उत्तरायण, पतंगें और हम | बदलते समय की एक दिलायरी : 14/01/2026

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उत्तरायण का खगोलीय सच और लोक-उत्सव

    प्रियम्वदा, 

    उत्तरायण की अनंत शुभकामनाएं। खगोलीय गतिविधि में सूर्य अब दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ना शुरू होगा। सूर्य तो केंद्र में स्थिर है, लेकिन पृथ्वी अपनी धुरी पर 23.5° झुकी हुई है, इस लिए हमें लगता है, सूर्य ने अपनी दिशा बदली। इंशोर्ट सूर्य मकर राशि मे प्रवेश करता है, और अब से दिन लंबय होना शुरू हो जाएंगे। मेरी प्रिय सर्दियां जा रही है। खत्म हो रही है। इस बार तो सर्दियां भी वाकई धोखा दे गई है। दिवसभर में ठंड अनुभव न हुई तो सर्दियां थी ही नहीं। चलो जो भी हो.. उत्तरायण का गुजरात मे तो एक ही अर्थ है, पतंगोत्सव। पूरा आसमान आज सार्वजनिक युद्ध मैदान बन जाता है। शस्त्रास्त्र होता है डोर और पतंग। लोग महीनेभर पहले से तैयारियां कर लेते है। कांच का चूरा मिलाकर सूती डोर को इतना तेज करवाते है, कि किसी और की पतंग आसपास भटक ही न सकें।


उत्तरायण की छत पर पिता और बच्चे द्वारा पतंग उड़ाते हुए, बदलते समय और स्मृतियों का प्रतीक

गुजरात की उत्तरायण: पतंगों का युद्ध और उत्सव

    यूँ तो मैंने कल शाम को ही एलान कर दिया था, की उत्तरायण के दिन मैं छुट्टी पर रहूंगा। लेकिन फिर भी सवेरे सवेरे कुछ टेलिफोनिक नौकरी तो करनी ही पड़ी थी। सवेरे आराम से साढ़े आठ बजे उठा। नहाधोकर तैयार हुआ, तो माताजी ने मंदिर ले जाने का आग्रह किया। आज है उत्तरायण, और आज कहीं भी जाना हो तो सविशेष ध्यान रखना पड़ता है। एक तो कार होने के बावजूद माताजी को बाइक पर ही जाना होता है। कार में उन्हें उल्टी की दिक्कत है। बाइक को शेल्फ लगाते ही कुँवरुभा कूद पड़े, मैं भी आऊंगा..! उन्हें आगे बिठा दिया। उन्होंने अपने कानों पर वो कल वाला फूंतरु लगा लिया था। सवेरे सवेरे का समय था, अभी तक ज्यादा पतंगबाजी हो नहीं रही थी। मंदिर पर दर्शन किए, और वापसी में घोड़े की शेप वाला बलून कुँवरुभा को दिलाया। जगन्नाथ के दर्शन किए बिना कैसे चल सकता है? क्योंकि जगन्नाथ के दर्शन करूँगा, तभी तो दुकान पर जा पाऊंगा। 


परिवार, परंपरा और छत पर बिताया एक दिन

    जगन्नाथ के पास पहुंचा, आज वहां किसी शिपिंग वाले ने एक साथ पन्द्रह ट्रक्स लिए थे, तो उसने पूजा और भण्डारा करवाया था। इसी कारण से बहुत ज्यादा भीड़ थी। मैं मंदिर परिसर में दाखिल हुआ ही था, कि एक गांव का आदमी मिल गया। मेरे ही गांव का। तो उसे अपने घर चाय पानी के लिए ले गया। बारह बज गए थे, इन्ही सब में। फिर उन्हें लेकर और अपने भाइयों के पास चल दिया। मुझसे छोटे है, और भरपूर युवानी में है। वही युवानी, जिसे मैं पागलपन कहता हूँ, जो मैं भी जी चुका हूँ। उस समय पर वह पागलपन नहीं लगता। दबंगई, दबदबा.. टाइप.. जहां अहम सर्वोपरि होता है। मैंने कहा दिया तो होकर रहेगा टाइप फिल्लिंगस..! बड़ा अच्छा डायलॉग याद आया, 


"रजवाड़ा घाटा मंजूर कर शकता है,

लेकिन तौहीन नही,

हवेलियाँ चाहे बिकती रहे,

पर मुजरा तो होके रहेगा.."


युवानी, दबंगई और बदलता सामाजिक शोर

    बीसी का तौर तरीका अलग ही होता है। युवा लड़ाके खुली छत पर महफ़िल जमाए बैठे थे। सारे ही अलग मस्ती में थे। मैं वो गांव वाले भाई को उतार कर चल दिया। मुझे पता था, मैं बैठ जाऊंगा, तो यह बड़े छोटे वाला मलाजा हमारे बीच रहता नहीं, यार दोस्त बन जाते है। लेकिन मुझे फोन पर फोन करके, आधे रास्ते से वापिस बुलाया। छत पर महफ़िल लगी हुई थी। बड़े बड़े साउंड स्पीकर्स, चिल्ड ठंडे कैन, और भाइयों की हाहा-हीही...! मेरे पहुंचते ही, गला ठंडा करने की पेशकश हुई। बिल्कुल ही तिरंगे के ब्रिगेडियर सूर्यदेवसिंह की महफ़िल की ही तरह ताल था, नाच रहे थे, झूम रहे थे। उत्तरायण के अवसर पर सोशल मीडिया के लिए हाथ मे पतंग और फिरकी पकड़कर अच्छे खासे पोज़ में लड़के फोटो खिंचवा रहे थे। मैं कुछ देर बैठा और बिल्कुल ही मलाजा चुक जाए उससे पहले निकल लिया। सारे भाइयों में बड़ा हूँ, यह बात मुझे याद रखनी पड़ती है।


पतंग, डोर और जीवन के रूपक

    घर लौटा, एक बज रहा था। कुँवरुभा मेरी ही राह तकते बैठे थे। शाम के छह बजे तक, पतंगे ही उड़ाई है। पतंग उड़ाओ, हवामें स्थिर हो जाए, तो डोर कुँवरुभा के हाथ मे दे दो। कोई पेच लड़ाकर काट जाए, तो फिर दूसरी उड़ाओ, और फिर से हवा में ऊंचाई पर स्थिर करके कुँवरुभा को पकड़ा दो। शाम को नीचे उतर रहा था, तब देखा, पूरी छत उलझे हुए मांजे से भरी पड़ी थी। कितने सारे पतंग फ़टे-चिन्थरे से पड़े थे। शाम होते ही सारे स्पीकर्स शांत हो चुके थे। प्रियम्वदा, यह पतंगबाज़ी भी बड़ी दिलचस्प चीज है। इसमें कितने सारे रूपक यूँ नज़रों के सामने पड़े रहते है.. जैसे उलझी हुई डोर.. अक्सर लेखक, कवि इन उलझी डोर का रूपक जीवन की अनियमितता के लिए कहते है। कुछ देर पहले तक गरबी चौक में आग सेंकते हुए, रील्स देख रहा था, और यह दिलायरी भी लिख रहा था। कितनी सारी आशिक़ी वाली शायरियां आयी.. कोई कटी पतंग को बेवफा सनम कह रहा था, कोई आकाश में उड़ रही पतंग में अपनी प्रिया ढूंढ रहा था। कुछ कल्पना के कामदार तो पतंग और डोर को एक प्रेमी जोड़े के रूप में देखते है।


क्या उत्तरायण बदल रही है, या हम?

    प्रियम्वदा ! सच कहूं, तो अब उत्तरायण में वह पहले वाली मौज नहीं आती। हाँ वैसे उत्तरायण तो आज भी वैसी है, लेकिन हम बड़े जो हो गए है। पहले तो महीनेभर पहले से पतंग उड़ाने लगते। स्कूल से आकर लेशन-वेशन (होमवर्क) वगेरे जल्दी से निपटाकर सीधे पतंग और डोर लेकर खुले आसमान के नीचे। हाँ, मैंने कभी पतंग लूटी नहीं है। बाकी मांजे में पत्थर बांधकर पेच लड़ाना, या फिर हाथों में डोर पकड़कर दोस्त के डोर से घिसकर अपनी डोर मजबूत होने का दावा करना। पतंग के फट जाने के बाद उसकी डंडियों से धनुषबाण बनाना। उलझे हुए डोर को सुलझाकर उसकी लच्छी बनाना। लच्छी माने डोर को अंगूठे और सबसे छोटी अंगुली में लपेटते रहना। फिरकी खत्म हो जाए उतनी ज्यादा ढील देकर वापिस पतंग को उतारते हुए फिरकी लपेट लेना.. वे सारे खेल अब याद आतें है बस.. कईं सालों बाद बस कुँवरुभा को राजी करने के लिए मैंने शाम तक पतंग उड़ाई है आज.. अब जब जिम्मेदारियों का भार पड़ता है, तो उत्तरायण माने गन्ने चबाना। उत्तरायण माने तिल या मूंगफली की चिक्की (गजक) खाना। उत्तरायण माने छत पर बिताया जाता एक दिन। 


बचपन की उत्तरायण बनाम जिम्मेदारियों की उत्तरायण

    तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा.. उत्तरायण बदल रही है, या हम खुद? मुझे तो लगता है, मैं ही बदल गया हूँ। क्योंकि वो कटी पतंग के लुटेरे लड़के तो आज भी मौजूद है। आसमान में एक दूसरे की पतंगे आज भी काटी जाती है। बस पहले यह लाऊड स्पीकरों की संख्या कम हुआ करती थी। आज की तरह हर छत पर अपने स्पीकर्स नही होते थे। मुझे पतंग उड़ाने में सबसे बोरिंग काम आयज नही किन्ना बांधना लगता है। किन्ना बांधना बड़ी धीरज मांगता है, थोड़ी सी जल्दबाजी, और कागज़ की पतंग फट जाती है। पतंग उड़ाना, और अपनी पतंग इस खुले आसमान में बचाए रखना बड़ा मुश्किल काम है। कोई न कोई पतंग तेज़ी से आता है, पता नहीं उसे कौनसी दुश्मनी होती है, काट जाता है, या कभी कभार कटवा जाता है। आज कुँवरुभा ने गलती से ढील देकर किसी की पतंग काट दी। कोई पतंग आयी पेच लड़ाने को, उसने अपनी पतंग नीचे रखकर खेंच पर जोर दिया, कुँवरुभा ने फिरकी ढीली कर दी, अनजाने में ही ढील दी गयी पतंग ने, पेच लड़ाने आयी पतंग को उसकी डोर से अलग कर दिया।


    कईं बार हमने कुछ किया नहीं होता है, बस अपने आप संयोगवश विजय अपने पक्ष में आकर खड़ा हो जाता है..! 


    शुभरात्रि।

    १४/०१/२०२६

|| अस्तु ||


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