संबंधों में स्वतंत्रता क्यों जरूरी है?
प्रियम्वदा !
कुछ दिनों से सुबह जल्दी उठने लगा हूँ। सवेरे ग्राउंड में पहुंचकर थोड़ी दौड़-भाग करने की कोशिश करता हूँ। थोड़े थोड़े दिनों में अपने शौक और आदतें बदल लेता हूँ मैं। कुछ दिनों तक बुक्स पढ़ी, फिर कुछ दिन ढेर सारी फ़िल्में देखी, और आजकल सवेरे जल्दी उठने की लत लगाने की कोशिश कर रहा हूँ। किसी एक निश्चित लक्ष्य या शौक के आधीन होकर मुझे रहना क्यों नहीं आता..? एक तो यह गर्मियां.. होली से पहले ही धूप ने अपना तीखापन पकड़ लिया है। इतनी कड़क धूप होती है दोपहर में, कि बहार निकलने का मन नहीं करता। अच्छा, एक बात और.. आजकल दिलबाग में भी बहुत ध्यान देने में लगा हूँ मैं।
प्रियम्वदा, तुम्हारे साथ कभी ऐसा हुआ है, कि तुमने किसी को कुछ काम सौंपा है, और फिर वह फ़ोन ही न उठाए। मेरे साथ अक्सर यह घटना होती है। मेरा काम है, लोगो से काम निकलवाना। मैं कुछ प्रोसेस पूरी कर देता हूँ, और फिर उसे आगे बढ़ा देता हूँ। अब आगे वाले की जिम्मेदारी है, उस काम को समय रहते पूरा करना। लेकिन जब फॉलोअप लेता हूँ, तो कोई प्रत्युत्तर ही नहीं मिलता। यह जो लोगों की फोन न उठाने की कला है न.. यह मुझे भी चाहिए। वैसे यह कला मेरे पास है, लेकिन मैं इस कला का सफाई से उपयोग करना सीखना चाहता हूँ।
पूर्वाग्रह कैसे प्रभावित करता है हमारे संबंध?
यह दुनिया उसी रंग की दिखती है, जिस रंग का हमने चश्मा पहना होता है। कईं बार हम कुछ पूर्व-निर्धारित विचारों के साथ चलते है, तो हमें हर जगह - हर बात, अपने उस विचार को ही बल देती बातें दिखाई पड़ेंगी। इसी कारण यह शब्द अस्तित्व में आया होगा, "पूर्वाग्रह"..! पहले से हमने जो आग्रह पाल लिया, उसके बाद होती तमाम घटनाएं हमें उसी पूर्वाग्रह वाले नजरिये से दिखाई पड़ती है। जैसे कि किसी व्यक्ति विशेष के प्रति हमारे विचार। उदहारण के लिए मोहनदास करमचंद गांधी। इस महामानव के लिए मेरे मन में न तो कोई सम्मान है, न कोई अपमान।
जब हम छोटे थे, तो कहीं-किसी से सुन लिया था, कि गाँधी के कारण हमारी जमीने चली गयी.. हालाँकि बाद में पता चला वह इंदिरा थी। लेकिन एक पूर्वाग्रह तो बंध ही गया था। तो बस, आज भी गाँधी के प्रति आदर नहीं उपजता। जबकि उसकी अंग्रेजो की आर्थिक हानि पहुँचाने की चाल कितनी जबरजस्त थी.. स्वदेशी अपनाने के नाम पर पुरे देश को एकसूत्र में बाँध लेना, और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करवा के अंग्रेजो को एक जबरा आर्थिक चोट पहुंचाई थी। खैर, पूर्वाग्रह से पीड़ित होने के चलते के मुझे यह सब बातें आकर्षित नहीं करती।
संबंध – बैलगाड़ी का रूपक
संबंध भी कितना भारी शब्द है प्रियम्वदा। संबंध के तीन अक्षरों में दो पर बिंदी का भार है। और यह भार अनुभव भी होता है, किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो। प्रेम का, रिश्ते का, दोस्ती का, या फिर बस आँखों-देखे का। संबंध के विषय में मैंने लगभग अपनी हर दिलायरी में एक ही उदहारण दिया है। संबंध होता है, वह एक बैलगाड़ी जैसा होता है। दो बैल मिलकर जैसे गाडी को खींचते है, वैसे ही दो लोग मिलकर एक सम्बन्ध को निभाने की कोशिश करते है। क्या हो अगर एक बैल चलने से मना कर दे। लेकिन दूसरे बैल को आगे बढ़ना हो तब.. या तो वह दूसरा बैल आगे बढ़ ही नहीं पाएगा, या फिर वह अपने जोर से दूसरे बैल को खींचते-घसीटते हुए साथ ले जाएगा। और गाडी.. वह बस एक तरफ से लंगड़ाती हुई चलती रहेगी।
रिश्तों में घुटन क्यों पैदा होती है?
प्रियम्वदा, कुछ संबंध ऐसे होते है, जहाँ आदर के नाम पर हम ग़ुलामी स्वीकार लेते है। जैसे मानों अपना सर्वस्व समर्पण सौंप दिया है। हमारे हित-अहित के तमाम निर्णय हम खुद से किसी और को सौंप देते है। क्यों? क्योंकि हम संबंध का आदर करना चाहते है। वास्तव में वह आदर है? शायद नहीं। मूर्खता है। वह भी मूर्खता ही है, जब कोई संबंध को आगे बढ़ाना नहीं चाहता है, और दूसरा पक्ष तब भी इस संबंध को जारी रखना चाहता है। बहुत बड़ी हानि होती है, जब कोई कोई एक पक्ष संबंध का पक्षधर है, और दूसरा विपक्षी। फिर एक बात वह भी तो है, हमे यह ग्लानि भी अनुभव होती है, कि मैं उसे कैसे बताऊँ, कि मुझे अब उसके साथ रहने में घुटन महसूस होती है..
यह ग्लानि भला तो कुछ करेगी नहीं, उल्टा मन को मजबूती नहीं पकड़ने देगी। एक स्पष्ट निर्णय पर वह ग्लानि बार बार आघात करती रहेगी। वैसे प्रियम्वदा ! प्रत्येक संबंधो में एक आज़ादी तो होनी चाहिए। घुटन तब महसूस होती है, जब हमें एक प्रयाप्त स्वतंत्रता न मिल रही हो। जब तक अधिकार क्षेत्रो में किसी और का हस्तक्षेप नहीं होता है, हम संबंध का रूखापन अनुभवते ही नहीं है।
अगर मैं इस बात पर अड़ गया हूँ, कि मुझे तुम्हारे अलावा और कुछ नहीं चाहिए, लेकिन तुम्हे मेरे साथ साथ अपनी एक स्वतंत्र निजता भी चाहिए, तो यह मेरा दायित्व होगा, कि मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी स्वतंत्रता का भी मान रखूं। लेकिन यह बड़ा ही कठिन काम है। संबंधों में स्वतंत्रता सबसे पहले आहत होती है। भावनाएं दूसरे स्थान पर है। निर्भर होना, या अपने पर निर्भर कर लेना, निर्णयों की स्थापना में सूचन को अवगणित करना, यह सब निजी स्वतंत्रता को आहत करते है। "मेले बाबू ने थाना थाया.." निर्णायकता का हनन तो यही से शुरू हो जाता है। क्योंकि कुछ संबंध में बातों के मुद्दे सिमित होते है। जैसे सरोवर की सिमा होती है। समुद्र की सीमा नहीं है, वह अपनी सीमा बढ़ा-घटा सकता है। लेकिन फिर यहाँ वह तर्क भी आड़े आएगा, समन्दर खारा होता है, संबंध को तो खारा होने से रोकना होता है।
संबंधों में स्वतंत्रता क्यों आवश्यक है?
संबंधों में स्वतंत्रता इसलिए आवश्यक है क्योंकि बिना व्यक्तिगत निजता और सहमति के कोई भी रिश्ता धीरे-धीरे घुटन में बदल सकता है। स्वस्थ संबंध वही है जहाँ दोनों पक्ष समान रूप से निर्णय लेने, असहमति जताने और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए स्वतंत्र हों।
क्या प्रेम में स्वतंत्रता संभव है?
देखो प्रियम्वदा, यहाँ मैं क्या सोचता हूँ, या तुम्हारा क्या विचार है, यह मायने नहीं रखता। हमारा साझा विचार क्या है, और संबंध का अपना तात्पर्य क्या है, यह भी मायने रखता है। मैं सतत तुम्हे यूँ एकतरफा खतों से नवाजा जाऊं, लेकिन तुम्हारा कभी प्रत्युत्तर ही न मिलता हो तो, मेरे पुरुषत्व के अभिमान को भी तो अपना परिचय देना होगा। संबंधों के मामले में, और खासकर स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंध में तो दोनों की सहमति न बन रही हो तो वहां एक पूर्णविराम से उपयुक्त हो ही क्या सकता है? सहमति के बिना तो सुभद्रा का हरण अर्जुन नहीं कर पाता, या फिर स्वयं कृष्ण भी सत्यभामा की अनुमति के बिना हरण करते? उन संबंधों में एकमत था, तभी वह निभा। हरण करने के उपरांत निभा।
इस देश की परंपरा में स्त्री के पास शक्ति है, पसंदगी की। सीता ने राम को चुना था, रावण ने हरण करने के उपरांत क्या हुआ? असहमति के कारण सर्वनाश ही हुआ। स्त्रियां चुन सकती है, अपनी पसंद को। अपनी निजता को। अपनी स्वतंत्रता को भी। पुरुष.. वह बस अपने आप को साबित कर सकता है, तमाम उपस्थित विकल्पों में से अपने सर्वश्रेष्ठ होने के दिखावे को।
शुभरात्रि।
२७/०२/२०२६
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या हर संबंध में स्वतंत्रता जरूरी है?
हाँ, क्योंकि बिना स्वतंत्रता के संबंध नियंत्रण में बदल सकता है।
2. प्रेम संबंध में सहमति क्यों महत्वपूर्ण है?
सहमति संबंध को सम्मान और संतुलन देती है।
3. पूर्वाग्रह रिश्तों को कैसे प्रभावित करता है?
पूर्वाग्रह व्यक्ति को निष्पक्ष देखने से रोकता है और गलत धारणाएँ बना देता है।
|| अस्तु ||
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