अंदर के गुस्सैल ‘मैं’ को लिखा एक पत्र | Deep Hindi Letter

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मेरे अंदर के दूसरे version को पत्र


“अंदर के दूसरे रूप को पत्र दर्शाता हुआ चित्र”

मेरे भीतर का गुस्सैल ‘मैं’

    प्रिय तुम यानी मैं (मेरे भीतर का एक दबा कुचला मैं।)

    हाँ ! तुम्हे कईं बार कुचला है मैंने, क्योंकि तुम गुस्सैल हो। तुम्हे यह भी होश नहीं रहता है, तुम जब प्रत्यक्ष होतें हो तो अपने आप का भी नुक्सान कर रहे होते हो। तुम जब जब प्रकट हुए हो, तुमने हानि ही की है सदैव। कभी किसी और की, कभी मेरी। पहली बार जब तुम आए थे, तो उसे बालहठ समझा गया था। पर जैसे जैसे मेरी उम्र बड़ी होती गयी, तुम भी अनियंत्रित होते गए। बेलगाम भी। तुम्हे यही नहीं पता होता था, कि तुम किस पर अपनी आग बरसा रहे होते हो। पर धीरे धीरे मैंने तुम पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।


मैं और तुम : आग बनाम बर्फ

    तुम्हारे और मेरे बिच में फर्क बस इतना ही है, कि तुम आज भी आग हो, और मैं बर्फ सा जमता जा रहा हूँ। तुम्हे किसी की भी परवाह नहीं, मुझे सब चाहिए। तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता लाभ-हानि का, मुझे पड़ता है। तुमने अपने प्राकट्य पर नुक्सान ही किया है, मैंने संभाला है, मैनेज किया है। तुमने कहर भी ढाया है, मैंने समाधान का रास्ता लिया है। यही भेद है मेरे और तुम्हारे बिच। 


    मैं जिन बातों पर आज मौन होकर सह लेता हूँ, या उन्हें छिपा लेता हूँ, पि जाता हूँ। शायद तुम यह सब न कर सकते। तुम कोई कदम उठाते। उदहारण स्थापित करते। किसी दिन तुम उबलते लावा से थे। तुम्हारे ताप से हर कोई परेशान था। बेवकूफ भी थे थोड़े, और ज़िद्दी भी। शायद धुनि कहना चाहिए। जिन पर कोई धुन सवार होते ही बस लगे रहते है, वैसा धुनि। लेकिन हाँ, अब कईं बार तुम्हे प्रकट होता देख, मैं अपना व्यक्तित्व सँभालने में लग जाता हूँ। शायद मुझे तुम से ज्यादा परवाह मेरी छवि की है। सबको होती है। 


जब मैंने तुम्हें दबाया

    हम टकराते है, मैं कईं बार तुम्हे रोक लेता हूँ। जहाँ तुम्हारी वाकई जरुरत होती है, वहां भी। समाज में स्थिर होने के लिए ऐसा करना पड़ता है। हर कोई शायद यह प्रक्रिया से गुज़रता है। जब स्थायी हो जाता है। अचल संपत्ति की भांति। आज जब यह पत्र लिख रहा हूँ, तो सोचता हूँ, न तो मैं पूरी तरह से सही हूँ, न ही तुम भी। तुम्हे बस नाश करना ही आता है। तुम अपनी पर आते हो, तो दयाभाव को भूल ही जाते हो। 


एक पछतावा जो आज भी बाकी है

    मैंने अपने जीवन में तुम्हे कईं बार रोका है। लेकिन एक उस बार तुम्हे न रोकता तो कितना कुछ बदल जाता। मन में आज भी उस बात की पीड़ है। काश उस दिन तुम अपने पूर्ण रूप में मुझ पर हावी हो जाते। लेकिन परिणाम मैं जानता हूँ। आज मैं स्वतंत्र न होता। मन तो मुक्त होता कम से कम। पर कहते है, जो होता है वह अच्छे के लिए होता है। आज मैं कुछ तो स्थिर हुआ हूँ, यदि तुम हावी रहते तो अनर्थ तय था। अनिश्चितता तय थी। अकाल घटनाएं तय थी। मैं अकेला नहीं, मुझसे जुड़े लोगों का भी भावी बदल जाता। यही होता आया है, श्रृंखला की एक कड़ी के हटने से बहुत सारे प्रत्याघात होते है। 


अंदर की घुटन और समझौता

    आज थोड़ा इस बात का भी अफ़सोस है, कि मेरा तुम पर इतना ज्यादा नियंत्रण होने के बावजूद, तुम अचानक से प्रकटते हो, और मुझे ही जलाते हो। मेरे ही भीतर, बाहर नहीं आ पाते तुम, पर अंदर मुझे ही घोंटने लगते हो। और इस घुटन से मैंने अब मैत्री बाँध ली है। कईं बार ऐसी परिस्थतियों का सामना कर चूका हूँ अब तो। जब मुझे जरुरत होती है, उठ खड़े होने की, लेकिन आलसी बन कर पड़ा रहता हूँ। खुद पर होती ज्यादतियां मंजूर है, पर तुम्हारी आंच में किसी और को क्यों परेशां करूँ?


    तुम यदि इस पत्र का प्रत्युत्तर देते हो, तो मैं शायद जानता हूँ, क्या लिखा होगा। यही कि तुम कायर हो। 

    शुभरात्रि। 

    वही, अनिर्णायक कायर मैं। 

    ०१/०५/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

    “क्या आपके अंदर भी कोई ऐसा ‘दूसरा मैं’ है, जिससे आप अक्सर बचते रहते हैं?
आज ही उसे एक पत्र लिखकर देखिए… शायद जवाब वहीं मिल जाए, जहाँ आप देखने से डरते हैं।” 

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