दैनिक लेखन का द्वंद्व: आदत, अहम् और अधूरी स्फुरणा || दिलायरी 15/01/2026

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एक दिन की छुट्टी और टूटी हुई नियमितता

    प्रियम्वदा !

    एक दिन की ही तो छुट्टी ली थी.. लेकिन कुछ आदतें - नियमितता भंग होने के बाद कुछ अजीब सा ही लगता है। फ़िलहाल शाम के छह बज रहे है। और मैं समय रहते दिलायरी लिख लेना चाह तो रहा हूँ, लेकिन ऐसे कोई विचार ढूंढने पर भी नहीं मिल रहे है। एक तो बीते दो दिन की दिलायरियाँ फोन पर लिखी थी, इसी कारण से आज कंप्यूटर पर लिखते हुए थोड़ा अलग लग रहा है। 


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किताबें, मोबाइल और बिनपढ़े पन्नों का विरह

    तो बात ऐसी है, आज का दिन तो गया है बर्बाद। सवेरे से लेकर अब तक बस कुछ गिने-चुने काम थे, वे निपटाने के बाद बस आराम ही फ़रमाया है। क्या करता.. आजकल तो कोई बुक पढ़ने का भी मन नहीं करता है। कितनी सारी पुस्तकें घर पर पड़ी है, जो बस ऑर्डर हुई, पते तक पहुंची, और अलमारी में बंद हो गयी। वे पुस्तकें अपने भीतर एक कहानी लिए बैठी है, लेकिन उनकी वर्तमान कहानी अलग चल रही है, वे बिनपढ़े पुस्तकों का मेरे प्रति विरहकाल चल रहा है। समय की कमी नहीं है मेरे पास.. वह समय जो पुस्तकों को मिलना चाहिए, वह मोबाइल खाए जा रहा है। या फिर यह दिलायरी में क्या लिखूंगा यह सोच.. 


लेखन में गिरावट का आत्मबोध

    सच में, मैं कभी भी अपने निर्धारित विचारों का आचरण नहीं कर पाता हूँ। अरे मतलब जुबान का तो पक्का हूँ.. बस यह पुस्तकों के पठन के मामले में, मैं धोखेबाज़ हूँ। फरेबी भी कह सकता हूँ अपने आप को इस मामले में। क्योंकि मैं कईं बार किसी पुस्तक को एक हाथ में लेकर दूसरे हाथ के फ़ोन में नज़रें गड़ा लेता हूँ। आखरी बार शायद मैंने बैठकर कोई किताब पढ़ी थी, तो वह मुअनजोदड़ो थी। है वैसे अभी अभी दिमाग में एक बुक पढ़ने का कीड़ा पाल तो रहा हूँ, और उसे इंटरनेट की अलमारी से खोज भी चूका हूँ। लेकिन मैं नहीं चाहता कि मैं अभी से उसे यहां लिख दू। ताकि कल को मैं अगर पूरी न पढूं, तो कोई मुझे फिर से धोखेबाज़ कह दे। 


दैनिक दिलायरी या स्फुरणा का लेखन?

    हकीकत में तो मैं यह भी सोच रहा हूँ, कि यह दैनिक दिलायरी भी अनिश्चित कर दू। क्योंकि यह मेरे दिवसभर में एकाध घंटा तो खा ही जाती है। और सच बताऊँ, तो हकीकत में अपनी लेखनी को गिरती जाती अनुभव कर रहा हूँ। अब यह सीधे सीधे वाक्य इतने रसप्रद नहीं लग रहे मुझे। इन वाक्यों में रूपकों की, अलंकारों की कमी खलती है। बस यही कारण है, कि एक लंबा ब्रेक ले लेना बेहतर रहेगा। मैं थोड़ा कंजूस भी तो हूँ, मुझे तुरंत ख्याल आता है, जब दैनिक लिख नहीं सकते, तो फिर यह डोमेन खरीदना, और वेबसाइट होस्ट करना, वगेरे खरचे क्यों पाले हैं.. जबकि हकीकत यही है, कि दैनिक तो अब नहीं ही लिख सकता हूँ मैं। लेकिन इस विचार को हटाकर मनमे दूसरा विचार कब्ज़ा कर लेता है, कि यह इकलौता ऐसा खर्च है, जिसे मैं हकीकत में पालना चाहता हूँ। यह इकलौता शौक है, जिसे मैं लम्बे समय तक निभाना चाहता हूँ। 


समय, नींद और ज़िम्मेदारियों के बीच लेखन

    तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, जब ऐसे दो मन हो.. तब क्या करना चाहिए.. मैं दैनिक लिखना चाहता भी हूँ, लेकिन लिख पा भी नहीं रहा हूँ। समय की कमी.. नौकरी करो, घर संभालो, अन्य शौक के लिए समय निकालो, सोशल मीडिया का दिखावा संभालो, क्या-क्या.. कैसे-कैसे.. पिछले एक वर्ष से तो मैं अपनी दिलायरियों में मेरी निश्चित दिनचर्या तो तुम्हे बता ही चूका हूँ। सवेरे सात बजे के आसपास उठता हूँ। नौ बजे तक ऑफिस। एक से तीन लंच टाइम। रात आठ बजे के बाद घर। फिर नौ से ग्यारह वॉलीबॉल। वॉलीबॉल स्किप न कर पाने का कारण एकमात्र शारीरिक मेहनत करना ही है। क्योंकि दिनभर ऑफिस में बैठे रहते आलसी शरीर का पसीना बस वॉलीबॉल के खेल में ही बहता है। 


अपेक्षाएँ, तुलना और अपनी लेखनी से असंतोष

    अब इतनी व्यस्तता के बिच मैं अपनी नींद में कटौती नहीं कर सकता। बारह बजे तक सो जाता हूँ, और सात बजे उठ जाता हूँ। चौबीस में से सात घंटे की नींद लेना तो सबसे ज्यादा जरूरी है। और वैसे भी जब भी मेरी नींद अधूरी रहती है, मेरा पूरा दिन बेकार जाता है। बेमन भरे दिन से तो ऐसा व्यस्त दिन ज्यादा बेहतर है। यूँ तो यह लेखन भी कोई ऑफिस का पंचिंग मशीन थोड़े है, कि प्रतिदिन ही इसे लिखा जाए? यह तो स्फुरणा का विषय है। लेकिन शायद मैंने अपने अहम् के पोषण के लिए इसे दैनिक लिखा है। खुद की तारीफ़ के लिए कहूं तो, अपनी क्षमताओं को समझ लिया मैंने। 


अधूरे ख्वाबों की सूची में एक और नाम

    देख लो, छह बजे शुरू किया था, और अभी साढ़े सात बज रहे हैं। डेढ़ घंटे में बस यहीं तक पहुंचा हूँ। यह सारा ही मैं दोबारा पढ़ चूका हूँ। आज की दिलायरी वाकई दिलायरी बनी है। खुद को जैसा हूँ वैसा दिखाने वाली दिलायरी। यही तो इसका उद्देश्य था। प्रियम्वदा, बस आधा घंटा शेष है ऑफिस ड्यूटी पूरा होने में। और यह लिख लेने के लिए भी। मुझे यह ख्याल भी आ रहा है, कि शायद समस्या यह नहीं है, कि मैं रोज़ नहीं लिख पा रहा हूँ। समस्या यह है, कि मैं हररोज के इस लेखन से संतुष्ट नहीं हो पा रहा हूँ। जब दूसरों को जब भी समय मिले पढता हूँ, तो अपनी इस लेखनी को बहुत निम्न पाता हूँ। अपनी लेखनी से अंगार चाहा था मैंने, लेकिन यह तो सदाबहार सी बन गयी है। जो खिलता तो हमेशा है, लेकिन गुलाब या कमल जैसी चाहत नहीं पा सकता। 


    ठीक है, वैसे भी हमेशा जो चाहा हो वैसा ही हो यह जरुरी भी तो नहीं है। सारी कामनाएं पूरी हो, यह तो समय पर निर्भर है। मेरी उन अधूरे ख्वाबों में यह भी शामिल हो जाए, तो क्या गलत है.. वैसे मेरी इस अपनी ही अच्छे के कक्षा से उतर चुकी लेखनी का कारण मैं जानता हूँ.. लेकिन वह फिर कभी..!


    फ़िलहाल के लिए, शुभस्य शीघ्रम,
    शुभरात्रि। 

    १५/०१/२०२६

|| अस्तु ||


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