सोच का भटकाव, रास्तों का सपना और शाम का क्रोध | दिलायरी : 07/01/2026

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सोच की आदत और लिखने की विवशता

    प्रियम्वदा !

    क्या लगता है तुम्हे, मैं यह खत केवल आधे घंटे में लिख पाउँगा..? मुझे तो अविश्वास है, इस प्रस्ताव पर। मैं पूरा पूरा दिन खपा दिया करता हूँ, शाम के इस चंद अल्फ़ाज़ों के लिए। और अब तो वैसे भी मेरी दिलायरी की आयु एक वर्ष तो हो ही चुकी है। तो अब प्रतिदिन लिखूं, न लिखूं.. कोई फर्क पड़ता है भला? वैसे भी मैं सोच रहा था.. अरे मैं तो सोच ही सकता हूँ बस.. क्योंकि सोचने में कतई ऊर्जा उपयोग नहीं होती.. पड़े पड़े सोच सकते है, खड़े खड़े सोच सकते है। सोचने के लिए कोई विशेष मुद्रा, या स्थिति की आवश्यकता है? नहीं है। 


भटकती सोच में डूबा व्यक्ति, कंप्यूटर के सामने बैठा, जिसके मन में रास्ते, गणनाएँ और अधूरी यात्राओं के विचार तैर रहे हैं

पढ़ने से देखने तक — एक विचार की यात्रा

    मैं सोच रहा था, अब कुछ पढ़ा जाए.. कितने दिनों से काला अक्षर सचमे बस लिखा है.. पढ़ा बिलकुल नहीं है। लेकिन यह विचार सोचने ज्यादा आगे बढ़ा नहीं। फिर सोचा फिल्म देख लू.. उसके लिए पहले यूट्यूब देखना पड़ेगा, कि कौनसी मूवी अच्छी है - देखने लायक। तो काफी सारे शॉर्ट्स देख लिए, सोचने को साइड में रखकर। एक कॉमेडी फिल्म पर मेरी सोच ने कुछ हामी भरी। तुम्हे याद रखना है प्रियंवदा, पहले मैं कुछ पढ़ने की सोच रहा था, फिर क्या देखूं यह सोच रहा था, और अब सोच रहा था कि कैसे देखूं? 


गूगल मैप, धोळावीरा और अधूरी यात्राएँ

    कैसे से मतलब है, समय कहाँ है..? अब समय निकालने के बारे में सोच रहा था, उतने में गलती से गूगल मैप खुल गया। यहाँ से अलग सोच का दायरा भी खुल गया। मैप खोलते ही पहले तो अपना ही शहर दीखता है। लेकिन ज्यादा ज़ूमाउट होने के कारण पूरा जिला देख पा रहा था। और उतने में मेरी नज़र पड़ गयी धोळावीरा पर। आखिरकार यह पुरानी सभ्यता के अवशेष मैं कब देख पाउँगा.. यह सोच हावी होते ही, अंगुलिया कीबोर्ड पर मेरे शहर से धोळावीरा का रास्ता खोजने लगी। देखो प्रियम्वदा ! तुम्हे याद रखते चलना है हाँ, मेरी सोच कहाँ कहाँ तक जा रही है। यह सोच सिर्फ दोपहर बाद की है, दोपहर के पूर्व की अलग कहानी है। अरे चिंता मत करो, वह तुम्हे विस्तार से नहीं सुनाऊंगा। 


कल्पना की बाइक और उम्र का सवाल

    अँगुलियों को देर नहीं लगी, उसने 121 किलोमीटर कुछ ही देर में तय कर लिए। मैं फिर सोच में पड़ गया, यह क्या हुआ, पहले तो 180 किलोमीटर हुआ करता था। तो देखा, मैप महाराज कच्छ के बड़े रन के बीचोबीच से ले जा रहे थे। उस रन में काला कौआ तक नहीं होता है। अब सोच को नया विषय मिल गया। मैं सोच रहा था, कि वह सोशल मीडिया के सुपर स्टार जैसे ROAD TO HEAVEN का प्रतिद्वंद्वी जैसा यह रास्ता कौन सा आ गया मार्किट में..? और भला गूगल मैप पर ही यात्रा करनी हो तो अधूरी क्यों छोड़े? तो यह नया रास्ता काफी सही लगा। और हाँ ! अब रोड टु हेवन का वास्तविक प्रतिद्वंद्वी भी मैदान में है। 


    तो मैं सोचने लगा, कि काश.. मेरी कोई प्रेमिका होती.. मैं और वह इस रास्ते पर एक बाइक पर निकल पड़ते। वह पीछे से मुझे किसी फ़िल्मी सिन की तरह थामे रखती। मैं बाइक को भगाए जाता। इस रस्ते पर तो कहीं छाँव का तो नामोनिशान है नहीं। वह बेचारी कोमलांगी, रन की इस धूप को सह नहीं पाती, वह मेरी पीठ पर लिपटकर छाँव तलाशती। फिर ख्याल आया, ऐसे धूप में लिपटने से तो पसीने बहते है। भला लिपटना-चिपटना बाद में, पहले छाँव तलाशी जाए। लेकिन इस रस्ते पर तो कहीं भी छाँव है नहीं। तो मैं बाइक और तेज़ चला दूंगा, ताकि यह रास्ता जल्दी खत्म हो जाए। उतने में सोच ने करवट ली.. इस उम्र में प्रेमिका? प्रियम्वदा क्या सोचेगी..?


कैलेंडर, छुट्टियाँ और असंभव योजनाएँ

    तो मेरी ही सोच ने पहले वाली सोच पर फटकार बरसाई, और मैं नई सोच के साथ सामने टंग रहे केलिन्डर में देखने लगा, छुट्टियां कब है? 14 को खिहर (उत्तरायण/मकरसंक्रांति) है, उस दिन तो ऑफिस पर फंक्शन है। अगली छुट्टी है, 26 जनवरी, लेकिन उस दिन तो धोळावीरा का म्यूज़ियम भी बंद रहता है। फिर.. अब..? केलिन्डर को कोसता हुआ मैं फिर से कंप्यूटर स्क्रीन को ताड़ने लगा। प्रियम्वदा, सोच की गिनती किये जा रही हो न? पढ़ना, लिखना, देखना, घूमना, और किसी साथ की अपेक्षा.. 


हिसाब-किताब, पेट का गणित और मन का बोझ

    फिर सोच ने अल्पविराम लिया, और ऑफिस में आए किसी व्यापारी के साथ हिसाब किताब में अपना कितना लाभ छीन सकता हूँ, वहां सोच अटक गयी। लेकिन सोच किसी जगह ज्यादा देर तक अटकती थोड़े है.. वहां से कूदी.. तो सीधे गिरी और किसी हिसाबों के गणित में। अब गणित और प्रियम्वदा ! यह दोनों ही मुझे समझ कहाँ आतें है.. लेकिन फिर भी.. इस पेट का गड्ढा भरने के लिए उलझना पड़ता है। अरे रुको.. प्रियम्वदा तुम्हे कैसे उलझन कह सकता हूँ मैं.. तुम तो मेरी मार्ग द्रष्टा हो.. बस तुम मुझे ऐसे मार्ग देती हो जहाँ मार्ग होता ही नहीं है.. दिवार होती है, जिसे मुझे फांदना पड़ता है। 


    देखो.. एक एक अनुच्छेद में अलग अलग सोच छलक रही है। इस वाले में भी.. जिसे तुम अभी पढ़ने व्यस्त हो.. देखो तो ज़रा, यहाँ कौनसी सोच एक्टिवेट हुई दिखती है..? तो अंधेरा होने तक तो यही सोच चल रही थी, कि इन हिसाबों में इतना ज्यादा गणित क्यों होता है.. और अचानक से याद आया.. अरे.. दिलायरी कौन लिखेगा..? मेरी सोच? हाँ वैसे लिखती तो सोच ही है। लेकिन फिर यह अंगुलिया बूरा मान जाएगी.. कि कीबोर्ड के साथ संवाद में हम है, और मुद्दा-माल सारा सोच का.. अन्याय हुआ भला..! तो सोच ने सोचा कि कुछ मान सम्मान अँगुलियों का किया जाए..!


क्रोध, संकोच और शाम की चुभन

    तो चारो अंगुलिया बाएं हाथ की, और चारों अंगुलियां दाएं हाथ की आपस में ऐसे उलझायी, और मरोड़ी.. कि आठों अँगुलियों के आलिंगन से कटाके की आवाजें फुट पड़ी। देखो, यह सोच को एक तरफ रखकर मैं सोच रहा हूँ, कि अभी घर के लिए निकल लूँ.. अरे लो जिस बात का डर था वही हुआ। दिमाग का पारा हिल गया। एक आदमी है.. उसकी आदत है, हर चार-पांच दिनों में पैसे मांगने आ जाता है। मैं उसे हर बार प्यार से और डांट फटकार से समझाता हूँ की पैसे एक बार मिलेंगे.. यहाँ कोई दिहाड़ी मजदूरी नहीं चला रहा हूँ मैं। लेकिन अगला समझने को तैयार नहीं। 


    मैं अभी उसे आता देख सोच रहा था, कि मैं जल्दी से घर के लिए निकल लू, ताकि कुछ उल्टा-सुलटा न बोल पडूँ उसे। लेकिन उसने मुझे रोक लिया, और मेरे ज्वलंत शब्दों का रसपान करके गया है। मैं सोच रहा था, शाम का समय है, किसी पर क्रोध करना ठीक नहीं। लेकिन कोई मुँह में हाथ डालकर रसपान करना चाहे, तो फिर तो मेरी सोच क्षणभर की शंका को नहीं सेवती। फुट पड़े, जैसे जुबान पर तैयार ही बैठे थे वे शब्द.. सारे निकल गए। अब मैं सोच रहा हूँ, उम्र में वह मेरे पिता जितना बड़ा आदमी है, लेकिन तू-तड़ाक के बिना जाता नहीं। मैं किसी अनजान को भी, उम्र में छोटे को भी हमेशा "आप" से संबोधित करता हूँ। 


    अरे हाँ.. प्रियम्वदा, मैं कितना ज्यादा घमंडी हूँ, उसका उदहारण देता हूँ।  

    शुभरात्रि।

    ०७/०१/२०२६


|| अस्तु ||


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