अधूरे निर्णय को पत्र
हम सबके जीवन में कुछ ऐसे फैसले होते हैं, जो हम कभी ले ही नहीं पाते। लेकिन वे अधूरे निर्णय हमें छोड़ते भी नहीं। यह पत्र उसी एक फैसले के नाम है, जिसे मैंने उस समय नहीं चुना—और शायद आज भी उसकी गूंज मेरे भीतर बाकी है।
क्यों तुम आज भी मुझे सताते हो
प्रिय अधूरे निर्णय..
आशा करता हूँ, तुम अब तो मुझे कम ही सताओगे। क्योंकि तुम्हारा अधूरापन मुझे बार बार संभावनाओं की सृष्टि में मेरे कईं सारे अन्य विकल्प मुझे दिखाता है, और मैं तुम्हे उस समय पर धारण न कर पाने की अपनी कमजोरी को कोसता रह जाता हूँ। मैंने बार बार तुम से मुख मोड़ा है, क्योंकि उस समय पर पश्चात्तापों या प्रायश्चित वाले स्वरुप की कोई कल्पना प्रस्तुत न हुई थी।
वह एक निर्णय, जिसने सब बदल सकता था
मेरा एक वह अधूरा निर्णय, उससे अलग न होने का निर्णय.. आज मुझे बार बार यातनाओं की गर्त में धकेलता है। मैं डूबता हूँ, जैसे महासागर में लोहे की जंजीर, क्षार के संपर्क में धीरे धीरे गलती रहती है। वह एक ही बार में अपने परिणाम को नहीं पाती, उसे हररोज होते क्षय से गुजरना पड़ता है - ठीक वैसा ही हाल है मेरा भी। मुझे भी हररोज उसी तरह गलना है। क्यों? क्योंकि मैं तुमसे विमुख हुआ था। उस समय पर कमजोर हो गया था, जब तुम्हारे प्रति कटिबद्ध होना चाहिए था मुझे।
डर और वह पल, जब मैं तुम्हें चुन नहीं पाया
वह रात थी, मैं थका हुआ था। और सहसा विश्वास छलनी हुआ। मैं अटक न गया था, मैं जड़ न हुआ था, मेरी चेतना सक्रीय थी। लेकिन मैं उस क्षण उस गहरे चिंतन में चला गया था, जहाँ से मैंने अपने भविष्य के तमाम रूप देखे थे। उसके बिना, उसके साथ, उसके बिना किसी और के साथ, उसके साथ उसके बिना। पागलपन की सीमा मैंने देखि थी, वह पहला ऐसा विश्वासघात था मेरे जीवन का। मैंने बड़े करीब से देखा, उस विश्वास के शव को, अपनी आँखों के सामने, फरेब होते देखा, आँखों का धोखा, जैसे कोई जादूगर करता है। हाथ चालाकी। बहुत जरुरी हो गया था, किसी निर्णय तक पहुंचना।
अक्सर ऐसे निर्णयों की घड़ी में, कोई बढ़-चढ़कर उभर कर सामने आता है, वह होता है डर। डर ऐसी स्थिति में व्याकुलता का लाभ लेकर, कठिन और संघर्ष वाले निर्णय को न लेने के लिए प्रेरित करता है। वह मुझ पर इतना हावी हुआ, कि उसके प्रभाव में तुम्हे न चुन पाया। तुम्हे चुनता, तो आज बहुत कुछ बदल गया होता, एक ही जीवन में अलग अलग जीवनी जी सकता था मैं। पर मैंने चुना, तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी को.. जिसे मंजूर था, बोझ ढोने वाला पशु बनना। यंत्र बनना, जो सिर्फ आदेश को सुनता है, अपनी सीमा तक आदेश पूरा करता है। निर्वहन करता है।
चुना हुआ रास्ता बनाम अनचुना रास्ता
मैं आज भी पूरा सहमत नहीं हो पाया हूँ, न तुम्हे लेकर, न लिए गए निर्णय को लेकर। बार बार एक टीस कौंधती है, कभी तुम सही लगते हो, कभी वह। शायद यह सब कुछ ही वर्तमान की विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कईं बार मुझे लगता है, तुम्हारे साथ चलता, तो आज मैं अनिश्चितताओं के साथ जी रहा होता। क्षुधा से लेकर निंद्रा की अनिश्चितताओं से गुज़रते हुए, बिना किसी भार के गंगा के किसी घाट पर बैठा होता। उस पावनि के कलशोर में रात्रि की चादर ओढ़कर सितारों को घूरते हुए, शरीर को शिथिल कर देता।
पछतावा या समझदारी?
तुम्हारे दृष्टिकोण से तो देखता हूँ, तो मैं कायर भी हूँ, समझदार भी। जीवन कोई मायानगरी की फिल्म नहीं होता। यहाँ हर बार कठिन निर्णय लेना अनिवार्य नहीं होता। जीवन बिताना होता है, समझौतों के साथ.. समझौते शान्ति के साथ साथ प्रगति, और उन्नति लाते है। संधियां सिर्फ शांति की स्थापना नहीं करती, वे गति भी देती है। आगे बढ़ जाने के लिए। आगे के और बड़े प्रसंगों के लिए।
समय के फैसले बनाम मेरे फैसले
हर बात पर फैंसला लेना जरूरी नहीं होता है। कुछ फैंसलों को समय पर छोड़ देना चाहिए। समय स्वयं किसी दिन एक फेंसला सुनाता है, और वह हमारे फैंसले से बड़ा, और प्रभावशाली होता है। हमारे अपने फैंसले से ज्यादा महत्वपूर्ण। हमारे अपने व्यक्तित्व निर्माण को चुनौती देते फैंसले। मैंने शायद तुम्हे इस लिए भी चुनना छोड़ दिया था, कि मुझे समय पर, समय के अपने फैंसले पर थोड़ा-बहुत यकीन था। और मैंने पाया, समय बहुत कुछ बदलता है। उसके फैंसले को चुनौती देने की ऊर्जा मुझमे बची नहीं।
तुम अब बस एक ख्याल हो, एक संभावित कल्पना।
शुभरात्रि।
वही, जिसने तुम्हे नहीं चुना था।
०२/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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