क्या तुम अपने नाम के लायक हो?
जब से उस इवेंट 'unsent letters 2.0 में अपने जीवन में पहली बार कुछ लोगों के सामने एक पत्र प्रस्तुत किया है, तब से बस तरह तरह के पत्र ही लिख रहा हूँ। हालाँकि एक ब्लॉगर के लिए पत्र लिखना इस लिए उचित नहीं है, क्योंकि पत्र की शब्द मर्यादा कम होती है। जबकि ब्लॉगपोस्ट की उचित शब्द मर्यादा 1000 से 1200 शब्दों की है। फिर भी मैं पत्र को ही सातसौ शब्दों से ज्यादा लिखकर ब्लॉग को भी निभा रहा हूँ।
खैर, आज का पत्र अपने नाम को ही संबोधित करना है, अपने आप से मतलब है अपने नाम को।
प्रिय नाम ‘दिलावरसिंह’
तुम बहुत पुराने नहीं हो। यही कुछ 3-4 वर्ष पूर्व ही तुम्हे मैंने अपनाया है.. निकाले तो तुम भी उस छठी के पिटारे से ही गए हो। पर मैंने तुम्हें अपने इस आडंबर का हेतु बनाया है। जहां सब कुछ ही परिचय का आश्रित रहा हो, वहां नाम से विशेष स्थान किसे प्राप्त है? हमने प्रत्येक प्राणियों से लेकर ब्रह्मांड में विचरते पत्थरों को भी एक पहचान, एक नाम दिया है। अमीबा से लेकर आदमी तक, किसका नाम नहीं है?
नामों का सफर: अनंत से दिलावरसिंह तक
अनंत से शुरू होकर दिलावरसिंह तक का यह सफर, समय समय पर स्वांग बदलते रहने जैसा रहा है। कठपुतलियों के बदलते भेष की तरह समय समय पर नाम बदलकर अपने सहूलियत को संभाला है। जब शब्दों को गूंथना सिख रहा था, तब अनंत था/हूँ। जब बेपरवाही/लापरवाही से लिखना था, तब मनमौजी था। और जब स्थिर होकर एक ही पथ पर चलना तय किया, तब चाहिए थे तुम.. दिलावरसिंह।
नाम के पीछे की भावना और उद्देश्य
मूलतः फ़ारसी से आया है यह शब्द। दिलेर या साहसी होना दिलावर है। साहसी तो मैं हूँ, कुछ हद तक। हालाँकि यह दिलावरसिंह नाम चुनने के पीछे मुख्यतः उद्देश्य तो दिल शब्द ही था। जब मुझे चाहिए था एक पात्र, जो हृदयभग्न भी है, प्रेमी भी है, प्रेम को दोष देने वाला भी है। तो मुझे एक नाम याद आया वह तुम्ही थे, 'दिलावरसिंह'.. प्रत्यय भी तो चाहिए नाम के साथ, तो उसे तो अपने असली नाम से ही खिंच लाया।
मैं अपनी असल पहचान छिपाकर ही इस लेखनी से बंधा हुआ हूँ। लगभग उपनामों के पीछे यह कारण भी होता है। पर एक दिन ऑफिस में बैठा था, और एक व्यापारी ने मुझे 'दिलावरसिंह' कहकर संबोधित किया, तब मुझे काफी देर लगी थी यह समझने में, कि उसने अनायास ही मुझे इस नाम से पुकारा है। उसे उतना पता था, कि मेरा नाम 'दि' से शुरू होता है, और 'सिंह' भी जोड़ा जाता है। तो उसने अपने अंदाज़ से दिलावरसिंह नाम रख लिया। और आज भी वह मुझे दिलावरसिंह कहकर ही पुकारता है।
सच बताऊँ तो मैं तुमसे दूर हो भी नहीं पाउँगा। क्योंकि मैं जानता हूँ, तुम्हे अपनाने से पूर्व भी मुझ में उस भावना का खालीपन तो था ही। आज भी है, और अब तो रहने भी वाला है। लेकिन फिर यह भी सोचता हूँ, कि क्या मैं तुम्हे सार्थक कर भी पाया हूँ या नहीं? क्योंकि ऐसे बहुत सारे विषय है, जहाँ मेरा तमाम साहस हताहत होकर शून्य हो जाता है। ऐसे कईं स्थान है, जहाँ मुझे भय भी लगता है। बस यही कारण है, कि कईं बार मुझे लगता है, कि मैंने तुम्हारे साथ अन्याय तो किया है। अगर तुम मेरे सामने अभी प्रत्यक्ष होते, तो क्या तुम मुझ पर गर्व करते या दिलासा?
साहस, संकोच और Overthinking
वैसे मैं बहुत सारे मामलों में साहसी हो भी रहा हूँ। मुझे भीड़ में संवाद करने से क्षोभ होता है। कोई यदि मेरी तारीफ़ करता है, तो मेरे पास उसका प्रत्युत्तर नहीं होता। और फिर मुझे मेरी ओवर-थिंकिंग यह कहती है, कि 'उसने तेरी तारीफ में इतने शब्द कहे, और तूने क्या कहा, बस धन्यवाद?' उससे आगे दिमाग सुन्न हो जाता है क्या? लेकिन सच बताऊ, तो उस संवाद के आगे बात और बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ। उस इवेंट में भी अपना पत्र सुनाने के बाद मुझे स्नेही से परामर्श लेना पड़ा था। क्यों? साहस तो मैंने कर लिया था, लेकिन साहस का प्रभाव क्या हुआ, यह आत्मविश्वास न था मेरे पास।
खैर, नाम में क्या रखा है, यह विचार भी जब मेरे मन में उपजता है, तो कल रात का ही किस्सा बता देता हूँ। एक व्हाट्सप्प ग्रुप है। मैं अक्सर ग्रुप्स को म्यूट रखता हूँ। और ग्रुप में यदि स्त्रियां भी है, तब तो मेरा उस ग्रुप में रहना, केवल संख्या की गिनती के लिए ही होता है। है तो वह YQ के बिछड़ों का ग्रुप। लेकिन वहां कविताओं और साहित्य- सर्जन के अलावा बातें भी बहुत सारी होती है। किसी ने मेंशन कर के मुझे बातों में शामिल होने का न्यौता देकर किड-नेपिंग ही कर ली। मैं यह पत्र लिख रहा था, और उसके बाद मेरा एक पुस्तक पढ़ने का कार्यक्रम तय था। रात्रि के पौने बारह तक चली उटपटांग बातों के बिच सानंदाश्चर्य यह रहा, कि किसी ने मुझे 'दिव्य रंजन' नाम से संबोधित किया। मैं अपने तरह तरह के नाम सुन चूका हूँ, और अब तो आदत सी भी हो गयी है। यह नाम अब तक में सबसे अलग और हटकर रहा था।
नाम से परे — असली “मैं”
काफी मजेदार भी लगता है, जब कोई आपको अलग नाम से पुकारे, और आप उन्हें सही नाम बताओ। या फिर उन्हें उनकी सहूलियतपूर्ण संबोधन के साथ यथावत रहने दो, तब भी कोई फर्क कहाँ पड़ता है? आप तो वही हो, जो हो, वही रहोगे भी। तो बस, मैने भी अब दिलावरसिंह रहकर यह और अधिक साहसी होने के ख्याल में उलझे बिना, जहाँ मैं हूँ, या इससे एक या आधा कदम आगे बढ़ पाने की सम्भावना है, तो निभाउंगा। उससे अधिक नहीं।
शुभरात्रि।
वही, जो मैं हूँ।
३०/०४/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
या कभी ऐसा लगा कि नाम कुछ और है, और आप कुछ और?
Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
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