदारी के स्टॉल्स थे। 


खिलौने और राइड्स – बंदूक, टॉय ट्रेन और बोटिंग

    कपड़े, मेकअप, कटलरी, क्रोकरी, गलीचे, यही सब के स्टॉल। अपने काम का कुछ नही था। मैं आगे बढ़ता रहा। कुँवरुभा हर खिलौने के स्टॉल के पास रूक जाते। उन्हें खिलौने में या तो बंदूक चाहिए होती है, या फिर जेसीबी। उन्होंने एक बंदूक खरीदी, एक पेंसिल, और जेसीबी भी लेना था, लेकिन जेसीबी की क्वॉलिटी देखकर मैंने नही खरीदने दिया। मेरे द्वारा जेसीबी के बदले कुछ राइड्स एक्स्ट्रा करवाने की डील उन्हें भी पसंद आई। पहले एक टॉय ट्रेन का लुत्फ उठाया उन्होंने। और फिर बोटिंग का भी। यह मेलों में बोटिंग के नाम तो सरे आम बेवकूफ बनाया जाता है। लेकिन बच्चो के लिए यह बोटिंग ही होती है। टकने भर के पानी मे प्लास्टिक की नावें तैरती है। बच्चे मजा करते है, तो हम भी राजी... मेलों में आज भी वो हवा भरा हुआ बड़ा सा गुब्बारा चलता है। जिसमे बच्चे खूब कूदते है। 


शाम – थकान, वॉलीबॉल और संतोष का स्वाद

    शाम छह बजे तक हम वापिस घर लौट आए थे। और मैं चल पड़ा वॉलीबॉल खेलने। वैसे प्लानिंग तो नही थी, लेकिन मैंने शुरुआत की, तो सब खेलने के लिए तैयार हो गए। रात के नौ बजे तक दबाकर वॉलीबॉल कूटने के बाद खेल खत्म हुआ। रात को सोचा फ़िल्म देख लेता हूँ, लेकिन फिर एक और जरूरी काम पूरा करना था। लगभग बारह बज गए थे। बस यही चक्कर था, कि मैं दिलायरी नहीं लिख पाया। चाहता तो रात को लिख लेता। लेकिन कुछ काम समय समय पर प्रकट होते है, उन्हें शांत करने भी उतना ही जरूरी होता है। 


व्यस्तता – जब काम हाथ पकड़कर गला पकड़ लेता है

    प्रियम्वदा, जब भी कभी मैं व्यस्तता से घुलने मिलने लगता हूँ, तो मैं अनुभव करता हूँ शायद व्यस्तता मुझ पर हावी हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे मैंने तो मात्र हाथ दिया था, उसने तो गला ही पकड़ लिया। जब मुझे व्यस्तता चाहिए होती है, तब नहीं मिलती। और जब मैं पहले से व्यस्त होता हूँ, तो और भी व्यस्तताएं पीछे कतारबद्ध खड़ी हो जाती है। खेर, रविवार की सुबह ठीक थी, रविवार की दोपहर तो बड़ी खराब थी, लेकिन रविवार की शाम ने तो जैसे सारे दिन को संवार दिया था। इसी कारण से शायद साहित्य रसिकों ने हमेशा से शाम को ज्यादा बखाना है। साहित्यों में सुबह का अच्छा वर्णन मिलता है, दोपहर का मिला जुला प्रतिभाव मिलता है, लेकिन शाम.. शाम को तो हर कवि ने किसी न किसी रूप में सराहा ही है। दिवस और रात्रि का मिलन तो सुबह-सवेरे भी होता है, तब भी, शाम का अंदाज़ जो बयां किया गया है, वह बहुमान और किसी भी समय को नही मिल पाया है। 


साहित्य और शाम – जादू, रूपक और जीवनदर्शन

    शाम मस्तानी होती है, तो कभी शाम घनी काली भी होती है। सवेरा बस प्रकृति का कड़क पहरेदार है। एक तरह से कहूं तो सवेरा राम है, तो शाम श्याम है। राम यानी कड़क अनुशासन, कृष्ण यानी मस्ती। दिनभर का सारांश होती है शाम। सवेरा नयापन देता है, लेकिन शाम दिनभर की थकान से मुक्ति की आशा बन जाती है। शाम को तो शराबी से लेकर शीघ्रकवि, हर कोई बखानता है। दिनभर की थकान भी जहां सुस्ताने लगे, वही शाम है।


    शुभरात्रि।

    २१/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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1Comments
  1. शाम आराम है कहा जाए तो कुछ गलत नहीं!

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