ईर्ष्या आखिर इंसान के भीतर जन्म कैसे लेती है?
तुम्हे तो मुझे पुकारना पड़ता है। पता नहीं, तुम मेरे भीतर कौनसी छुपमछुपाई खेलती हो। मुझे जरुरत होती है, तब पुकारता हूँ, लेकिन तुम हो कि जब सब सही चल रहा होता है, तब जाकर प्रकट होती हो।
मैं नहीं जानता, तुम मुझसे रूठी हुई क्यों हो.. मैं भी तुमसे लिपटकर जलना चाहता हूँ, लेकिन पता नहीं क्यों, तुम बहुत कम बार आती हो। लेकिन जब आती हो, तो बाढ़ की तरह आती हो, और मुझे बहा ले जाती हो। कईं लोग कहते है न, 'मेरी वाली अलग है..' लेकिन मैं तो दावे से कह सकता हूँ, 'मेरी वाली तो वाकई अलग है।' लोग पैसे देखकर तुम्हे पालते है। लोग किसी को ऊँचा चढ़ते देख तुम्हे पालते है। अरे लोग तो किसी को सुखी देखकर भी तुम्हे पाल लेते है।
पर मैं ऐसा नहीं हूँ.. मैं तुम्हे खुद पालना चाहता हूँ, पर मेरी बेपरवाही तुम्हे मुझसे दूर रखती है। लोग रिश्तेदारों की तरक्की पर भी तुम्हे पोषते है, और मैं.. मैं पता नहीं, क्यों तुम्हे नहीं पाल पा रहा..? नहीं, मैं कोई देवमानुस तो नहीं हूँ। मैं भी आम समाज का ही हिस्सा हूँ, फिर भी तुम मुझसे छुआछूत करोगी, तो कैसे चलेगा। मुझे भी तो कोई मौका दो, कि मैं भी अपने किसी रिश्तेदार से जल-भून जाऊं।
क्या तुलना करना हमेशा गलत होता है?
मैं तो अक्सर नापतोल करता हूँ, दुकानदार नहीं हूँ। फिर भी मैं बहुत सारी चीजों में नफा-नुक्सान देखता रहता हूँ। जहाँ खोट हो, वहां तो आओ कमसेकम। मुनाफे में तो लोगों के पास दौड़ के चली जाती हो। दुसरो के मुनाफे पर तो कम से कम तुम्हे मेरे पास आना चाहिए। वैसे बिलकुल नहीं आती, ऐसा नहीं है। जब मेरे ऑफिस वाला पुष्पा f&o में लास्ट मोमेंट पर धूम मचाता था, तो तुम आती थी मेरे पास, पर मैं तुम्हे अपने भीतर क़ैद करूँ, उससे पहले तो तुम छूमंतर हो जाती थी।
बदलते होंगे लोगों के मूड, तुम्हारे प्रभाव में। मैं तो तुम्हे पाकर भी जैसे अछूता रहता हूँ। शायद मेरे भीतर तुमसे भी बड़ी कोई जलन ने अपना स्थायी बसेरा बना रखा है। लोग तुम्हे पाकर खुद को कम आंकते है। मैं, मैं पहले से ही इतना कम हूँ, कि अब तो सोचता हूँ कि तुम्हे पाकर कहीं बड़ा न बन जाऊं। पर मैं इस बात से तो कम से कम खुश हूँ, कि 'ओह ! उसके पास वो है, मेरे पास नहीं..' वाला तुम्हारा रूप मेरे पास रहता है। और मैं, वह चीज तुम्हारे बल पर पा भी लेता हूँ। पर उसके बाद क्या?
ईर्ष्या और मोटिवेशन के बीच का अंतर
हाँ ! जब तुम मेरे भीतर छा जाती हो, तब बाहर से सब कुछ नार्मल होता है। न बात बदलती है, न चेहरे की रेख.. जो भी कुछ घट-बढ़ रहा होता है, वह भीतर ही भीतर चलता रहता है। पर मुझमे तुम कभी विकराल रूप में क्यों न बसी.. मैं तो कामना करता हूँ, कि कम से कम कोई तो स्त्रीलिंग तो मुझे चाहे। और कोई नहीं, तुम ही सही। देखो, मैं लगभग दोनों पहलु देखता हूँ। तुम्हे कोई कैसी भी निगाहों से देखता हो, लेकिन असल में तुम एक सिग्नल हो।
मुझे क्या चाहिए, इस बात का सिग्नल। अक्सर हम देखादेखी बहुत सारी चीजें लेते है। तुम ही तो प्रेरित करती हो उस व्यापार को। वरना क्या होगा, कोई ईर्ष्या करेगा नहीं, कोई कुछ देखादेखी खरीदेगा नहीं, बाज़ार को नुक्सान होगा। महंगाई को पोषित करने में तुम्हारा भी तो योगदान रहा है। सोचो अगर मेरे पडोसी द्वारा कार खरीदे जाने पर मुझे ईर्ष्या ही न हो.. मुझे भी तो कार चाहिए.. मेरी कार की इच्छा को बल कौन देगा.. मैं तो भूल जाऊंगा, अगर तुमने मुझे पड़ोसी की कार बार-बार न दिखाई तो।
क्या कम्पेरिज़न से ही कम्पटीशन पैदा होता है?
वैसे एक और दृष्टिकोण है, क्या पता तुम मेरी नस नस में पहले से हो, और मैं तुम्हे न पहचानता होऊं। दृष्टिकोण की बात है न.. क्या पता मैं ही दूसरों के अनुसार अपने आप को नापता रहता होऊं,और मुझे ही न पता हो। नज़रिये की बात है न.. क्या पता मैं पहले से ही दुसरो की देखा-देखि चलता होऊं.. उसके पास लाल पेन है, मुझे केसरी चाहिए, क्योंकि मैं उससे अलग हूँ। भले दो हाथ-पैर है, तो क्या हुआ.. मैं बेहतर हूँ उससे। मैं सुबह जल्दी उठ जाता हूँ उससे। वैसे तुम अकेली नहीं आती, अभिमान को भी घसीट लाती हो अपने साथ। जबकि मेरे पास तो पहले से अभिमान के कईं घड़े भरे पड़े है।
इंसानी भावनाओं में ईर्ष्या की भूमिका
लोग तो यह भी कहते है, तुम बुरी बला हो.. तुम्हे कण्ट्रोल में रखना चाहिए। लेकिन अगर हर कोई अपनी-अपनी बला को बांधकर रखना सीख गया, तो यह ज्यादती नहीं होगी? इनोवेशन नहीं रूक जाएगी? मुझे तो लगता है, कम्पटीशन भी खतरे में पड़ जाएगी। अगर हर कोई प्योर सत्यवादी बनकर मैदान में उतरा, तब तो स्पर्धा का जोश ही गुम हो जाएगा। कोई इस लिए तेज़ी के साथ नहीं दौड़ेगा, क्योंकि उसमे ईर्ष्या ही नहीं है, दूसरे से आगे निकल जाने की। लखनऊ हो जाएगा, 'पहले आप.. पहले आप..' मैं तो कहता हूँ, तुम अपना नाम बदल लो.. ईर्ष्या पुराने ज़माने में होती थी, अब तो मोटिवेशन कहना चाहिए तुम्हे।
कम्पेरिज़न होगा, तो इंस्पिरेशन मिलेगा। छोडो यह सब, मैं तो इस बात पर भी कंफ्यूज हो जाता हूँ, कि कोई किसी से ईर्ष्या करके गिरा हुआ महसूस करेगा, या फिर उठने का कारण मानेगा तुम्हे..? बताना हाँ मुझे, जरूरी मुद्दा है यह.!
चलो फिर, बाकी बाते फिर कभी।
शुभरात्रि।
०८/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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FAQ Section
क्या ईर्ष्या हमेशा बुरी होती है?
नहीं, कई बार ईर्ष्या इंसान को अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों को समझने में मदद करती है।
क्या तुलना करना गलत है?
हर तुलना गलत नहीं होती। कभी-कभी तुलना इंस्पिरेशन और सुधार का कारण भी बनती है।
यह पत्र किस विषय पर आधारित है?
यह पत्र ईर्ष्या, तुलना, इंसानी मनोविज्ञान और मोटिवेशन जैसे भावनात्मक विषयों पर आधारित है।

