नीलोत्पल मृणाल का यार जादूगर समीक्षा : गाँव, रहस्य और दर्शन का अनोखा मिश्रण

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यार जादूगर Book Review in Hindi


गाँव की चारपाई पर बैठा एक युवक ‘यार जादूगर’ पुस्तक पढ़ते हुए – cartoon illustration

    प्रियम्वदा !

    पिछले कुछ दिनों से एक स्थिरता पाकर एक उपन्यास पढ़ने में मन को बार-बार प्रवृत करता, लेकिन मन बांधे बंधता कहाँ है? उसे तो भटकने का वर प्राप्त है। या फिर शाप? पता नहीं। पिछले कईं दिनों से लिखने की प्रवृति से भी दूर ही था। एक दिन मन किया, ३-४ पत्र लिखकर शिड्यूल कर दिए। भावावेग का लाभ इसी तरह उठाया जाना चाहिए। ताकि जब मन अस्थिर हो, और लेखन की दिशा धुंधली दिखती हो, तब यह प्रेस्सर न उठे कि ब्लॉग पर प्रकाशित करने को कुछ है नहीं। 


नीलोत्पल मृणाल का ‘यार जादूगर’ कैसा उपन्यास है?

    खैर, इस बार फिर से हाथ लगा उपन्यास नीलोत्पल मृणाल का था, डार्क हॉर्स तथा औघड़ पढ़ने के बाद यार जादूगर इनकी तीसरी किताब थी। इसके बाद एक और है, विश्वगुरु, वह अभी पढ़नी बाकी है। कल-परसो ही उनकी एक रील आयी थी, जिसमे बता रहे थे, कि उनकी पांचवी किताब भी बहुत जल्द आने में है। बात करूँ अगर यार जादूगर की, तो मैं हैरान हूँ, कि इस उपन्यास में नीलोत्पल ने क्या छोड़ा है? मतलब, राजनीति, वर्तमान भारत, अध्यात्म, दर्शन, सब कुछ ही समेट लिया है। 


  • पुस्तक : यार जादूगर 
  • लेखक : नीलोत्पल मृणाल
  • प्रकाशक : हिन्द युग्म
  • प्रथम संस्करण : अक्टूबर 2021
  • पन्ने : 240


गाँव, रहस्य और व्यंग्य से भरी कहानी

    शुरुआत औघड़ जैसी ही लगी। एक गाँव, और गाँव के कुछ लोग। गाँव का अंदाज़, गाँव का वातावरण, और एक थाना। एक बूढ़ा, जो मृत लोगों को जीवित करता है। सारी ही कहानी यहीं, इन्हीं लोगों के आसपास थी। लेकिन कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वहां आता है एक रहस्य। मृत्युलोक से परे का रहस्य। एक दर्शन, और थोड़ा अध्यात्म। ज्ञानी बातें, और गाँव के भोले-अनपढ़ लोगों का विश्वास, ईश्वर पर, प्रकृति पर, और कर्म पर। 


उपन्यास में अध्यात्म, राजनीति और दर्शन

    जातिवाद भी है थोड़ा बहुत.. जातिवाद से मेरा मतलब है जाति व्यवस्था पर किया हुआ व्यंग्य। औघड़ में भी था। इसमें भी है। ईश्वर और आस्था को भी लेखक ने बहुत अच्छे से सम्मिलित किया है। मुझे वह वाकिया भी बड़ा मजेदार लगा, जब सुन्दर बार बार मैत्री और सहानुभूति के भाव तले, फूलचंद का खेत खरीदने का प्रयास करता है। वह घटना भी भावविभोर कर देने वाली है, जब जयप्रकाश के माता-पिता - अवध नारायण सिंह और कौशल्यादेवी अपने पुत्र को आखरी विदाय देतें हैं। 


नीलोत्पल मृणाल की लेखन शैली

    भाषा काफी ज्यादा व्यंग्यात्मक लगी मुझे। वर्तमान परिस्थतियों, सरकार पर भी व्यंग्य है। लेकिन कईं बार ऐसा भी लगा, कि कभी तो यह उपन्यास बिलकुल ही आज़ादी के पश्चात वाले भारत में ले जाता है, तो कभी अभी - इसी समय के भारत की बात हो रही है। यह थोड़ा संशय पुरे उपन्यास के दौरान बना रहा। कहानी बहुत अच्छी है। कहानी का प्रारम्भ ही सबसे मजेदार लगा मुझे, खासकर विवरण। 


मुझे इस उपन्यास में क्या सबसे अच्छा लगा?

    नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास यार जादूगर के कुछ अंश यहाँ समाहित करता हूँ, मुझे बहुत सारे संवाद और वाक्य पसंद आए थे, पर सबको ही यहाँ लिखता तो हिन्दयुग्म वाले केस-वेस का झपट्टा मार लेते..

  • "यह भी क्या अजब-गजब बात थी, कि मूँछ स्त्रीलिंग थी और पुरुष उसका प्रदर्शन कर मर्दानगी दिखाता था।"
  • "मानव अपने-अपने कर्मों का चलता-फिरता स्वर्ग-नरक दोनों है। मनुष्य को इसे भोगने कहीं नहीं जाना होता बल्कि इसे भोगकर जाना होता है।"
  • "पैसे में पृथ्वी से ज्यादा गुरुत्वाकर्षण और अप्सरा से ज्यादा आकर्षण होता है।"
  • "पैसा और जबान, क्रोध से उबरकर शांत हो जाने के बाद ही खर्च करने वाली चीज है।"


    मुझे यह पुस्तक पूरा करने में लगभग छह से सात दिन लगे। यूँ तो काफी खाली समय था मेरे पास, पर मन मेरे पक्ष में न था। कभी यहाँ तो कभी वहाँ इतना दौड़ा है, रील्स, यूट्यूब, गेम्स, और नौकरी.. थोड़ी सी ओवर-थिंकिंग भी। सारा समय इन्ही सब में बीता। जब बुक लेकर पढ़ने बैठता, तो कोई न कोई भटकाव बहा ले जाता अपने विषय वस्तु में। फिर तो यह पन्ने अनपढ़े पड़े रहते। ध्यानभंग होते ही अनावश्यकता जकड़ लेती। इच्छा तो पूरा पुस्तक सतत पढ़ते रहने की होती, क्योंकि रसप्रद है यह उपन्यास। और हाँ ! यह पुस्तक गंभीर होकर पढ़ने लायक है। 


    यार जादूगर में मैंने ऊपर कुछ अंश दिए, वैसे ही बहुत सारे जोरदार संवाद और वाक्य है, जिन्हे पढ़कर कईं देर तक मन सोचने को विवश रहता है। उस लिखे हुए वाक्य से आगे का विश्व खंगालता है। और फिर मन अपने पथ से हटकर फिर और ही किन्ही विषयों पर इतना ज्यादा भ्रमण कर आता है, तब थोड़ी थकान भी अनुभव होती है। नीलोत्पल की शैली आकर्षक तो है। पाठक को बांधे रखने के लिए पर्याप्त व्यंग्य और कथावस्तु है उनके पास। पर भी यह उपन्यास एक रूचि पर निर्भर है। विषयों की रूचि। 


क्या ‘यार जादूगर’ पढ़ना चाहिए?

    वैसे सच बताऊँ, तो मुझे अध्यात्म की बातों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। आत्मा, देह, लोक, उन्नति.. यह सब बातें मुझे अनाकर्षक लगती है। उबाऊ भी। मैं मानता हूँ भोग में, विलास में। मुझे लगता है, एक ही तो जीवन मिला है, क्यों न यहीं स्वर्ग का निर्माण किया जाए। स्वर्ग में भोग-विलास ही तो मिलने हैं.. फिर यहीं क्यों नहीं? अगले जन्म में क्या पता चींटी बनूं? किसी के पैरों तलें रौंद दिया जाऊं। क्या पता कोई कर्म फल ऐसा रहा हो जिसमे सूअर की गति मिले। स्मृति तो नए जीवन के साथ नई होती हैं न। 


    खैर, इस उपन्यास के अंत में आत्मा, मृत्यु, और जीवन की बड़ी ही सरल व्याख्याएं दी है। जिन्हे इस विषय में रूचि है, उन्हें तो मजेदार लगेगा। और हाँ, वह बूढ़ा आखिरकार कौन था, वह रहस्य भी उपन्यास के अंत में ही खुलता है। और वहीँ यह सारी आध्यात्मिक बातें भी हुई है। पुरे उपन्यास में सबसे मजेदार बात भी यही है, कि एक भय, रहस्य, हास्य-विनोद और व्यंग्य बना रहता है। 


    शुभरात्रि।

    १४/०५/२०२६ 


|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

    अगर आपने यार जादूगर पढ़ी है, तो आपको इसका कौनसा भाग सबसे ज्यादा पसंद आया? और नीलोत्पल मृणाल की कौनसी किताब अगली पढ़नी चाहिए? 

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FAQ

यार जादूगर किस विषय पर आधारित उपन्यास है?

यह उपन्यास गाँव, रहस्य, व्यंग्य, राजनीति और अध्यात्म जैसे विषयों को साथ लेकर चलता है।

यार जादूगर के लेखक कौन हैं?

नीलोत्पल मृणाल इस उपन्यास के लेखक हैं।

क्या यार जादूगर beginners के लिए अच्छी किताब है?

यदि आपको व्यंग्य, ग्रामीण परिवेश और दार्शनिक विषय पसंद हैं, तो यह उपन्यास रोचक लग सकता है।

यार जादूगर में सबसे खास क्या है?

इसकी भाषा, व्यंग्य, रहस्य और आध्यात्मिक चर्चा इसे अलग बनाती है।


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