होली में एक अजीब असमंजस
प्रियम्वदा !
होली में एक अलग ही असमंजस है। पूर्णिमा की रात्रि को अग्नि प्रज्वलित की जाती है। एक तरफ चंद्र की शीतलता, दूसरी और होली की ऊष्मा। ऋतु के संधि काल को, बदलती ऋतु का स्वागत करने हेतु ही शायद यह त्यौहार है। पहली बार ऐसा त्यौहार गया है, जहाँ मैं बिलकुल ही अकेला था। और उससे भी ज्यादा बोर हो रहा था, कि करने को कुछ भी नहीं। आम दिनों की ऑफिस की व्यस्तता ने शायद मुझे व्यस्त रहने की लत लगा दी है। छुट्टी होने के बावजूद दिन भर समय व्यतीत न हुआ मेरा।
पठ्ठापीर की दरगाह की परंपरा
ऑफिस पर तो गया नहीं, सवेरे साढ़े छह बजे तक उठ गया, और तैयार होकर घर से निकल रहा था। माताजी ने रोक लिया, बोले, "यह श्रीफल और चूरमा का लाडू पठ्ठापीर को चढ़ा आ।" न जाने कितने सालों से यह एक परंपरा ही बन गयी है। न मैंने कभी जानने की कोशिश भी की है। आखिरकार यह पठ्ठापीर है कौन..? मैंने माताजी से पूछा, "पीर को हम क्यों पूजते हैं? हमारे खुद के इतने सारे देव है फिर भी?" माताजी हमेशा मेरे ऐसे सवालों से परेशान रहते है। उन्होंने वही जवाब दिया, जो हर बार वे देती है। "इतने सारे देव है, एकाध और सही.. जा कहा उतना कर दे।"
बचपन की यादें और पुराना नीम
एक श्रीफल और चूरमा का लाडू लेकर पठ्ठापीर की दरगाह पर पहुंचा। बचपन से यह दरगाह देख रहा हूँ मैं। आज भी वैसी की वैसी है। हाँ ! अब उसके चारोओर एक बॉउंड्री वॉल है। ऊपर पतरें की शेड बना दी गयी है। आज भी वह पुराना नीम ज्यों का त्यों खड़ा है। जिसपर कभी हम चढ़ते थे। बारिशों में यहाँ बिच्छुओं की भरमार हो जाती। हम बड़ी ही सावधानी से बिच्छू में एक धागा बांधते, और फिर उसे पालतू कुत्ते की तरह चलवाते। उतना जरूर पता था, कि बिच्छू के डंख में जहर होता है। लेकिन न कभी उन बिच्छूओने हमें काटा, न ही कभी हमने उनको जान से मारा। आज तो वे हरकतें पागलपन लगती है।
हरे रंग का गेट खोलकर मैं दरगाह में दाखिल हुआ। पास ही श्रीफल चढ़ाने के लिए एक पत्थर रखा हुआ था। मैंने श्रीफल के दो हिस्से किये, एक पठ्ठापीरके पास रखा, दूसरा अपने साथ लायी थैली में। चूरमा के पांच निवाले करके वही रखे। दोनों हाथ जोड़कर शीश झुकाया। पास ही एक मुस्लिम दम्पति मेरी इन हरकतों को देखे जा रही थी। मैंने अगरबत्ती की। और फिर बाहर निकल गया। बची प्रसादी घर दी, और फिर दूकान पर जा बैठा।
धुलेटी और बदलता समय
प्रियम्वदा ! अब रंगों से खेलने वाली धुलेटी इतना आकर्षित नहीं करती। पत्ते को फोन किया, वह पांच मिनिट में आने की गोली दे गया। गजा तो अपने जोइनिंग को लेकर धुलेटी खेलने को तैयार ही न हुआ। तो मैं वहीँ बिलकुल साफ़-सुथरा बैठा हुआ था। ग्यारह बजे तक भी कोई रंग ने मुझे छुआ नहीं था। तभी एक आँखों की जान-पहचान का पास आया, "बापु ! ऐतराज न हो तो रंग लगा दूँ?" मैंने तुरंत कहा, "अरे जरूर लगाओ भाई।" उसने रंग लगाया, मैंने भी उसी के रंग से उसे रंगा। फिर वही बोल पड़ा, "बापु ! आजकल पूछना पड़ता है। पता नहीं कौन कैसे मूड में बैठा हो। अब तो बुरा न मानो होली है कहने भर से नहीं चलता।" बात उसकी सही थी मैंने सहमति में माथा हिलाया। मैं भी तो बिना रंगे बैठा हुआ था। अब एक बार रंग लग जाने के बाद तो हर आने-जाने वाला हैप्पी होली कहकर रंगने लगा था।
डेटिंग ऐप्स और डिजिटल दुनिया
खेर, धुलेटी तो आयी और गयी हो गयी। उसके बाद तो दो दिनों से करें तो करें क्या वाला हाल चल रहा है मेरा। इसी बिच मैंने टाइमपास करने के इरादे से कुछ डेटिंग एप्स ज्वाइन किये। दो-तीन ऐप तो डाउनलोड किये, अनइंस्टाल भी कर दिए। लेकिन कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म्स जहाँ आप अपनी पहचान बताये बिना चैटिंग कर सकते हो, वहां भी जा पहुंचा। दुनिया में हवस का कोई इलाज नहीं है प्रियम्वदा। उन प्लेटफॉर्म्स पर अननोन पर्सन hi-hello के बजाए सीधे ही M और F पूछता है। कुछ ही देर में इस कोड को मैंने डिकोड कर लिया, M माने Male और F माने Female. अब इस कोड के आगे कुछ अंक भी लिखे होते है। जिससे तात्पर्य होता है उम्र का। M25 मतलब पचीस की आयु का नर। F19 का मतलब होता है, 19 वर्ष की मादा। अगर दोनों को बात करनी है, तो वे लोग एक लंबी चैट कर सकते है, जिसमे विषय बस वासना होता है।
जैसे किसी प्रैक्टिकल की थ्योरी। बस शब्दों में उस थ्योरी को वे लोग उस हद्द तक वर्णित करते है, जहाँ तक कोई अकेले में भी नहीं सोचता होगा। मैं भी वहां एक बदइरादे से ही शामिल हुआ था। रिफ्रेश करने पर कोई M लिखा हुआ आ जाता, तो उससे पाकिस्तानी बनकर, और बूढ़ा आदमी बनकर, और या तो छोटा नासमझ बनकर खूब परेशां किया। तरह तरह के सवाल किये.. जैसे की मैं एक बूढी औरत हूँ.. मेरे पास खाने के पैसे तक नहीं है.. या फिर इस साइट पर लोग हवस के अलावा कोई बात करते ही नहीं है क्या.. उतने में मुझे एक पाकिस्तानी टकरा गया। मेडिकल लाइन से जुड़ा हुआ वह आदमी भी अलग ही भ्रम में जी रहा था। उसके तो खूब मजे लिए मैंने।
एक अलग तरह की बातचीत
इन्शोर्ट, इन दो दिनों में उन तमाम चैटिंग वाले एप्स और साइट्स मैं घूम आया, जहाँ यह सब चलता होता है। भला कंटेंट तो मुझे भी चाहिए था इस लेखनी के लिए। इस उपरांत एक लड़की से भी बात हुई.. उसके साथ शादी के मुद्दे पर एक लम्बी बहस चली। उसका मानना था, कि शादी की उम्र नहीं होती, बस आप सहमत हो, और परिपक्व हो, तभी शादी करनी चाहिए। जिस पर मेरा कहना था, कि क्या हो अगर उम्र रहते परिपक्वता ही न आयी, या फिर क्या हो अगर आपके जैसी ही परिपक्वता वाला कोई न मिला.. ऐसे प्रश्नों का शायद उसके पास उत्तर न होगा, या फिर कोई अन्य काम से वह स्किप मारकर चली गयी। लेकिन मुझे आश्चर्य इस बात का भी रहा, कि ऐसी जगह पर कोई अन्य विषय पर भी बात करने को आता है। बातचीत का मुद्दा शुरू हुआ था लेखनी से। उसे भी डायरी लेखन पसंद रहा होगा, और मैं तो हूँ ही इसीमे लिप्त रहने वाला। तो हमारी बहस लम्बी चलने का कारण भी शायद यही रहा होगा।
अंत में
आज गर्मी बहुत है, उमस जैसा लग रहा है। और मुझे फिर से पिछले साल जैसी तबियत अनुभव हो रही है। शाम होते ही जैसे मेरी तबियत नरम होने लगती है। अभी पसीने छूटने लगे थे। थोड़ा हल्का-फुल्का खालीपन लगने लगा था। शायद मैं ज्यादा देर तक बैठा रहता हूँ कुर्सी पर यह भी कारण हो सकता है। हर थोड़ी-थोड़ी देर में कुर्सी छोड़ देनी चाहिए मुझे। हलन-चलन चालू रखना चाहिए।
खैर, अभी घर के लिए निकल जाता हूँ। कल देखूंगा, या तो इसे थोड़ा और आगे बढ़ाऊंगा, या फिर ऐसे ही इसे पब्लिश कर दूंगा।
शुभरात्रि।
०६/०३/२०२६
|| अस्तु ||
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