समय क्यों नहीं ठहरता?
प्रिय उस ठहर जाने योग्य क्षण..
तुम्हे तो सम्बोधित करना भी मुश्किल कार्य है। क्योंकि तुम तो पल पल बदलते जाते हो। ठहरते नहीं। थकते नहीं। तुम व्यक्ति नहीं थे, पर तब भी तुम सबसे अधिक जीवित थे। तुम कोई वस्तु नहीं, तब भी तुम सबसे अधिक अपने थे। तुम बस एक क्षण थे, जिसमे पूरा जीवन सिमट सकता था।
तुम बहते रहे, जैसे पुरवाइयाँ। तुम बहते गए, जैसे प्रशांत महासागर के मध्य से उठती लहरें। तुम बहते गए, जैसे बहता हे अतिवृष्टि का जल। तुम बहते गए, जैसे तुम्हे रोक पाने का सामर्थ्य किसी में न हो। और हकीकत में नहीं है। तुम भ्रांतिया बनाते हो, देखने पर लगता है, तुमने वृत पूरा किया है। लेकिन हेलिकल पथ है तुम्हारा.. तुम कभी किसी वृत को पूरा नहीं करते। तुम हेलिक्स सिद्धांत हो। हर बार मुझे लगता है, मैं वहीँ वापिस लौटा हूँ, तब हकीकत में थोड़ा आगे बढ़ चूका होता हूँ। मैं उसी जगह खड़े होने के बावजूद वहीँ नहीं होता हूँ।
एक क्षण जो ठहर जाना चाहिए था..
तुम्हे ठहर जाना चाहिए, जब कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ बैठा हो, संवाद न होते हुए भी, मौन के संवाद चल रहे होतें है तब। तुम्हे ठहर जाना चाहिए, जब किसी बिछड़न के मौके पर दो लोगों की आँखे भीनी होती है। तुम्हे ठहर जाना चाहिए, जब कोई फैंसले की घड़ी आती है, और कोई अनिर्णय पर खड़ा हो। तुम्हे ठहर जाना चाहिए, जब सुखों का बाष्पीभवन होता है। और तुम अगर ठहर जाते, जब कोई माँ के इकलौते लाडले पर, सीमा पर कोई लोह का कण छूटता। पर तुम नहीं रुकते, तुम्हारे पैरों को अभिशाप है, सतत चलते रहने का।
स्मृति, पछतावा और स्वीकार..
अफ़सोस होता है, उस क्षण को और अधिक क्यों नहीं रोक पाया मैं.. जब वह उसका आखरी दीदार था। उस आखरी दीदार में एक अनकहा उद्घोष, 'अ..' से आगे नहीं बढ़ पाया था। बदलते पथ, बदलते हमसफ़र, और बदलते समय के बाद बचती है यादों की सुइयां। जो बार बार पश्चाताप, या निराशा की गर्त के मुंहाने से धकेलती है, और अफ़सोस करने के लिए.. तुम्हारे कारण। क्योंकि तुम ठहरे नहीं थे। तुम्हारे पास ठहरने का अधिकार क्यों नहीं? होना चाहिए.. अगर होता, तो हर कोई तुम्हे बांधकर रख लेता.. फिर तुम अपने स्पाइरल पथ से भटक जाते, किसी और ब्रह्माण्ड के केंद्र तक।
आज अगर वह क्षण फिर से मिलता, तब मैं एक प्रयास तो जरूर से करता, कुछ रोक लेने का। थोड़े और समय के लिए। थोड़ी और मुद्दत मिल जाती मुझे, और अधिक यादों का बस्ता बाँध लेने की। मैं उसे तो न रोक पाता, अगर उसकी दिशा कहीं ओर होती। यादों की सैर पर जाते हुए जब वो आखरी दृश्य देखता हूँ, वहां दीखता है मुझे कोई यंत्रवत व्यवहार। भावविहीन, या फिर निराश चेहरा। तुम असहाय छोड़कर आगे बढ़ जाते हो। क्रूर कहूं तुम्हे?
क्या हर क्षण का आगे बढ़ना ही उसकी सच्चाई है?
पर नहीं, तुम रुक नहीं सके, न ही तुम क्रूर हो। तुम मेरे भीतर सदा के लिए ठहर के बस गए हो। एक ऐसा ठहराव जिसे समय भी अब छू नहीं सकता। जिसे प्रकृति भी रूपांतरित नहीं कर सकती। जिसे ताप का असर नहीं होता। तुमने उस दृश्य को मेरे भीतर अंकित कर दिया। जिसे मैंने चाहा था, हमेशा के लिए, वही दृश्य। जहाँ मैं हूँ, वह है। और तुम, उस दृश्य के साक्ष्य बनकर, एल्बम को बदलते जाते हो.. साँझ की तरह।
तुम्हारा न ठहरना एक कटु सत्य है। किसी को भी मंजूर न होगा यह। स्थापित सत्य को बदलने की चेष्टा, हवा में कुछ लिखने बराबर है। तुम्हे रोकने का प्रयास अधूरी समझ है। समझ को निरंतर सीखते रहना होगा, स्वीकारते रहना होगा। कोई भी कभी लौटकर न आया है, न आएगा। शायद तुम इसी कारण से सुन्दर हो, तुम रुकते नहीं। और मैं अधूरा, जो तुम्हे रोकना चाहता है, बार बार पीछे मुड़कर देखना चाहता है। तुम वही दिखाते हो, जो मैं देखना चाहता हूँ।
शुभरात्रि,
वही, जो तुम्हारी अनंतता को लेकर प्रभावित है।
०६/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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