नैतिक दुविधा : जब विवेक फैसला करता है || दिलायरी : 08/01/2026

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नैतिक दुविधा क्या होती है?

    प्रियम्वदा !

    फिर से एक बार मात्र आधे का समय है, और मुझे यह पत्र लिखकर पूरा करना है। पोस्ट तो वैसे भी कल ही करूँगा.. लेकिन लिखना तो आज ही पड़ेगा..! तो बात ऐसी है, आज काफी दिनों बाद मेरे घमंडी स्नेही ने एक मुद्दा दिया.. हाँ ! वह स्नेही आजकल परिस्थिति का घमंडी है। समय का घमंडी..! व्यस्त है न वह.. और मैं ठहरा मुद्दों का भूखा.. मुझे राइ का पहाड़ बनाना होता है। तो स्नेही का घमंड वहां मुझे काम आ गया आज। 


नैतिक दुविधा को दर्शाता कार्टून चित्र, जिसमें एक व्यक्ति सत्य और करुणा के बीच उलझन में बैठा है


जब दो मूल्य आमने-सामने खड़े हों

    मुद्दा सरल है, नैतिक दुविधा..! जीवन में कितनी ही बार हम इस नैतिक दुविधा का सामना करते है। और कईं बार इस नैतिक दुविधा का बोझ हमें अपने कंधो पर आजीवन उठाये रखना पड़ता है। अच्छा, कईं बार क्या होता है प्रियम्वदा ! कि हम कुछ झेल तो रहे होते है, लेकिन उस झेलने वाली परिस्थिति का वर्णन करना हमे नहीं आता। वर्णन से मेरा मतलब है, उस स्थिति को एक शब्द में कहना हो तो क्या कहे..! तो आज स्नेही ने बातों बातों में ethical dilemmas के बारे में बताया.. नैतिक दुविधा। बड़ी बुरी बला है प्रियम्वदा यह तो। 


मित्रता, वचन और विश्वास की उलझन

    बिलकुल मेरे और तुम्हारे संबंध जैसी। इस दुविधा का  प्रत्येक व्यक्ति ने जीवन में कहीं न कहीं सामना किया ही होता है। बिलकुल सरल उदहारण दूँ, तो यह मेरे और गजे के साथ बहुत बार हुआ है। मैंने कईं बार गजे को कुछ ऐसी बातें बतायी है, जो किसी को नहीं कहनी होती है। तो गजा घर जाकर अपनी श्रीमतीजी के साथ तो वह बात शेयर कर देता है। जबकि मेरी स्पष्ट हिदायत थी, कि किसी को भी नहीं बतानी है वह बात। लेकिन उसके लिए वह बात नैतिक दुविधापूर्ण थी। उसके सामने दो नैतिक मूल्य थे.. एक था मैत्री का वादा। दूसरा था, श्रीमतीजी को दिया वचन। तो भाई साहबने दो विकल्पों में से श्रीमतीजी को चुना। और मुझे चुना लगा गए। अब आगे से मैं कोई भी ऐसी रहस्यपूर्ण बात उसे नहीं बताऊंगा। 


    जब सामने दो या उससे ज्यादा नैतिक मूल्य हो.. और हमें किसी एक का चुनाव करके कोई निर्णय लेना हो, आज स्थिति हुई नैतिक दुविधा। इस दुविधा का मुख्य कारण यही है, कि इस नैतिकता का सवाल दिमाग से नहीं पूछा जाता, इस सवाल का जवाब हमारी अंतरात्मा को देना होता है। यहाँ कानून नहीं, विवेक फेंसला करता है। जैसे कि करुणा और सत्य.. यह दोनों नैतिक मूल्य है। अगर फेंसला करना पड़े, तो दोनों में से एक चुनने पर दूसरा तत्क्षण विरोधी हो जाता है। क्यों बार कर्तव्य या भावना.. यह दोनों में से कोई एक चुनना पड़ता है। या तो भावना आहत हो जाती है, या फिर कर्तव्य से मुँह मोड़ना पड़ता है। 


सत्य बनाम करुणा — विवेक की परीक्षा

    नैतिक दुविधा में हमेशा गलत या सही साफ़-साफ़ नहीं होता। वहां बस तय करना होता है, आप किस मूल्य के साथ जी सकते है, और किसके बिना नहीं। हमें एक कीमत तय करनी होती है, किसे चुकाकर हम कौनसा नैतिक मूल्य संभाल सकते है। कुछ सत्य अगर किसी को भीतर से तोड़ देते है, ऐसी स्थिति में यह चुनाव मुश्किल ही है, कि सच बता दिया जाए, या उसे छिपा लिया जाए? सच को छिपा लेने से आजीवन भीति रहती है, सत्य के उजागर हो जाने की। और सत्य बता देने से कईं बार संबंध में अंतर आ जाता है। 


प्रेम, मैत्री और एकपक्षीय भावनाएँ

    कुछ कुछ यही बात है प्रियम्वदा ! I LOVE YOU AS A FRIEND.. किसी लड़की का प्रेम प्रस्ताव पर दिया गया यह उत्तर, उसके लिए नैतिक दुविधा से निकलने का राह बनता है। लेकिन प्रस्ताव रखने वाले पर तो गाज गिरती है। क्योंकि वह अब जाकर इस उस नैतिक दुविधा में झूलता रहेगा, कि प्रेम को अपना लू या मैत्री को। फिर मैत्री के रूपक तले वहां हमेशा एकपक्षी प्रेम छिपकर बस्ता है। वही झोलाछाप प्रेम, जो मैं अपनी इन दिलायरियों में तुम्हे सम्बोधित करने के नाम पर छलकाने की कोशिश करता हूँ। यह भी एक नैतिक दुविधा है, काम या भावना.. कईं बार मैं अपने काम को दरकिनार करके तुम्हे यह पत्र लिखने बैठ जाता हूँ। बाद में जब कामों की बाढ़ आ जाती है, तो फिर वहीँ अटका रह जाता हूँ। 


कल्पनाएँ, आलस्य और मनुष्य होना

    लगे हाथों कल्पनाओं को भी आड़े हाथ ले ही लेते है। दरअसल कल्पना करना बड़ा ही आसान काम है। और आलसियों का तो प्रिय काम भी। मैं कईं बार बैठे बैठे कल्पना गढ़ता हूँ, कि एक ऐसी गोली होनी चाहिए, जिसे खा लेने से मान लिया जाए, कि नाहा लिया। एक ऐसी गोली होनी चाहिए, जिसे खा लेने से जिम में पसीना बहाया बराबर मान लिया जाए। एक गोली खायी, कि प्रियम्वदा का साक्षात्कार हो जाए। एक गोली खायी, कि पैसे ही पैसे हो जाए..  खेर, और सब गोली का तो पता नहीं, पर मैंने कल्पना की गोली बराबर से खायी लगती है। तभी तो ऐसी उटपटांग बातें मैं लिख सकता हूँ। और मेरा वह घमंडी स्नेही भी पता नहीं कौनसी गोली खाता है, जो मुझे ऐसे बढ़िया बढ़िया टॉपिक दे पकड़ाता रहता है। 


नैतिक दुविधाएँ और मनुष्य का सत्य

    प्रियम्वदा ! तो बस यहीं आकर यह पत्र थोड़ी देर के लिए ठहर जाता है। निष्कर्ष जैसा कुछ नहीं है इसमें, क्योंकि जीवन की नैतिक दुविधाओं का कोई अंतिम उत्तर होता ही नहीं। ये दुविधाएँ हमारे साथ चलती हैं, हमारी परछाईं की तरह - कभी आगे, कभी पीछे। शायद इन्हीं दुविधाओं में हमारा मनुष्य होना सुरक्षित रहता है। अगर हर सवाल का सीधा उत्तर होता, तो न संवेदना बचती, न करुणा, न प्रेम की वह कचोट, जो भीतर कहीं लिखने को मजबूर करती है।


    मैं नहीं जानता कि मैंने आज कौन-सा मूल्य चुना, और किसे अनचुना छोड़ दिया। बस इतना जानता हूँ कि यह लिखना ज़रूरी था। काम बाद में निपट जाएगा, उलझनें भी किसी दिन शांत हो जाएँगी। पर जो न लिखा गया, वह भीतर जमा होकर बोझ बन जाता।


    बाकी…
    कल पोस्ट कर देंगे।
    आज इतना काफ़ी है।


    शुभरात्रि। 

    ०८/०१/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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