जब लास्ट सीन सिर्फ समय नहीं रहा
प्रिय, व्हाट्सप्प वाले लास्ट सीन..
भैया तू तो सबूत रहा है.. प्रेमी जोड़ों के विवादों का। मैं सोचता हूँ तुझसे ज्यादा हाय किसी को न लगी होगी। पर तू काम ही तो ऐसा करता है। तेरा काम ही है यह.. लोगों में शंका के बीज बोना।
लोग तुझे साक्ष्य मानकर अच्छेभले रिश्ते को तोड़-मरोड़ देते है। एक बार तूने कहीं पर शंका स्थापित कर दी, फिर कोई लाख सत्य स्थापित करने को मथे.. नहीं होता यार। तेरी ताकत की बात ही अलग है। तुमने अल्प समय में क्या विकास साधा है! मैं हैरान हूँ, इतनी जल्दी तो मैगी नहीं बनती दोस्त। पहले तुम सिर्फ एक टाइम-स्टैम्प हुआ करते थे। धीरे धीरे तुम अर्थ बनने लगे। और एक दिन तुम सबूत के तौर पर विकसित हुए।
ऑनलाइन : जहाँ उम्मीदें जन्म लेती हैं
तुम्हारी अहमियत किसी से कम है क्या.. तुम जब अपना रूप बदलकर ऑनलाइन बन जाते हो, तो अच्छे-अच्छों का मूड चेंज हो जाता है। कोई ठहाका मारकर हँसता है। कोई अपने मन में किसी पसंदीदा स्त्री या पुरुष से बात करते हुए प्रेम को पालने लगता है। और कोई सीधे अंतरंग मामलों तक भी पहुँच जाता है। तुम्हारे ऑनलाइन होने से पूर्व जो उबाऊ था, वही समय अब रोमांचक हो गया।
पर अच्छे दिन हमेशा थोड़े होतें हैं? वैसे अच्छे दिन कहने की चीज है, दिन तो सारे एक समान ही होतें है। तुम जब ऑनलाइन से फिर लास्ट सीन हो जाते हो, तो हर कोई एक अंदाज़ की खाल खींचने लगता है। मानों वह अंदाज़े का भी अंदाज़ ताड़ रहा हो। जैसे कि, "वह कहीं व्यस्त होगा, वरना अभी तक तो ऑनलाइन ही था..." या "क्या वह मुझे इग्नोर कर रही है? अभी तक तो ऑनलाइन दिखा रही थी।" या फिर वह सबसे खतरनाक है, "जब हमने एक साथ बारह बजे गुड नाईट कह दिया था, फिर उसका लास्ट सीन दो बजे क्यों दिखा रहा है..?"
लास्ट सीन और ओवरथिंकिंग का गठबंधन
तुमने तो तीर छोड़ दिया, बाकी फेंसला ओवरथिंकिंग करवाता है। सच बताना, तुम लोग मिले हुए हो न? रात के दो बजे तक वह किससे बात कर रही होगी? जरूर वह मुझे धोखा दे रही है। जिसे वह बेस्टफ्रेंड कह रही है, उस से बहुत ज्यादा बात करती है.. कहीं उन दोनों के बिच कुछ है तो नहीं? यह शंका कुशंका.. सारे बीज तुम ही बोते हो। किसान भी हो क्या तुम?
हो तो तुम व्हाट्सप्प का एक छोटा सा फीचर ही, लेकिन ऐटिटूड तुम्हारा फुल ऑन इंसानो जैसा है। कभी दीखते हो, कभी नहीं। वैसे इंसान भी कुछ होते है, तुम्हे धन की तरह छिपाते है। मानों कोई चुरा लेगा तुम्हे। या फिर शायद वे खुद कोई आपत्ति का आसार नहीं चाहते होंगे। तुम्हे शायद पता न होगा, लेकिन तुम कहानियां गढ़ने में मदद करते हो। तुम्हारे आधार पर कल्पनाओं के अश्व विचरते हुए दूसरों की जीवनी में जो न हुआ, उसका भी साक्षात्कार कर लेते है।
इंतजार, एक्साइटमेंट और इर्रिटेशन का सफर
एक इंतजार की घड़ियां भी तो होती है.. कब तुम जाओ, और वह ऑनलाइन आए..! इस दौरान बार बार व्हाट्सप्प बेचारा चालू-बंद होते रहता है। कईं बार यह इंतजार क्रूर लगता है, तो मेरे जैसे लोग सीधा फ़ोन कर देते हैं, कि व्हाट्सप्प पर कुछ भेजा है, चेक करो। और फिर तुरंत व्हाट्सप्प खोलकर देखते हैं, लास्ट सीन को ऑनलाइन में तब्दील होते हुए।
वैसे जब तक तुम मौजूद होते हो, एक उम्मीद सी बंधी रहती है, "अभी तक ऑनलाइन थे, शायद बात हो जाएगी।" यूँ समझो न कि एक उत्साह रहता है। धीरे धीरे जैसे जैसे समय बढ़ता है, तुम अपना समय अपडेट करते रहते हो। जहाँ पहले वो "लास्ट सीन 2 मिनट्स एगो.." होता था, वह अब "लास्ट सीन 20 मिनट्स एगो.." दिखाने लगता है, तो एक इर्रिटेशन होने लगती है। इस पर तो बरनोल भी काम नहीं करता। लेकिन समय के साथ साथ एक स्वीकार्यता भाव आने लगता है, कि "खैर, उनके पास और कोई महत्वपूर्ण काम होगा।"
समस्या लास्ट सीन में नहीं, अपेक्षाओं में थी
और फिर एक समय यह भी आता है, कि समदृष्टि आ जाती है, "ऑनलाइन" है, या "लास्ट सीन.." कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें जो कहना था, हमने कह दिया। प्रत्युत्तर की त्वरित आशा उत्पन्न नहीं होती।
प्राइवेसी या संभावनाओं की कैद?
धीरे धीरे मन खुद को समझाने लगता है, समस्या लास्ट सीन में नहीं थी, अपेक्षा (एक्सपेक्टेशंस) में थी। अपनी और से जो अपेक्षाएं थी, वे खरी उतरी, न उतरी, उसका दोष तुम्हे कैसे दिया जा सकता है? तुम तो सामनेवाले की स्थिति दर्शाने का साधन मात्र हो। और तुम तो बल्कि सच बताते हो। और तुम्हे सच बोलने की सजा मिलती है। तुम्हे प्राइवेसी के नाम पर क़ैद कर लिया जाता है। वह सिर्फ लास्ट सीन को ही नहीं छिपा रहा होता है, वह समग्र अपेक्षाओं और संभावनाओं को भी छिपा लेता है.. प्राइवेसी के नाम पर।
खैर, तुम एक समय थे, मैंने तुम्हे यह खत लिखकर तुमसे जुडी बहुत सारी बातों को भी खरी-खोटी सुना दी। मैं अगर मेरी ही बात करूँ, तो मेरा तो सिस्टम ही उल्टा है, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, तुम्हारे द्वारा मेरी क्या राय गढ़ी जाती है। मुझे तो जब मेरी आलस मौका देती है, तभी किसी को प्रत्युत्तर देता हूँ। हाजिर हूँ तो तुरंत, वर्ना इच्छा हुई तो.. प्रत्युत्तर देना कभी भी अनिवार्य नहीं रहा है। लोगों को एक आशंका में रखना भी मजेदार काम है।
शुभरात्रि।
१८/०५/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
तो यह पत्र शायद आपको थोड़ा ज्यादा अपना लगेगा…”
Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:

