प्रिय अनकहे सॉरी.. | आखरी चिट्ठी, अधूरा प्रेम और वियोग

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चिट्ठियों वाला प्रेम

    प्रिय अनकहे सॉरी.. 

    तुम्हारी भूल नहीं थी, लेकिन उस दिन संयोग ही ऐसा न था। वरना जहाँ आज कोई छींकने पर भी सॉरी बोल देता है, वहां उस दिन सुगंधा तुमसे कैसे दूर रहती? आज के समय में सबसे ज्यादा समाधान तुम्ही तो करवाते हो। तुम्हारी उपयोगिता कितनी अनिवार्य है। फालतू झंझट में पड़ने से बेहतर है, दो अल्फ़ाज़ का 'सॉरी' कह दो। 


एक युवक चिट्ठी लिखते हुए एक उदास लड़की के बारे में सोच रहा है

जब सॉरी कहने का अवसर ही न मिले

    पर उस दिन तुम्हे प्रकट्ने का अवसर ही कहाँ मिला था। उस बात का अफ़सोस आज भी सुगंधा को रहता है। मैं पहचानता हूँ उसे। कईं बार कुछ संबंध में एक पक्ष को इतनी ज्यादा महत्ता दे दी जाती है, कि फिर वहां सॉरी जैसे शब्द की उपयोगिता नकार दी जाती है। सुगंधा और पंकज एक ही कॉलेज में थे। एक ही क्लास में भी। एक बेंच पर भी। शायद प्रकृति ही उन्हें पास लाइ होगी। 


    नवयुवान हृदय को तो आकर्षण का अ भी काफी होता है। वह उम्र भी तो ऐसी ही होती है, एक दूसरे को पसंद करना और ह्रदय का आदानप्रदान। भारत का विकास रथ दौड़ने ही लगा था। धीरे धीरे टेलीफोन, और मोबाइल फ़ोन सबके हाथों में आने लगे थे। पंकज और सुगंधा का आकर्षण, मोबाइल नंबरों के आदानप्रदान तक तो पहुँच ही गया था। 


    पर, साहित्य में रूचि होने से दोनों ही एक दूसरे को चिट्ठियां लिखा करते थे। फ़ोन पर बोलकर जिह्वा तथा गालों की मांसपेशियों को श्रम देने के बजाए उन्हें, हाथ की अँगुलियों से लिखा हुआ ज्यादा रुचिकर मालुम पड़ता था। उनकी चिट्ठियां लाने-ले जानेका सौभाग्य कभी भी किसी डाकिया को प्राप्त न हुआ.. वे दोनों कॉलेज से छूटते हुए एक दूसरे को अपनी चिट्ठी दे देते। घर आकर अपने कमरे का किंवाड़ भिड़कर, एकांत में एक-दूसरे के भाव को पढ़ते। आश्चर्य ही था, उनके इस चिट्ठियों के पठन कार्यक्रम के दौरान कभी किसी ने उन्हें तंग न किया। जबकि भारतीय परिवार में, एक ही घर में एकांत पाना मुश्किल काम रहा है। आज कॉलेज का आखरी दिन था.. शायद आखरी चिट्ठी..?


सुगंधा की आखरी चिट्ठी

         प्राण पंकज,

            मैं नहीं सोचना चाहती, पर बार बार मन मुझे उस कुरूप गर्त में धकेल देता है.. वहां घुप्प अँधेरा है। मेरे स्वयं के हाथ मुझे कहीं नहीं दीखते। हाथ हवा में लहराते है, लेकिन कहीं भी टकराते नहीं है। पता नहीं, कैसी जगह है वह। वहां दीवारे नहीं होती है शायद। मैं अनाप चलती रहती हूँ, पर कहीं भी पहुँचती नहीं हूँ। मैं चीखती हूँ, पुकारती हूँ, तुम्हे, पर वहां तुम नहीं होते हो। वहां तुम्हारी परछाई होती है, मेरी और पीठ किए हुए। मैं जितना तुम्हारे करीब बढ़ती जाती हूँ, उतना ही तुम भी आगे बढ़ते मालुम होते हो। 


            यह दुर्विचार बार बार मुझे सताता है। मुझे बार बार यह कल्पना परेशां करती है। लगता है, जैसे मैं तुम्हारे पीछे घिसटती चली आती हूँ, तुम मुझे सहारा भी न देते हो। लगता है कोई फरेब हो रहा है मेरी ही आँखों के आगे। थोड़ी देर में यह सब धुंधलाने लगता है। और धीरे धीरे अँधेरे में ही मैं बेहोश हो जाती हूँ।


            तुम्हारे पत्रों में मेरे प्रति अपार प्रेम छलकता है। जितना मुझे तुम्हारे शब्दों से लगाव होते जाता है, उतना ही वह दुर्विचार मुझे चूंटियाँ काटता है। यह आखरी वर्ष था कॉलेज का। मेरे घर पर मेरे विवाह के प्रस्ताव आने लगे थे। मेरे पिताजी ने एक जगह मेरा रिश्ता तय भी कर दिया है। किसे परवाह है मेरी इच्छा अनिच्छा की? पालकों को शायद यह अधिकार है, हमारा भावि तय करने का। वे अपने अनुभव से हमारे भविष्य के पथ चुनते है। 


            हमारा कर्तव्य बनता है, उनकी आशा को निराश न होने देना। मैं जानती हूँ, यह चिट्ठी तुम पर अभी गाज की तरह गिर रही होगी। मैंने एक बार हमारे रास्तों को एक करने की कोशिश की थी। पर अफ़सोस, वह प्रयास विफल रहा था। उसके पश्चात फिर मैंने उस बात को दफन ही कर दिया था, अपने ही ह्रदय के एक तपते कमरे में। तुम्हारी दी हुई चिट्ठी अभी तक मैंने पढ़ी नहीं है, शायद पढ़ लेती तो यह लिख न पाती। मैं वियोग नहीं चाहती हूँ, पर मेरे पास विकल्प नहीं है। 


            मेरे भीतर एक महामंथन हो रहा है। मैं एक अनिर्णायकता के शिखर पर हूँ। किस खाई में मुझे गिरना है, वह अभी अनिर्णीत है। मेरे पास दो तरह के विद्रोह है, या तो मैं अपने माता-पिता से विद्रोह कर तुम्हारे आलिंगन में सर्व-समर्पण कर दूँ। या फिर तुमसे मुँह मोड़कर अपने पिता के फैंसले का मान रख लू। दोनों ही पक्ष में मुझे विद्रोही बनना है। इस शिखर से सब कुछ ही बौना दीखता है.. प्रेम की परिभाषा भी..


            प्रेम भी कितना ऊँचा-निचा होता है। छोटा-बड़ा भी। कोई कहता है, माता का प्रेम बड़ा है, कोई पिता के प्रेम को बखानता है। कोई सहोदरों के स्नेह को सन्मानता है, और कोई सहृदयी के प्रणय को। मैं इस धारणा को कैसे तय करूँ, कि तुम्हारा प्रेम मेरे लिए बड़ा है, या मेरे मातपिता का? जीवन में ऐसे कटु मोड़ क्यों होतें है.. जहाँ हमें बाध्य किया जाता है, दो में से एक चुनने के लिए। इस चुनाव का अस्तित्व ही क्यों है?


            मेरे पास बहुत सारे प्रश्न है, वे सारे ही अनुत्तरित रहेंगे। काश यह कलम टूट जाती, यह लिखते हुए, कि यह आखरी चिट्ठी है। काश यह दिवस जीवन में होता ही नहीं। काश.. काशों की अपनी अलग सृष्टि है। मैं चाहूंगी, वहां तुम बसो.. हम बसें.. हमारी कामनाएं.. पर उस पर भी मेरा अधिकार नहीं है। मुझे मेरे पिता के द्वारा तय किए भावि का अधिकार बनना होगा.. यही भाग्य है, या शायद कर्तव्य।


            अब तो 'तुम्हारी' भी न लिख पाउंगी..

            सुगंधा

***

कुछ संबंधों में सॉरी का स्थान नहीं होता

    यह आखरी चिट्ठी ही थी। यहाँ तुम्हारा (सॉरी का) जरा सा भी जिक्र न था। मैं नहीं जानता, उसके बाद पंकज की क्या दशा हुई, मैंने यह जानने का प्रयत्नमात्र भी न किया था। पर मैं यह सोच रहा था, कि कुछ संबंधों में तुम्हारा स्थान होता ही नहीं है। कुछ घटनाएं तुम्हे उद्भवने का मौका ही नहीं देती है। उस आखरी खत में तुम्हारा स्थान हो सकता था, पर किस आधार पर? 


    खैर, समय की सारणी पर तुम अस्तित्व तो रखते हो, बस तुम्हे कोई पथ न मिला प्रकट होने का।

    शुभरात्रि।

    १६/०५/२०२६


|| अस्तु ||


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