सर्दियाँ, जो इस बार महसूस ही नहीं हुई
प्रियम्वदा !
अब जाकर पोष में कुछ सर्दियाँ आयी है, ऐसा लग रहा है.. छह तारिख तो हो गयी आज, और उत्तरायण के बाद तो वैसे ही कहा जाता है, कि सर्दियाँ खत्म हो गयी। क्या मतलब इस बार केवल आठ दिनों की सर्दियाँ मेरे नसीब में है? इस बार तो प्रियम्वदा एक भी दिन कोहरे वाला नहीं देखा। न ही एक भी बार ताप सेंकने की अनिवार्यता पायी है। बल्कि रात को वॉलीबॉल खेलने से शरीर भीग जरूर जाता है। विकास.. औद्योगिक विकास है यह। प्रकृति को पीछे रखता है यह विकास, इतनी तेज़ी के साथ भागता है।
अकेली बाइक यात्रा और मन के भटकते मोड़
आज कुछ अलग ही ठहराव अनुभव हो रहा है। लंच टाइम में एक लंबी बाइक सफर कर आया हूँ। यह हमेशा से होता आया है, कि अकेले बाइक चलाते हुए कितने सारे विचार आते-जाते रहते है। कितने सारे साहस, और उद्यम करने का निर्धारण यह मन कर बैठता है। जितनी ज्यादा लंबी मजल, उतनी ज्यादा मानसिक परिस्थितिया। रास्तेभर में न जाने कितने ही मोड़ आते है, लेकिन वे सारे ही हमारी मंजिल के लिए नहीं होते। एक ही मोड़ होता है, जो मंजिल तक जाता है। वह अगर चूक गए तो सफर और लंबा हो जाता है। दोपहर को मैंने देखा, शहर का विकास मेरी उस पौधे वाली चुलबुली को विस्थापित कर चूका है।
जीवनपथ के मोड़ और छूटते साथ
अगर जीवनपथ की बात की जाए, तो हम कितने सारे मोड़ से इतनी तेज़ी से गुजर गए होते है, कि बहुत बाद में उस मोड़ की याद आती है। बाल्यावस्था के खिलौने, किशोरावस्था के स्वप्न, युवानी की चार आँखे, यह सारे हमारे जीवन में एक मोड़ नहीं तो और क्या है.. इन्ही ने तो हमारे पथ पर डायवर्जन दिया था। कुछ रास्तों पर हमें अकेले चलना होता है, और कुछ पर हमारे साथ कोई चलता है। उन रास्तो पर आखिर तक कोई भी साथ नहीं चलता, किसी मोड़ पर साथी का रास्ता अलग हो ही जाता है।
आज सवेरे ऑफिस आया, तो फिर से एक बार थोथे लेकर बैठ गया था। इन दो दिनों में कागज़ों पर पेन चला-चलाकर जैसे अंगुलियां ही छील गयी है। अभी तक तो पोष की उन शुष्क हवाओं ने भी यहाँ का रूख किया नहीं है। वे शुष्क हवाएं, जो सब कुछ ही सूखा जाती है, होंठ से लेकर गालों की नमीं। प्रियम्वदा ! रात को घर जाते हुए सर्दियाँ अब मुझे कपकपाती नहीं। जैसे कुछ यातनाओं ने तन मन को इतना बेहोश कर दिया है, कि तत्काल प्रतिक्रिया मुझसे होती नहीं। यह विंटर जैकेट जैसे बस सर्दियों की भावना आहत न हो इसी कारण पहनता हूँ।
आकर्षण का केंद्र और प्रयाग का क्रश
प्रियम्वदा ! किसी की आशा मन में इतनी ज्यादा बसी हुई है, कि क्या वर्णन करूँ। यदि वर्णन करना चाहूँ तो भी मुझे लेखनी के सतत पुनरावर्तन का भय सताता है। तुम्हे तो पता है मेरा हाल.. मेरा आकर्षण। मैं कितने ही आकर्षणों को बाईपास करना चाहू भी तो नहीं कर पाता। कोई न कोई मेरी इस आकर्षण की कमजोरी का लाभ उठा ही लेता है। फ़िलहाल मेरे आकर्षण का केंद्र बना बैठा है प्रयाग। बदलता रहा है, मेरा आकर्षण कभी भी स्थिर नहीं हुआ। जैसे देशवासी समय समय पर क्रश बदलते है। मेरा भी क्रश है प्रयाग।
मन को मारने का सवाल और गांधीवादी द्वंद्व
तुम्हे क्या लगता है.. अगर मन को मार ही देना हो तो क्या करना चाहिए? नहीं, मेरा सवाल बस इसी कारण से है, कि मन यह जानता है, कुछ असंभव स्थानों को, फिर भी वहां जाना चाहता है। बताओ.. यह भी भला कोई बात हुई.. थोड़ा सा गांधीवादी मन है, एक झापड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने को बोलता है। एक तो आकर्षण के मामले भी ऐसे है, कि वहां न उम्र आड़े आती है, न रूप.. आकर्षण को बस आकांक्षा होती है, प्राप्ति की। यह सिर्फ मेरे पास ही होना चाहिए, यह अहम् उस आकर्षण को बल देता है। और इस बल को पाकर आकर्षण मन को प्रवृत्त करता है, आकर्षण के केंद्र के पीछे.. उसे पाओ.. किसी भी कीमत पर.. बस कीमत आबरू न हो।
गीत, रील्स और नीली स्याही का साथ
खेर, आजकल थोथे निपटाते हुए गीत सुनता रहता हूँ। इंस्टाग्राम पर एक रील क्या लाइक कर दी, आफत हो गयी जैसे। "हम तेरे प्यार में सारा आलम.." बस एक यही बजता रहा है। अरे नहीं नहीं.. यह एक अकेला कहाँ.. एक और भी है.. "उनको भी हमसे मुहब्बत हो.. ज़रूरी तो नहीं..." इन दो गानों ने इंस्टा रील की फीड कब्ज़ा ली है। तीसरी रील को घुसने नहीं देते यह दो गाने.. कितनी अलग अलग लड़कियां अपने कंठ को कोयल का रूपक दिलवाने यह गीत मेरी फीड में आकर गा जाती है, और मैं अपने आप को किसी संगीत प्रतियोगिता का परीक्षक मानकर रील को स्वाइप अप किए देता हूँ।
मजाक से हटकर कहूं, तो यह दोनों ही गीत काफी ज्यादा रिलेटेबल लगते है। शायद इसी कारण से थोथे में चलती नीली स्याही को कानों में सुनाई पड़ते इन गीतों के बोल का बल प्रेरक बनता है। जब यह दोनों गीतों से मन थोड़ा भर जाता है, तो फिर फरीद अयाज़ की कव्वालियां गूंजने लगती है। "मेरे बने की बात न पूछो..
स्पर्शहीन उँगलियाँ और फिर भी पूरी होती दिलायरी
अरे यार, मैं भी कभी कभी पड़ी लकड़ी उठा लेता हूँ। दरअसल एक रबर स्टाम्प की रबर निकलने लगी थी। तो सोचा फेवीक्विक से चिपका दू। फेवीक्विक खुद ही सूखी पड़ी थी। तो एक और स्ट्रांग एडहेसिव आती है, जो लकड़ी चिपकाने में उपयोगी होती है। अब वो थी तो लिक्विड फॉर्म में, मतलब सूख नहीं गयी थी। लेकिन उसका ढक्कन खुद चिपक गया हुआ था। अब अपन ठहरे बुद्धि से ज्यादा बल आजमाने वाले इंसान.. ढक्कन पर थोड़ा ज्यादा जोर दे दिया, ढक्कन ने तो अपना अस्तित्व ही मिटा दिया। टूट गया। और भीतर का सारा मलबा मेरे हाथों में। दो-दो अंगुलियां, और दोनों अंगूठे अब मुझे कड़क हुए अनुभव होते है। जैसे स्पर्श से अनुभवहीन हो चूका हूँ मैं। उस अंगुली और अंगूठे की चमड़ी पर उस सोलुशन की एक परत चढ़ चुकी है।
खेर, अब अंगुली का वह भाग, जो यह टाइप करते हुए कीबोर्ड का स्पर्श करता है, वह स्पर्शहीन अनुभव हो रहा है, लेकिन फिर भी यह दिलायरी तो पूरी करनी होगी। मैं अक्सर फरीद अय्याज़ को सुनता हूँ। अक्सर उन गीतों में प्रेमिका का रूपक देकर किसी अज्ञात चेतना जो संबोधित किया जाता है, जिसे हम ऊपरवाला कहते है। अपने आप को उसका दास मानकर रची गयी यह रचनाएं कुछ तो असर करती है मुझपर, जिसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। मुझे वह ताल ज्यादा पसंद आता है, थोड़ा तीव्र थोड़ा गतिवन्त।
शुभरात्रि।
०६/०१/२०२६
|| अस्तु ||
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