बाप की बेल्ट, बचपन के ट्रॉमा और सहनशक्ति | हक़, परवरिश और पीढ़ियों का फर्क | दिलायरी : 04/01/2026

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बचपन की सीख और बाप की कही बात

    प्रियम्वदा !

    मैं जब छोटा था, तब हुकुम ने एक बार बातों बातों में कहा था, "अपने हक़ का जो होता है, वह कुदरत भी नही छीनती। अगर कुछ छीन गया है, तो वह हक़ का नहीं था।" उस समय तो यह बात मेरे सर के ऊपर से गयी थी। मुझे कुदरत, हक़, छीन जाना, यह सब समझ नहीं आता था। बचपना था, और जिम्मेदारियों का निर्वहन क्या होता है, वह मालूम न था। लेकिन यह बात दिमाग मे बैठ गयी थी। उस समय पर तो इस अमूल्य ज्ञान की जरूरत भी कहाँ होती है, क्योंकि वह समय तो ख्वाब देखने का होता था, ख्वाब को हकीकत में उतारने का नहीं। अगर उस हक़ और कुदरत वाली बात आज कहीं न कहीं सच होती देखता हूँ, तो मेरी अपने हुकुम में श्रद्धा और बढ़ जाती है। क्योंकि हर बेटे का सबसे पहला हीरो अपना बाप ही होता है।


बचपन की यादों में डूबे दो दोस्त, सफ़ेद पृष्ठभूमि पर बैठकर हँसते हुए—भारतीय बचपन, अनुशासन और दोस्ती का प्रतीक कार्टून दृश्य।

रविवार, दोस्त, पत्ता और गरबी चौक

    आज का रविवार कुछ हक़ और नीति से भरा ही निकला है। सवेरे ऑफिस पहुंचकर दिलायरी पोस्ट करने के बाद लेबर का हिसाब करते करते हमेशा की तरह तीन बज गए थे। शाम को कुछ रिश्तेदारियां निभाकर वापिस लौटा तब तक शाम के साढ़े छह बज गए थे, और लड़के वॉलीबॉल खेलने की तैयारी। सवा नौ बजे तक खेलने के बाद अभी वापिस गरबीचौक आया था, कुछ देर तुम से गपशप करने। लेकिन पत्ता यहां पहले से चांद की तस्वीरें खींचते बैठा दिखा। सोचा था, शांति से कुछ देर ताप सेंकता बैठूंगा। लेकिन नहीं, पत्ता हो वहां शांति कैसी? हम लोग जब एक दूसरे की खींचने पर उतारू होतें है, तो कोई भी हमारे साथ बैठ नही सकता। एक दूसरे को ब्रास और SS के कीड़े पड़ेंगे, यहां तक की दुहाई दे बैठते है। तो मतलब साफ है, अब लिखना तो हो नहीं पाता, क्योंकि पत्ते की अपनी पागलपंती शुरू होनी थी। 


पीढ़ियों का फर्क: मार, डाँट और सहनशक्ति

    आज अगर मैंने पत्ते की कहानियों की रील बना ली होती, तो पक्का वाइरल जाती। क्या हुआ, कि मैं और पत्ता तो बैठे ही थे, एक और लड़का आ गया। अभी आठवी क्लास में पढ़ता है। बड़ा मिलनसार लड़का है। तो पत्ते को तो बकैती करनी थी, मिल गयी। पत्ते ने उस लड़के से पूछा, "तेरी कभी घर पर पिटाई हुई है?" लड़के ने हाँ में सर हिलाया। पत्ता फिर बोला, "बता, कैसी मार पड़ी है?" लड़के ने कहा, "कभी कोई मस्ती कर दी हो, तो मम्मी ने सर पर टापली जरूर से मारी है।" पत्ते ने तुरंत पूछा, "बाप ने नहीं मारा कभी?" लड़के ने मना किया। बस, पत्ता शुरू हो गया। "अरे हाँ, तू तो gen z है न.. अरे नहीं.. तू तो पता नही कौनसी gen है। तुझे क्या पता सुताई किसे कहते है।"


    मैंने पत्ते को भावना में बहने से रोकने के लिए कहा, "अबे यह वो जनरेशन है, जिसे बाप ने अगर डाँट भी दिया तो मर जाने की बात करने लगती है।" मैं अगर यह बात नहीं कहता, तो पत्ता भावनाओं में बहकर यही बात ऐसे सरल शब्दों के बजाए, वो पुरुषों वाली भाषा मे कह देता। और यह लड़का अभी हमसे काफी छोटा है, तो इसके सामने वह भाषा प्रयोग ठीक न रहता। उतने में एक काम बड़ा सही हुआ। उसकी माँ ने उसे घर पर बुला लिया। वरना वह बेचारा पत्ते के मुख से उच्चारित अमूल्य ज्ञान प्राप्त करके धन्य हो जाता। जरा सा चूक गया। बड़े सही समय पर घर को निकल लिया। अब फिर से मैं और पत्ता.. और यह वीराने सा गरबी चौक। कुछ देर पहले वॉलीबॉल का एक पॉइंट मिस होने पर तूतूमेमें करता शोर फिलहाल नहीं था। पत्ते का अमूल्य वाणीविलास शुरू हुआ। प्रियम्वदा, मेरे हँस हँसकर जबड़े दुःख गए, क्योंकि यह वाणी विलास काफी ज्यादा रेलेटेबल है हम लड़ाकों के लिए, खासकर जिन्हें मिलेनियल्स जनरेशन कहा जाता है। 


बाप की बेल्ट और यादों के निशान

    अच्छा, इस वाणी विलास के उद्गम का एक कारण मैं भी था। क्योंकि हुकुम मेरे लिए घर का मैन गेट खुला छोड़ रहें है। यह बात उन्होंने मुझे फ़ोन करके बताई। इस बात को केंद्र में रखकर पत्ते ने अपने ट्रॉमा शुरू किए। "अबे तुझे आज भी घर पर इतनी इज्जत मिलती है, मतलब तेरे पिताजी तुझे पूछते हैं, कि गेट खुला रखूं या बंद कर दूं? भाई मेरे तो आज भी एक ही नियम चलता है, नियत समय पर घर का गेट बंद होने से पूर्व अग्रिम सूचना दे दी तो ठीक है, वरना बाहर कहीं अपना बंदोबस्त देख लो। एक बार क्या हुआ था, स्कूल में था.. और एक दोस्त का बर्थडे था। उस टाइम तो तुझे भी पता है, बियर के आधे कैन में नशा हो जाता था। तो मेरे घर से दो गली छोड़कर ही उस दोस्त का घर था, जिसका बर्थडे था। दो मंजिला मकान था वह, नीचे पार्टी चल रही थी, और उपर हम लड़कों की पार्टी। मैं आधा कैन पीकर झूम गया। अब उस दोस्त की हवा टाइट, वह टेंशन में, कि मुझे घर कैसे छोड़े। 


    उसने जैसे तैसे अपने घरवालों से बचते-बचाते मुझे अपने घर के बाहर उतार दिया। और वह अपने घर लौट गया। मैं तो नशे में था, मुझे क्या पता, मेरे घर का गेट खुल क्यों नही रहा? मेरी भी हवा टाइट ही थी। घर के बाहर ओटा (सीमेंट का ज़मीन से थोड़ा ऊंचा बैठने लायक स्ट्रक्चर) पर बैठ गया मैं। मैं तो बस बैठा ही था, लेकिन फिर जब आंख खुली, तो उजाला होने लगा था, मेरे पैर के पास एक कुत्ता भी सिमटकर सोया हुआ था। भाई, सुबह हो चुकी थी, मैंने गेट खटखटाया, बापु ने गेट खोला। कुछ खाया तो था नहीं मैंने, तो बापु को मूंह से बियर की बांस (बदबू) आ गयी। मेरे घर के भीतर दाखिल होते ही, पीठ पर एक जोर का पंजा पड़ा। और आवाज सुनाई दी, "मूछ फूटी नहीं है और बियर पिएंगे।" भाई, क्या बताऊँ उस दिन बापु ने तबियत से कूटा था, दे भचिड़.. दे भचिड़.. आज भी याद है, उस टाइम बापु के पास ओरिजिनल लेदर की बेल्ट थी। बड़ी जोर से लगती थी यार.. मुझे एक कमरे में बंद कर दिया था। पूरा दिन मैं कमरे में बंद था। 


    मेरी तो फिर भी एक ही कंप्लेन थी, यार मार लो, लेकिन खाना तो दो.. रात से लेकर अगली शाम ढल गयी। बापु काम से घर लौटे, तब उन्होंने दरवाजा खोला, और फिर से एक बार तबियत से मुझे कूटा गया था। फिर शाम को जाकर खाना मिला। यार उस दिन बड़ा बूरा लगा मुझे, एक तो मारते हो, ऊपर से खाना भी नहीं देते..! चल यह कांड तो फिर भी ठीक था। मैंने छोटी उम्र में बड़े वाला कांड कर दिया था। तो कुटाई बनती थी। लेकिन एक बार तो और बड़ी खतरनाक बात हो गयी..! 


    मुझे अच्छे से याद है, उस दिन मेरा जन्मदिन था। तुझे तो पता होगा, अपनी स्कूलिंग के टाइम पर जिस दिन जिसका बर्थडे हो, वह स्कूल यूनिफॉर्म के बजाए और भी कोई कपड़े पहनकर जा सकता था। तो मेरा जन्मदिन था, मैंने नए कपड़े पहने, एकदम तैयार-वयार होकर स्कूल के लिए जा रहा था। देख भाई, यह सब ट्रॉमा कभी भूले-भुलाएं कहाँ जाते है। मैंने उस दिन बापु के नए नवेले रेड चीफ पहने और स्कूल के लिए निकल पड़ा। उस टाइम तक मेरे और बापु के जूतों का साइज सेम हो चुका था। मैं मस्त स्कूल में अपनी तूती बजाकर आया, कि देखो मैंने दस हज़ार के जूते पहने है। उस समय क्लास में एक क्रश भी हुआ करती थी, वह भी इम्प्रेस हो गयी थी। स्कूल में तो जन्मदिन बहुत बढ़िया गया। लेकिन मुद्दा तो घर पर सुलग चुका था। उस दिन बापु को भी वही जूते पहनकर कहीं जाना था।


    जन्मदिन था तो, शाम को माँ ने पूछा भी, चूरमा खाएगा या हलवा? मैंने हलवा कहा था। खाने बैठा ही था, चम्मच से उठाया ही था, और चम्मच मुँह तक पहुंचे, न पहुंचे, उतने में पीछे से सट्टाक से झापड़ पड़ी। देख, बिलकुल स्लो मोशन में मुझे वह हलवा मेरे हाथ से गिरी चम्मच से उड़कर, टीवी पर चिपकते दिखा था। पीछे मुड़कर देखा, बापु फिर से बेल्ट के साथ तैयार थे। और मैं यह सोचकर परेशान था, कि आज क्या कर दिया मैंने? माँ ने हलवा या चूरमा पूछा उसके पीछे जरूर कोई कारण है। तभी मुझे सुनाई पड़ा, "इतने बड़े पैर हो गए क्या तेरे? बाप के जूते पहनकर चला जाता है। मुझे एक बिज़नेस फंक्शन में चप्पल पहनकर जाना पड़ा.." और फिर से एक बेल्ट ने मेरे पिछवाड़े को छुआ। उस दिन भी बेरहम तरीके से सुताई हुई थी। यार यह सब ट्रौमास ज़िंदगीभर रहने वाले है। 


    एक बात तो है, बापु ने कभी पिछवाड़े के सिवा कहीं नहीं मारा।" उतने में मैं बोल पड़ा। ताकि तेरी क्रश को पता न चल जाए, कि तेरी कुटाई हुई है। हाथ, पैर या पीठ तो दिखाई भी दे जाए, पिछवाड़ा भला कौन देख पाएगा? इस लिए तेरी आबरू बरक़रार रखने के लिए, और जब जब तू बैठे, तब तब तुझे याद आए, कि तेरी मर्यादा क्या है, इस लिए कुटाई इसी तरह की जाती है बे। यूँही बातों बातों में ग्यारह बज गए थे। पत्ते ने और भी इसी तरह के किस्से बताए.. बचपन में अगर माँ-बाप की मार नहीं खायी तो बचपन अधूरा है। 


ज़्यादा लाड़, कम सहनशक्ति

    आज कईं बच्चों को माँ-बाप ने ही इतना खोखला कर दिया है, कि छोटी सी डांट-फटकार में घर छोड़ जाने की बातें करने लगते है। इतना ज्यादा बुरा मान जाते है, कि गलत-सलत कदम उठाने को तैयार हो जाते है। इतना अहम् भर चूका है उनमे, उतना ज्यादा लाड करा दिया गया है, कि अब जरा सी पीड़ा भी उनसे सहन नहीं होती। अगर घर वालों ने ही उन्हें पीड़ा से परिचित करवाया है, तो उनमे अपने आप सहनशक्ति इतनी ज्यादा डेवलप हो जाती है, कि फिर दुनिया की पीड़ा उतनी ज्यादा असरकारक नहीं लगती। 


माँ का प्यार और अनुशासन

    पत्ते की इन सब बातों में मुझे मेरे बचपन का एक किस्सा याद आ गया। अच्छे से याद है, उस टाइम घर का काम चालू था, आधा घर रेनोवेट हो रहा था। दोपहर का समय था, मजदूर लोग बेचारे कुछ देर सोने की कोशिश कर रहे थे, और मैं खेल खेल में बार बार आवाज़ कर रहा था। माँ ने दो बार समझाया, कि शांति से सोने दे उन लोगो को.. मैं नहीं माना.. फिर तो माँ ने भी उस दिन पापा का बेल्ट उठाया था। मुझे भागने के लिए कोई जगह नहीं मिली.. मैं भागा सीधे घर के बाहर, रोड पर काफी ज्यादा दौड़ गया था। काफी देर बाद जब लगा, कि अब माँ का गुस्सा शांत हो गया होगा, मैं वापिस लौटा। माँ ने भी पुचकारते हुए पास बुलाया, मैं पास गया तो तुरंत पीठ पर एक मुक्का पड़ा था। यहाँ मैंने पहली बार जाना था कि माँ भी प्यार से बुला रही हो तब भी सचेत रहना चाहिए..! (हाहाहा)


    चलो प्रियम्वदा !

    यह बहुत सारे ट्रॉमा उगल दिए मैंने। बाकी कल देखेंगे। फ़िलहाल विदा दो। वो शुरुआत वाली हक, क़ुदरत और निति की बात फिर कभी..

    शुभरात्रि। 

    ०४/०१/२०२६

|| अस्तु ||


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