नीति, शतरंज का राजा और शांति की विडंबना | अकेलेपन का धर्म || दिलायरी : 05/01/2026

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जीवन में नीति क्यों सब कुछ है?

    प्रियम्वदा !

    वैसे तो यह बात मैं पहले किसी दिलायरी में लिख चूका हूँ, लेकिन मुझे पसंद है, और मैं इस बात में मानता हूँ, इस लिए फिर से लिख रहा हूँ, कि "जीवन में निति ही सब कुछ है। निति सही है, तो स्वयं प्रकृति तुम्हे संभाल लेती है। और निति के बजाए अनीति का आचरण किया जा रहा है, तो वहां प्रकृति भी विपक्ष में खड़ी हो जाती है।" यह बात मैंने कईं बार अनुभव की है। नहीं, मैं अपने आप का बखान नहीं कर रहा, या मैं अपने आप नीतिवान होने का ख़िताब धारण नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ, कि मैंने समय समय पर अनुभव किया है, मुझे जरुरत होती है, तब प्रकृति स्वयं मेरे निभाव की व्यवस्था कर देती है। 


नीति और उत्तरदायित्व का प्रतीक — शतरंज के राजा की तरह अकेला खड़ा व्यक्ति, सादे सफेद पृष्ठभूमि में कार्टून चित्र

अहम, द्वंद्व और नीति की कसौटी

    अभी अभी दिन पूरी तरह से खत्म हुआ है। क्योंकि मैं वॉलीबॉल खेलकर लौट रहा हूँ। समस्या यह है, कि क्या लिखूंगा आज? दिनभर तो थोथे निपटाते बीता है। सवेरे लेट उठता हूँ, और आलस के मारे जगन्नाथ को ध्वज प्रणाम करके सिगरेट का दम ले लेता हूँ। यूँ तो काफी सही रहा है दिन। दोपहर बाद एक युद्ध होते होते टला है। अहम का टकराव होते होते रह गया। नीति ने आज मुझे हमारे वालों के ही खिलाफ खड़ा कर दिया था। मेरे अधिकार के क्षेत्र में, मेरा कोई अपना भी अगर अनधिकृत खलल करता है, तो वह मेरा विरोधी है। इस नीति के चलते आज मेरे अहम ने मेरे जैसे अहम से ही द्वंद्व करने का निर्धारित कर लिया था। युद्ध हो ही जाता, अगर बनियों की बुद्धि बीच मे न कूदती।


शतरंज का राजा और उत्तरदायित्व की चाल

    प्रियम्वदा, एक स्पष्ट नीति होती है, तो उसका बल हमें कभी भी गिरने नहीं देता। बल्कि और भी लोग उसका अनुकरण करतें है। आपको पता भी नहीं चलता, आपके पीछे कितने सारे लोग खड़े हो जाते है। बात विद्रोह की नहीं है, न ही राजनीति है। वह नीति जो आपके चरित्र का निर्माण करे। वह नीति जो दूसरों के मुकाबले आपको दृढ़ माने। शतरंज के राजा जैसी नीति। प्रत्येक दिशा में केवल एक ही कदम। शतरंज के वजीर(रानी) के पास सर्वश्रेष्ठ सत्ता है, लेकिन फिर भी वह कभी राजा का स्थान नहीं ले सकता। प्रियम्वदा, यह भी विचारणीय है, कि राजा राजा होने के बावजूद एक कदम की ही चाल कर सकता है। उसे कौन रोकता है? उसकी स्वयं की नीति। उसके आदेश की नीति। उसे अपने ऊंट का बलिदान देकर हाथी को बचाने का उत्तरदायित्व संभालना होता है। जिनके पास उत्तरदायित्व होता है, वे प्रत्येक दिशा में एक कदम से ज्यादा चलने का संकट पाल नहीं सकते।


शक्ति, ऐश्वर्य और सामर्थ्य पर होने वाले आक्रमण

    तुम्हे पता है प्रियम्वदा, कईं बार हमारे आसपास के लोग भी इसी तरह शतरंज की चालें चलते रहते है। वे हमारे हाथी, घोड़े, ऊंट सबको ही मार देने की कोशिश करते है। हाथी ऐश्वर्य हुआ, घोड़ा शक्ति हुआ, ऊंट सामर्थ्य हुआ.. जब इन प्रतीकों पर आक्रमण होता है, तब राजा कितने ज्यादा मानसिक तनाव को झेलता होगा? यह बात राजा के अलावा कौन समझा सकता है..! खेर छोड़ो यह सब, अमरीका का कांड सुना, वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को उठा लाया अपने देश मे। ऐसा कौन करता है यार.. मैं तो राह देख रहा था, कि काश अफ़ग़ानिस्तान की ही तरह अमरीका फंस जाए वेनेज़ुएला में। लेकिन रातभर में ही मामला सेट कर दिया ट्रंप चाचा ने।सारी आशाएं मेरी छन से टूट गयी। मतलब जगत जमादार है, तो कुछ भी करेगा क्या? अपने देश मे दूसरे देश के प्रतिनिधि को सजा सुनाएगा, अपने कानून के अनुसार..! 


राष्ट्रों की नीति और शांति की हिंसक स्थापना

    हाँ वैसे यह पहले भी हुआ है। अपने देश मे भी एक साम्राज्य दूसरे साम्राज्य के सम्राट को इसी तरह बंदी बनाकर उसे सजा सुनाया करते थे। धीरे धीरे दक्षिण अमेरिका को इसी तरह USA अपनी नीति का अनुसरण करने को मजबूर करता है। हर देश ऐसा ही चाहेगा, कि अपना पड़ोसी अपने अधीन होकर रहे। भारत सरकार भी तो यही करती है। समय समय पर सारे पड़ोसियों को दबाया करती है, ताकि वे हमारे लिए आफत न बने। मालदीव्स, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश.. पाकिस्तान का क्या है, उसे तो अभी स्थगित ऑपरेशन सिंदूर का अधूरा स्वाद ही चखा है। बांग्लादेश में फिलहाल भारत का नियंत्रण उतना नहीं है, वरना शेख हसीना के समय पर वह पूरा था।


महाभारत, धर्म और नीति का यथार्थ

    हमें अपनी उन्नति और लाभ के हेतु, अपनी शांति के हेतु, अन्य को हानि भी पहुंचानी पड़े अगर, तो यह धर्म हुआ या नहीं? महाभारत का धर्म यही था? पांडवों ने अपने अधिकार, और शांति की स्थापना के लिए इस पुरे महाद्वीप को युद्ध की अग्नि में होम नहीं दिया था..! एक स्थिर सत्ता को समय समय पर बल प्रयोग करके शांति का निभाव करते रहना पड़ता है। कितनी अजीब बात है न, शांति की स्थापना के लिए भी अशांति का मार्ग लेना पड़ता है। दुनिया में हर चीज इसी तरह काम करती है। एक दूसरे के विरोधाभाषी एक दूसरे के लिए काम भी करते है। 


नीति का अकेलापन और इतिहास की स्मृति

    खेर, हम या हमारे आसपास एक स्पष्ट नीति होती है, तो उस चरित्र का आंकलन भी होता है। हमारी नीति के विरुद्ध कब कौनसी चाल चलनी है, यह विरोधी स्पष्ट रूप से समझ सकते है। धर्मराज युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलते थे, तो विपक्ष में होकर भी आचार्य द्रोण ने उनसे ही पूछा था, "क्या सच में अश्वत्थामा मारा गया?" धर्मराज की यह नीति थी, और इस नीति को अपने रक्षात्मक व्यूह में सटीक बिठाने के लिए अश्वत्थामा नामक हाथी को स्वर्गस्थ करना पड़ा था। नीति हमें बचाती है, हमें नीति को भी बचाना पड़ता है। 


   नीति का सबसे बड़ा गुण ही यही है, कि नीति अपने आप में पूर्वानुमेय है। जब लोग जान लेते है, कि यह व्यक्ति यहाँ समझौता नहीं करेगा, तब आधे संघर्ष तो वहीँ समाप्त हो जाते है। तुम्हें पता है प्रियम्वदा ! नीति कभी भीड़ के लिए नहीं बनती। वह हमेशा एक अकेले के लिए बनती है। भीड़ हमेशा सुविधा चुनती है। नीति अकेलापन। इस लिए कईं बार आप अकेले को अपनों के सामने कठोर दिखना पड़ता है। असल चरित्र वहीँ से शुरू होता है। यही कारण है, कि नीतिवान अकेला होता है। नीति हमें बचाती जरूर है, लेकिन साहस मांगती है। नीति पर चलने वाला सही होता है, लेकिन अकेला पड़ जाता है। फिर भी इतिहास अकेलों को याद रखता है, भीड़ को नहीं। 


    शुभरात्रि। 

    ०५/०१/२०२६ 

|| अस्तु ||


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