प्रिय तुम – एक ऐसा पत्र, जहाँ समझ अधूरी रह गई

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जिसे मैं कभी समझ ही नहीं पाया – एक पत्र

    हम सबकी जिंदगी में कोई न कोई ऐसा इंसान जरूर होता है, जिसे हम कभी पूरी तरह समझ नहीं पाते। कभी गलतफहमियों के कारण, कभी अपने अहंकार के कारण। यह पत्र उसी ‘तुम’ के नाम है—जिसे मैंने समझने की कोशिश तो की, लेकिन शायद कभी सही मायनों में समझ नहीं पाया।


“किसी को समझ न पाने की उलझन दर्शाता चित्र”

हमारी दूरी : साथ होकर भी दूर

    प्रिय तुम !

    हाँ ! तुम्हे तुम के अलावा कौनसा संबोधन करूँ, यह अभी तय नहीं कर पा रहा हूँ। पर प्रिय तो तुम हो। यह वो वाला प्रिय नहीं है, जो कईं पत्रों में बस यूँ ही बेमतलब सा शामिल हो जाता है। तुम मेरे प्रिय हो, इसमें कोई संदेह की गुंजाईश नहीं है। 


गलतफहमियाँ और मेरे अपने भ्रम

    मैं स्वीकारता हूँ, मैं तुम्हे कभी भी पूरी तरह से समझ ही न पाया। मैंने जब जब कोशिश की है, मेरी सारी मेहनत असफलताओं को गले लगाकर लौटी है। मैं और तुम, किसी अनंत रेखा के सिरे है। मैं तुमसे करोड़ों प्रकाशवर्ष दूर होना चाहूँ, तब भी शायद अब मुझे तुम्हारी आदत सी लग गयी है। जैसे दो समान्तर रेखा कभी मिलती नहीं, लेकिन क्षितिज पर उनके एक होने का भास् होता है, ठीक वैसा ही हमारा सम्बन्ध है। 


क्या गलती सिर्फ तुम्हारी थी?

    मेरे आश्चर्य को तुमने कितनी ही बार चरम पर पहुँचाया है। मुझे यकीन नहीं होता है, कि इतनी विपरीतता के बावजूद मैं और तुम, एक साथ तो है। हाँ ! शुरुआत में ही मुझे मेरी कल्पनाओं के टूट-बिखरने की चीख सुनाई पड़ी थी। लेकिन मैंने उन्हें उनके हाल पर छोड़, सुबह का भुला शाम को लौटा वाला काम किया था। फिर भी, जब आज यह पत्र लिख रहा हूँ, तो सोचता हूँ, शायद मेरी भी उतनी ही गलती रही है। अगर साथ काम करते है, तो एक दूसरे को संभालना भी होता है। 


कुछ पल, जहाँ मैं तुम्हें समझ सकता था

    बहुत सारी ऐसी बातें हुई, जब मेरा तुम पर से विश्वास डगमगाता गया। एक समय ऐसा भी आया, जब मुझे तुम सरासर झूठे लगते थे। पर फिर मैंने कुछ परीक्षाओं के उपरांत पाया, सम्पूर्ण असत्य भी नहीं होता है तुम्हारे हिस्से में। कईं बार तुम्हारे इरादों को भी मैंने गलत पढ़ा था। एक तरह से कह सकता हूँ, मैंने तुम्हारे प्रति कुछ अवधारणाएं भी बाँध ली थी, जिन्हे सुधारना चाहिए। कुछ गलतियां मेरी भी है, मैंने कभी तुम्हारे पक्ष को पूरा सुना नहीं। मैंने पक्ष-विपक्ष को सुने बिना भी फैंसले लिए। मैं शायद अपने ही दृष्टिकोण पर इतना ज्यादा भरोसेमंद था, कि कुछ अन्याय तुम्हारे साथ भी कर बैठा। 


    अब समझ सकता हूँ, तुम्हारे बिना बहुत कुछ खालीपन भी महसूस होता है। क्योंकि शायद तुमने अपनी आदत लगा दी है मुझे। अब मेरे लिए, मेरी बहुत सारी सहूलियतें भी असहूलियत बन गयी है। आज मैं सोचता हूँ, तुम्हारे कोई भी कार्य के पीछे क्या कारण रहा होगा, तो वहां भी मुझे अपनी ही भूल होने का संदेह होता है। पर क्या तुमने भी मुझे समझने में गलती की थी? 


अहंकार और छूटते हुए रिश्ते

    मुझे तुम्हे समय देना चाहिए था। जब उस दिन तुमने पहली बार मुझे कोई ख्वाहिश बताई थी। लेकिन मैं, और मेरा काम। तुम्हारी ख्वाहिश के आड़े ऐसे उतरे थे, जैसे ग्रहण की परछाई। तुमने उसके बाद मुझे बहुत कम प्रसंगों में अपनी इच्छाएं बताई है। क्यों? शायद तुमने भी मुझे किसी यंत्र का मान लिया। जैसे हर कोई जानता है। मैं अपना काम टालकर तुम्हारे साथ समय बीता सकता था। तुम्हारे स्वप्न को पूरा कर सकता था। कुछ छोटे छोटे लम्हे ही होते है, जिन्हे समय रहते संभाल लेना चाहिए होता है। मुझे बहुत बाद में यह समझ आया। सबके साथ ऐसा होता होगा?


    मुझे अफ़सोस भी होता है। बहुत कुछ नष्ट होने से बच सकता था। बचाया जा सकता था। पर मुझे मेरा, तुम्हे तुम्हारा अभिमान - हम दोनों को अपना अभिमान विपरीत लेता चला गया। और आज हम उस अनंत रेखा के सिरे पर आ खड़े हुए। देर तो हो चुकी है। अब वह पुराना भाव तो नहीं लौट पाएगा। लेकिन, एक गठबंधन तो बना रहेगा। जैसे सरकारें स्थापित करती है। शासन को निभाने के लिए। पर फिर यह ख्याल भी उठ खड़ा होता है, कि तुमने भी तो कितने कम प्रसंग दिए मुझे, जहां मैं तुम्हे समझूँ। 


समझना बनाम मान लेना

    तुमने भी तो बहुत कम कोशिशें की थी, मुझे समझने की। आघात के प्रत्याघात हर जगह लागू नहीं होते। कहीं-कहीं आघातों को सह लेना भी होता है। शायद हम दोनों ही चूक गए। हमने दोनों ने ही प्रत्येक क्षण का प्रतिशोध लिया। हमने दोनों ने ही अपनी सहनशक्ति का लोप किया। हम आरोप मढ़ते गए, हम दोष देते गए, हमने समय का एक हिस्सा बस इस लिए फूंक दिया, क्योंकि हम दोनों ही एक दूसरे को समझे नहीं। 


क्या अब भी कुछ बचा है?

    कोई भी, कभी भी, किसी को पूरी तरह नहीं समझता। हम जितना जिसको जान पाते है, उस पर से हम उसके प्रति एक अवधारणां बाँध लेते है। नीम कड़वा होता है, पर सूर्य के ताप में उसकी छाँव बड़ी आरामदेह और मीठी लगती है। कुछ लोग को पढ़ना नहीं चाहिए, उन्हें अनुभवना चाहिए। अनुभव से सारी भ्रांतियां दूर हो जाती है। सारी कल्पनाएं सुधरने लगती है। लोग बदलने लगते है। कुछ समझना एक प्रयास है, अवधारणा नहीं। 


    बीता समय तो अब समझने योग्य रहा नहीं, सुधारने योग्य रहा नहीं। भविष्य के तंतु मेरे हाथ में नहीं। बस वर्तमान की डोर मेरे हाथ में है। वर्तमान को ठीक किया जा सकता है। वर्तमान हमें इतनी छूट देता है। कुछ बातें मैं समझानी छोड़ सकता हूँ, कुछ बातें समझनी छोड़ दूँ.. तो हमारा निभाव चल सकता है। जीवन समझौतों के अधीन है। इस पत्र द्वारा शायद यह तो समझा ही सका हूँ, कि मुझमे कुछ गुंजाईश अब भी बाकी है। 


    शुभरात्रि। 

    वही, जो अब समझना-समझाना छोड़ रहा है। 

    ०४/०५/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

    “क्या आपकी जिंदगी में भी कोई ऐसा ‘तुम’ है, जिसे आप कभी समझ नहीं पाए? क्या अब भी देर हो चुकी है?” 

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