खोज, जो कभी पूरी नहीं होती
गरबीचौक का एकांत और रात की आवाज़ें
प्रियम्वदा !
कईं बार खोज का परिणाम शून्य होता है। जो भी खोज रहे होतें है, वह मिलता नहीं। हम चाहे कितना ही भटकें, चाहे कितना ही विवशतापूर्ण कामनाएं कर ले, कुछ खोज की अवधि नहीं होती। वह निरंतर चलती रहती है। अब वह खोज किसी वस्तु की हो सकती है, किसी भावना की, या किसी व्यक्ति भी.. कुछ खोज कभी भी परिणाम को नहीं पाती। फिलहाल यह गरबीचौक का एकांत बड़ा रास आ रहा है। इस एकांत में बस नजदीकी नेशनल-हाइवे से विकास को ले जाते ट्रक्स ही खलल पहुंचा रहें है। हाँ, कुछ झींगुर भी है। बाकी ठंड से मुकाबला करने के लिए जल रही इन लकड़ियों में से तड़-तड़-तड़ की आवाज़ के सिवा तो भरपूर शांति है। अरे नहीं.. देखो, टिटहरी बोल पड़ी। उसे भी इस शांति से शिकायत है शायद, या फिर उसके एकांत को किसी ने आहत किया है।
दिन का घमासान और दोपहर बाद की शांति
कमाल का था आज का दिन। दोपहर से पूर्व घमासान, और दोपहर के बाद मानों समरांगण में जय-पराजय के फेंसलें के बाद की शांति। पिछले कुछ दिनों से फिर से मैं कुछ बदलाव चाहने में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ, मावा छोड़ दूं। लेकिन कोई भी व्यसन कभी छूट पाया है भला? अपने आप को भी गिन लो प्रियम्वदा। लो, किसी का दूध वाला अब आया है.. रात के दस बजे..! सवेरे जगन्नाथ के पास पहुंचा, दादा मस्त अपना सारा श्रृंगार किए बस बड़ी बड़ी आंखे खोले बैठे हुए थे। वही अपना नित्यक्रम है, दर्शन करो, कपाल में तिलक करो, एयर निकल लो। वहां से दुकान, एक सिगरेट, एक मावा, और फिर सीधा ऑफिस। हाँ, आजकल फिर से ट्रैफिक जाम होता है। डेली होता है। बाइक का फायदा यही है, कि ट्रकों के बीच बने गलियारों से गुजरते है, ट्रैफिक को चीर सकतें है।
व्यसन, बदलाव और मन की कशमकश
दिलायरी तो लिखी हुई थी, बस उसे मठारना बाकी था, सवेरे ऑफिस पहुचंकर सबसे पहले वही किया। पोस्ट पब्लिश की, और स्नेही को भेज दी। अरे हाँ! स्नेही आजकल कहानियां सुनाता है। रात को बारह बारह बजे तक.. मैं कुछ देर सुनता हूँ, और फिर मुझे नींद आने लगती है। जैसे ही नींद आने वाली होती है, स्नेही की बातें शुरू हो जाती है। खेर, पता चला, कि बैंक से कुछ काम निकलवाने है। और बड़े अर्जेंट भी है। तो लग गया, कानों में ब्लूटूथ लगाकर, सिंधी कलाम सुनते रहता हूँ। हैं, बहुत सारे शब्द समझने में मुश्किल है, लेकिन कच्छी और सिंधी बहुत ज्यादा मिलती झूलती भाषा है, तो काफी कुछ समझ आ भी जाता है, सिंधी में उर्दू शब्द भी भर भर कर है, तो और भी आसान हो जाता है। ज्यादा मजेदार तो वे महफ़िल गीत लगते है। लेकिन सिंधी कलाम भी काफी अच्छे लगते हैं।
ऑफिस, बैंक, भंडारा और थकान की परतें
प्रियम्वदा, दोपहर का एक बज रहा था। मैं ऑफिस में बैंक वालों की प्रोसेसेस पूरी कर रहा था। ऑफिस के बाहर भंडारा शुरू हो चुका था। मैं जानता था, भंडारा आज कर दिया, मतलब दोपहर बाद मशीनें बंद रहेगी। लेबर को खाने के बाद चाहिए होता है आराम। और भंडारा तीन बजे तक चला। अब तीन बजे तो वापिस मशीन्स चालू करनी होती है। फिर आराम कहाँ हुआ? ऊपर से भंडारे के अलग अलग पकवान खाने के बाद तो मुझे भी नींद आने लगी थी, जबकि मैं तो ऑफिस में बैठा ही रहता हूँ। मैं खुद इन बैंक वालों से उलझ कर तीन बजे भोजन को प्राप्त हुआ हूँ। बिल्कुल ठंडी पूरियां, ठंडे छोले, ठंडा हलवा.. गाजर के हलवे में लौकी भी मिला दी थी, केटरिंग वाला चालू था। जानता था, इतने सारे लोगों को गाजर का हलवा पूरा नहीं पडेगा। खेर, असमय खाना खाकर मैं तो फिर से अपने कामों में लग गया था। काफी सारे हिसाब किताब मुझे करने बाकी थे। हाँ, धीरे धीरे मैं अपने नए कामों को अपनाते हुए, पुराने कामों का भार पुष्पा पर डालने लगा हूँ।
उत्तरायण, बाज़ार और अधूरी खोज
आज भी कुछ काम उसे पकड़ाकर मैंने अपनी जिम्मेदारियों से थोड़ी सी जल्दी राहत पाई थी। दोपहर बाद बंद मशीनों के बावजूद हम ऑफिस वाले जीवों को मुक्ति कहाँ मिलती है? हमें तो थोथों में भी अपना सर फोड़ना होता है। ऊपर से मेरा तो काम ही खातों से जुड़ा हुआ है। छह बज गए, थोथों से सर उठाया तब तक अंधेरों ने घेर लिया था। सोचा अब मार्किट चल पड़ता हूँ। कल उत्तरायण है, पतंगोत्सव.. मैं तो अब नहीं उड़ाता पतंग.. पहले खूब उड़ाई है। कुछ रील्स देखी थी, उसमे एक नई टाइप की आइटम मार्किट में आई है, फिशिंग रोड जैसी एक प्लास्टिक की रॉड होती है, उसमे पतंग बांध देने से छोटे बच्चे भी पतंग उड़ा सकते है। तो वही चीज मुझे चाहिए थी कुँवरुभा के लिए। रात के आठ बजे तक एक स्टॉल से दूसरे स्टॉल तक भटका, एक भी जगह वो पतंग नहीं मिली। शायद मैं लेट हो चुका था, वह चीज मार्किट में आकर खत्म भी हो गयी थी। फिर कुँवरुभा के लिए वो कनपट्टी ले ली.. अरे वही.. हेडफोन जैसी चीज, जिसमे हाथ के पास एक पंप होता है, उसे दबाने से हेडफोन पर लगे कान खड़े हो जाते है.. लोग भी पता नहीं क्या क्या बेवकूफ बनाने वाली चीजें बनाते है, और हमें देखादेखी में खरीदनी पड़ती है।
अग्नि की लपटें और मौन से संवाद
प्रियम्वदा, तुमने कभी अग्नि की लपटों को अपलक देखा है? अंधेरे में इन लपटों का रंग मुझे बड़ा आकर्षित करता है। लकड़ी जलती है, तो लकड़ी को सटकर अग्नि नीली होती है, केंद्र में कालापन, थोड़ी ऊंची लपट पीले रंग की, फिर हल्का केसरी, और अंत मे लाल... हवा के साथ यह लपटें कैसी मस्ती में झूमती है। जैसे नाच रही हो। कभी तीव्र, कभी मंद, कभी भभक उठना, तो कभी अपना स्थान धुएं को देकर वापिस छीन लेना। बड़ा ही मजेदार लगता है यह दृश्य। मैं काफी देर से इन लपटों को देख रहा हूँ। हवाएं तेज़ होती है, तो वे जैसे छिप जाती है कहीं। फिर हवा के दूसरे झौंके के साथ लौट आती है। पहले से ज्यादा तीव्र होकर। अग्नि की इन लपटों की अपनी खुद की आवाज भी है। वे हवाओं के साथ शायद बातें करती है। बीच बीच मे लकड़ी टोकती भी है शायद। ग्यारह बजने को आए हैं। कल तो पूरा दिन छुट्टी पर रहूंगा। और यह दिलायरी भी इसी नॉट में पड़ी रहेगी। या फिर हो सकता है इसे फोन से ही पब्लिश कर दूं। या न भी करूँ। ब्लॉगर पर पोस्ट पब्लिश करते समय कुछ जरूरी फंक्शन्स मोबाइल एप्प से पब्लिश करते समय नही दिखते। इसी कारण से मैं पोस्ट्स को कंप्यूटर से ही पोस्ट करना पसंद करता हूँ।
प्रियम्वदा, चलो फिर, आज की बातों को यहीं अस्तु करतें है।
शुभरात्रि।
१३/०१/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
और अपनी खोज को शब्दों में पहचानिए।
Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
और भी पढ़ें :
• एकतरफ़ा प्रेम, ईश्वर के सवाल और उत्तरायण का द्वंद्व || दिलायरी : 12/01/2026
• मैं खुद से मिलने निकला हूँ..! || Day 29 || वक़्त ने क्या बदला..
• मैं खुद से मिलने निकला हूँ..! || Day 28 || दर्द से दोस्ती..
• सरकारी बस, सत्ता का भाषण और टूटा हुआ सफर || दिलायरी : 11/01/2026
• लिखने की जरा सी भी इच्छा है नहीं.. || दिलायरी : 10/01/2026

