प्रिय आधी रात | आधी रात के सन्नाटे और विचारों को लिखा एक पत्र
आधी रात हमें इतना बेचैन क्यों करती है?
प्रिय आधी रात..
आजकल तुम भी मुझसे रूठी हो..! तुम्हे देख ही नहीं पाता हूँ मैं। शायद कॉलेज छोड़ा तब से लेकर आजतक, अँगुलियों पर गिन सकूँ उतनी बार ही तुमसे मिल पाया हूँ। लोग कहते है, तुमसे मिलने वाले के पास चैन नहीं होता है, क्या यह सच है.. तुम अशांति से आती हो?
पता नहीं क्यों लोग तुम्हे बस काली और अँधेरी कहते है। मैने जब भी तुम्हारा रूप देखा है, एक सुकून पाया है तुम में। शांति का स्वरुप तुम ही तो हो। दिवसभर शोर में सनी हुई सड़कें, तुम्हारे आँचल में ही तो सुस्ताती है। तुम ने आसमान को भी ठहराव दिया है, सितारों को अपने चरम पर चमकने का मौका भी। तुम्हारे पास अपनी अलग सृष्टि है। तुम उन जीवों को मौका देती हो - जीने का - जिन्हे दिवस की चकाचौंध सताती है।
रात के सन्नाटे में विचार अधिक गहरे क्यों लगते हैं?
समाज जिनसे घृणा करता है, वे चोर तुम्हे अपनी कुलदेवी मानते है। तुम्हारी प्रसन्नता से ही वे उत्थान पाते है। दिन में जो भी दबा रहता है, वह अब सामने आता है, तुम्हारी उपस्थिति में। खामखा लगे रहते है लोग अपना उल्लू सीधा करने में, तुम्हारी साक्षी में देखे कोई उल्लू को, वह हमेशा से सीधा ही होता है। बेकार में लोग कहते है, कि आधी रात को सन्नाटा होता है। कोई शायद सुनता नहीं है तुम्हे।
तुम्हारे पास अपनी आवाज़ है, घड़ी की टिक-टिक, पंखे की आवाज़, दूर कहीं डोगेशभाई की पुकार, खिड़की से आती हलकी हवाओं के स्पर्श के साथ सुनाई पड़ते वृक्षों के पत्तों की सरसराहट, कमरे की निःशब्दता, और अपनी ही साँसों की आवाज़। सब कुछ सोया है, पर कुछ जाग रहा होता है। विचार। वे सोते नहीं, न ही सोने के बारे में सोचते है। अगर सोचते, तो तुमसे मिलन न हो पाता। तुम्हारी सौबत में, वे बातें, जिन्हे दिन में दबा दिया गया था, इग्नोर किया गया था, वे अब अर्थपूर्ण लगने लगती है।
ओवरथिंकिंग और रात का संबंध
पुराने दृश्य, लोग, संवाद, और एक गहराई.. तुम इन सब को सामने ला खड़ा करती हो। ओवरथिंकिंग भी। तुम्हारी गहराई नापने योग्य अभी कोई संशाधन ईजाद नहीं हुआ है। पर मुझे लगता है, तुम तीन बजे से लेकर चार बजे के बिच, एक घंटे में सबसे ज्यादा गहरी होती हो। तुम खिंच लेती हो, अपनी आगोश में। तुम्हारी अनुकम्पा से, इसी बिच निंद्रा भी प्रसन्न होती है। अगर तुमने रोका नहीं तो। अगर तुमने न चाहा, तो नींद पास होकर भी अचानक से दूर चली जाती है। शायद तुम्हे भी अकेलापन पसंद है।
क्या आधी रात सच में आत्मचिंतन का समय है?
तुम्हारे साथ रहकर विचार भी कैसे-कैसे उठते हैं... 'मैं ऐसा क्यों हूँ?' हालाँकि यह दुनिया का सबसे घटिया सवाल है, फिर भी दुनिया में जितनी आबादी है, उतनी बार अपने आप से पूछा गया होगा। मैं मानता हूँ, दुनिया में सबकुछ ही नकली हो सकता है, पर तुम नहीं। तुम्हारी सौबत में जो भी महसूस होता है, वह कच्चा(RAW) होता है। जिसे प्रयत्नपूर्वक पकाया जाता है। फिर विचार हो या आदत..! या फिर इस बात को इस तरह से भी कह सकता हूँ, कि शायद यही सही समय है, खुद को समझने का। भागने के बजाए, अनुभव करने का।
खुद से मिलने का सबसे शांत समय
पर इस मुलाकात का अंत भी तुरंत आता है। जैसे जैसे सवेरा होने लगता है, हिलचाल बढ़ने लगती है, तुम दूर होती चली जाती हो। जैसे तुम्हे कोलाहल मंजूर नहीं। पर हम, मानवों की प्रकृति रही है, प्रकृति को छेड़ते रहना। हमने युद्धों के कोलाहल को रात में चुना। हमने तुम्हारे अस्तित्व को पडकारते बल्ब खोजे। हमने सुनिश्चित किया, तुम्हे भी बैचेनी होनी चाहिए। आधे मानव तुम्हारे प्रभाव को नकारते हुए विचरते ही है। निशाचर का तमगा हांसिल किया।
पर मैं, तुम्हे बहुत जल्द मिलूं, यही कामना करता हूँ। क्योंकि तुम हर रात आती हो, और हर बार कुछ छोड़ जाती हो।
शुभरात्रि।
वही, जिसे तुम्हारा एकांत पसंद है।
०९/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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