हकीकत की भावनाएँ और समय पर न कहे गए शब्द
प्रियम्वदा !
हकीकत में हमें जिस समय जो भावना मन में उठ रही हो, उसे तत्काल व्यक्त कर देना चाहिए। लेकिन हर बार, हर प्रसंग में यह होता नहीं है। और वह भावना कुछ समय बाद व्यर्थ हो जाती है। यादों के पिटारे में क़ैद हो जाती है। कुछ दिनों तक मन में विद्रोह करती है, लेकिन फिर शांत हो जाती है। ऐसा ही कुछ लेखनी का है, मन में आता है, तब लिख लेना चाहिए.. क्योंकि बाद में वह उफान जब शांत हो जाता है, तो ठीक उसी समय जैसा भाव फिर से नहीं लौटता।
एकतरफा पत्राचार और मन की लूट
आज गजे को पता नहीं क्या सूझी, कहता है, चलो माउंट आबू चलते है। अभी भाव सुने है.. मध्य गुजरात पूरा ही वहां पड़ा होगा आज। जैसलमेर के रुझान आते दिख ही रहे है। जर्जर इमारतों में होटल के कमरे के दस हजार चूका रहे है लोग। पिक सीजन के नाम पर खुली लूट चलती है। वैसी ही लूट जैसी तुमने मचाई है, मेरे हृदय में। भावों की। तुम और तुम्हारे प्रत्युत्तर मुझ तक पहुँचते कहाँ है.. यह एकतरफा पत्राचार सतत एक वर्ष से निरंतर चालु है।
बीती रात गरबि चौक में कुछ देर अकेले बैठकर कुछ पंक्तियाँ लिख पाया था। आजकल कुछ पंक्तियों में शब्दों को भर पा रहा हूँ। शायद तुम्हारी मेहरबानी मानूं इसे..? और तो और मेरे उन तीस खतों में से आज पचीसवाँ खत भी तुम्हे लिखा है। सवेरे ऑफिस पहुंचा तब दोपहर तक तो बिलकुल ही निकम्मा था मैं। अरे मतलब कोई भी काम नहीं था, या कामों की सूची में अनिवार्यता के समकक्ष नहीं पहुंचा था। एक तो मेरी यह कामों को अनिवार्यता की सीमा तक टालने की आदत किसी दिन मुझे बुरा फंसवायेगी। मैं जानता हूँ, लेकिन फिर भी कामों को टालना, जैसे धर्म बन गया है।
गुजरात, व्यवस्था और भीतर का विद्रोह
आज भी गुजरात के हर शहर में पुलिसबल लोगों से फूंक मार-मारकर चेक करता पाया गया, कि अगला पीया हुआ है या नहीं। कईं पुलिस वालों ने रील्स बनायीं है। पिए हुए लोगो को पकड़ने की। मैं सोच रहा था, कि क्या यह एक नाटक नहीं है? अगर पीने वालों को पकड़ रहे हो, तो बेचने वालों को क्यों नहीं पकड़ते? कोई कुछ कहता नहीं, लेकिन हर कोई जानता है, कि पुलिस में भर्ती होने के बाद परिवार का विकास कितना होता है.. हकीकत में कटेगा तो बटेगा वाला हाल है। लोगों में आक्रोश इस हद तक है, कि पुलिस के बदले लोग खुद जनता रेड करने लगे थे। मुझे लगता है, पुलिस वालों को पीने वालों के बदले बेचने वालों को पकड़ना चाहिए।
एक और रसप्रद केस पढ़ने में आया। गुजरात में प्रसिद्द शक्तिपीठ है, अम्बाजी। गब्बर पर्वत पर स्थित यह शक्तिपीठ किसी समय पर दांता राज्य के क्षेत्र में आता था। इस शक्तिपीठ पर दांता राज का अधिकार था। लेकिन लोकशाही की चाल देखिये, कुछ दिनों पूर्व हाई कोर्ट ने फेंसला सुनाया। नवरात्री की अष्टमी को दांता राज परिवार को हवन और पूजा पाठ करने का अधिकार नहीं दिया। मतलब हाई कोर्ट करना क्या चाहती है? किसी समय पर तुम्हे कुछ सौंपा था, और आज तुम उसे देखने तक नहीं दोगे? क्या होता अगर उस समय दांता का राजपरिवार इस तीर्थ क्षेत्र को अपनी निजी संपत्ति में समाहित कर लेता। दांता राज ने माँगा क्या था, बस हवन करने का अधिकार.. वह भी हाई कोर्ट से नहीं दिया गया..! इन्ही कुछ कारणों से राजपूतों में वर्तमान व्यवस्था से अविश्वास होने लगता है।
2025 की यादें: महीने दर महीने जीवन का लेखा
खेर, आज ग्रेगोरियन कैलेंडर का आखरी दिन है। 31 दिसंबर 2025, मौसम को भी आज ही करवट लेनी थी.. सवेरे मौसम काफी धुंधभरा था। आज कईं आसपास के क्षेत्रों में बारिश हुई है। क़ुदरत भी तुम्हारी ही तरह समझ में नहीं आता प्रियम्वदा। यह वर्ष मेरे लिए तो बस आया और गया ही है। हाँ ! इस वर्ष में मैंने समस्याएं खूब झेली है। हर कोई झेलता है। और हर किसी को अपनी समस्या विशेष याद रहती है। क्योंकि मेरे दृष्टिकोण में हर किसी का जीवन निराशा से भरा हुआ है, खुशियां बस उस निराशा के अँधेरे में बिजली की चमक भर की होती है। इसी कारण से निराशा, दुःख या पीड़ा हमें अक्सर याद रहती है, और खुशियां भी.. क्योंकि बिजली चमकती है, और गरजती भी है।
जनवरी से अप्रैल – शुरुआत, उत्साह और पहली आग
आज जब इस पुरे 2025 को याद करने में लगा हूँ, तो मुझे याद आता है, जनवरी महीने उत्साह था। दिलायरी के शुरू होने का। एक वर्ष तक प्रतिदिन, एक डायरी लिखने का मैंने निर्धारित किया था। और जनवरी से मैंने पकड़ जमा ली थी। प्रतिदिन कुछ लिखना आसान कहाँ है.. तो शुरुआती महीने बहुत छोटी दिलायरी हुआ करती थी। बस दिनचर्या मात्र। महाकुम्भ जनवरी में आयोजित हुआ था, और मैंने महाकुम्भ में जाने का निर्णय तो लिया था, लेकिन परिस्थतियाँ मुझसे विपरीत चली थी। गाँव गया था, एक शादी में समाहित होने.. और रात को सिंह की दहाड़ बड़ी करीब से सुनी थी।
फरवरी में पत्ते की शादी में मैं राजस्थान गया था। अलग रिवाज़, अलग संस्कृति की झलक लिए मैं लौटा था। साथ ही जयपुर दर्शन भी। फरवरी में ही मैंने एक बार नाईट ड्राइविंग की थी, और रास्ते में दो-तीन जगह भारी धुंध का सामना हुआ था। नविन अनुभव था, काफी ज्यादा रोमांचक। मार्च में भारत ने ICC वर्ल्डकप जीता था। और मार्च में ही पाकिस्तान में एक पूरी ट्रैन ही हाईजैक हो गयी थी। मार्च में ही मैं एक बाइक-रोडट्रिप के लिए प्लानिंग भी कर रहा था। अप्रैल के पहले ही दिन, मैं जहाँ काम करता हूँ, वहां एक बड़ी आग लगी थी। करोडो की किम्मत की लकड़ियां जलकर राख में तब्दील हो गयी थी। पुरे दो दिन तक वह आग जलती रही थी।
अप्रैल में प्रियम्वदा का पत्र मुझे खूब पसंद आया था। हालाँकि मैंने ही लिखा था। गुजरात के किलों को सम्मिलित करती मेरी एक कंटिन्यू पोस्ट आज भी पूरी नहीं हुई है। अप्रैल में पहली बार मैंने किसी सरकारी अस्पताल में कदम रखा था। कुंवरूभा के टंग-टाई के ऑपरेशन के लिए। अप्रैल में ही पहलगाम हमला हुआ था, और मेरा तो बसेरा ही सीमावर्ती जिले में है। कच्छ से पाकिस्तान कितना दूर है?
मई से अगस्त – लेखन, स्वास्थ्य और बदलाव
दिनांक 05/05/2025, मैंने अपने इस ब्लॉग को एक पर्मनंट एड्रेस दिया, www.dilawarsinh.com नाम से डोमेन खरीदा और यह डेली ब्लॉग, या मेरा शौकिया ब्लॉग एक वेबसाइट बन गया। मई में ऑपरेशन सिन्दूर हुआ था, और हरदिन ब्लैकआउट के अनुभव मैंने अपनी इस खुली डायरी में लिखे थे। मई में ही मैंने "प्रियम्वदा के पथ पर" नाम से एक ३० खतों की सीरीज़ शुरू की थी। आज तक पूरी नहीं हो पायी है। मई मैं ही 150 दिन पुरे हुए थे, इस प्रतिदिन की डायरी, जिसे मैंने "दिलायरी" नाम दिया है। और मैंने 151वाँ पत्र लिखा था, प्रियम्वदा को।
जून महीने में मेरे किशोरावस्था का प्रिय मासिक 'सफारी' बंद हो गया था। जून महीने में ही वह एयर इंडिया का विमान हादसा हुआ था। जून में वर्षा शुरू हो चुकी थी। उमस और गर्मियों से बेहाल हुआ था मैं। जून में मुअनजोदड़ो पढ़ी थी मैंने। जुलाई में तबियत से लड़ते हुए, मैंने चना से दोपहरिया युद्ध लड़ा था। जुलाई में मेरी अब तक की पसंदीदा पुस्तकों में शामिल हुई, "लद्दाख यात्रा की डायरी।" जुलाई में ही मैंने दिलबाग बसाया था। और वह ऊंटों वाला किस्सा कैसे भूल सकता हूँ। ऊंट दरिया तैर गए थे पूरा। जुलाई में ही मेरी गार्डनिंग पीक पर थी। 30 जुलाई को मैंने अपनी पहली ईबुक किंडल पर पब्लिश की थी।
अगस्त में वह भरी दोपहर में शौचालय की तलाश हमें पुलिस स्टेशन तक ले गयी थी। अगस्त में ही मैंने अपनी दिनचर्या में काफी बदलाव किए थे। तबियत ही मुख्य कारण था। अगस्त में गुजराती में निमित ओझा की सटोरी बुक पढ़ी थी मैंने। अगस्त में ही मैंने एक और गुजराती बुक "रण माँ खिलयु गुलाब" पढ़ना शुरू किया था, आज तक पूरी नहीं कर पाया। अगस्त महीने में मेरी लिखी कुछ पोस्ट्स पर रेगुलर से कईं ज्यादा व्यूज़ आए थे।
सितम्बर से नवम्बर – यात्राएँ, प्रेम और हादसा
सितम्बर मेरा प्रवास की तैयारियों में गुजरा था। दीपावली पर होने वाले प्रवास के चलते मैंने "प्रियंवदा के पथ पर" वाली सीरीज़ के कईं सारे खत लिखे थे। और सितम्बर में तो नवरात्री भी थी। उत्साह चरम पर था। हमने चालू बारिश में भी प्राचीन तरीके से खुद ही गाते हुए गरबा खेले थे। अक्टूबर में मुझे याद है, मेरा वह प्रवास कैंसिल होने लगा था। गुजरात, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार से झारखण्ड तक का वह प्रवास था। लेकिन वह नहीं हो पाया, इस बात का रंज आज भी है मुझे। दिवाली आने वाली थी, और कईं सरकारी बाबू लोग दिवाली के पैसे मांगने आते थे। अक्टूबर में ही हमने वॉलीबॉल खेलना शुरू किया था।
दिवाली की ही रात को मैं और दो और ऑफिस के मित्र, महाराष्ट्र के तीनों ज्योतिर्लिंग की यात्रा पर निकले थे। भले मेरा वह झारखण्ड तक का सफर नहीं हो पाया, लेकिन यह महाराष्ट्र में त्र्यंबकेश्वर, भीमाशंकर और घृष्णेश्वर का सफर बड़ा ही मजेदार रहा था। और उस पुलिस वाले के साथ हुआ सत्संग भी हमेशा याद रहेगा। इसी अक्टूबर में मैंने महाराष्ट्र के महादेव को एक ईबुक का स्वरूप दिया, उसे वहीं किंडल पर पब्लिश किया। डायरी लिखने में और आत्मसंवाद के विषयों में सबसे अच्छा महीना नवंबर रहा है। इस नवंबर में मैंने बहुत सारे अलग अलग विषयों पर बाते लिखी है, प्रत्येक दिन एक अलग विषय, अलग मुद्दा। बस एक मुद्दा तब भी साम्यता पाकर बैठा था उन प्रत्येक दिलायरियों में। वह था, प्रेम और प्रियम्वदा तुम स्वयं। मेरी उन तमाम पोस्ट्स में सबसे अधिक जिस शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है प्रियम्वदा। फिर चाहे वह बिहार की राजनीति हो, जुवार का खेत हो, राजा प्रवीरचंद, जयसिंह या स्वस्तिक का इतिहास हो..
दिसंबर – मोहभंग, सिनेमा और शांति की चाह
इसी नवंबर का अंत आते आते मेरा एक्सीडेंट हो गया। तगड़ा एक्सीडेंट था, और हेलमेट के कारण मेरा बचाव हो पाया था। दिसंबर की शुरुआत ही मोहभंग से हुई थी। मैंने जो जो शौक पाले थे, उन तमाम से मेरा मोहभंग हुआ ही है। फिर कुछ निजी कारणों से मन का भी उदास होना, दिलायरी के पन्नों में भी उभरा। दिसंबर आधा बीता ही था, कि मैं अपने मानसिक तनाव से मुक्त होने के लिए फिल्मों की दुनिया मे चला गया। लगातार एक ही दिन में तीन तीन मूवीज देखी मैंने। अपने मन को इतना ज्यादा व्यस्त कर दिया था, कि और कोई ख्याल मन मे आकर बसे ही ना। अपने आप को सीधे रास्ते पर वापिस लौटाने के लिए मैं अक्सर ऐसे ही हथकंडे अपनाता हूँ। अपने मन को किसी ऐसी प्रवृति में सतत व्यस्त कर दिया जाए, कि और कोई विचारों के लिए उसे खाली समय मिले ही नही।
प्रेम की परिभाषा और प्रियम्वदा
प्रियम्वदा, इस एक वर्ष ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। मुझे लेखन की यह अमूल्य प्रवृति प्राप्त हुई, मेरे शब्दों को एक सीमा भी मिली। मेरी भावनाओं पर नियंत्रण करना मैं सीखा। मैंने अपने आप को बदलते देखा। प्रियम्वदा, मेरे प्रेम की व्याख्या तुम्हे पता ही है। प्रेम यानी आकर्षण, आवश्यकता और उत्तदायित्व। लेकिन मेरे इस वर्ष का अंत आते आते मैंने जाना, कि प्रेम है तो इन तीन स्वरूपों में ही, लेकिन इसका विस्तार मेरी उस परिभाषा से बहुत ज्यादा है। शुरुआत में मैं स्नेही से हमेशा कहता था, कि मुझे प्रेम की परिभाषा समझाओ.. लेकिन एक दिन मैंने पाया, कि मैं प्रेम का बखान करने लगा हूँ। मेरे शब्दों में प्रेम के लिए कभी सद्भाव नहीं हुआ करता था। मैं सदैव से उससे रूठा हुआ रहता था, मैं जानता हूँ, मेरे कुछ बन्धनों को यहां उल्लेखित नहीं कर सकता, लेकिन मैने जितना उस प्रेम को रेत की मुट्ठी सा भरना चाहा, वह उतना ही सरकता गया।
2026 से अपेक्षा: शांति, दृढ़ता और आत्मनियंत्रण
अभी अभी वॉलीबॉल खेलकर लौटा हूँ। पसीने से भीगकर इस वर्ष को बीतता देख रहा हूँ। सत्तावन मिनट्स बाकी है। आने वाले वर्ष से मैं क्या चाहता हूँ? स्नेही, मेरी प्रेरणा, मेरी प्रियम्वदा, मेरे शब्द, और सबका ही बेहतर स्वास्थ्य। स्नेही ने दिलायरी की नींव रखी, प्रेरणा ने सदैव मेरे शब्दों को दिशा दी। प्रियम्वदा ने हमेशा मेरे रुकते विचारों को आगे बढ़ाया, मेरे शब्दों ने साथ निभाया। वाकई, यह वर्ष कब बीत गया, किसी दिन मैं चाहता था, यह दैनिक दिलायरियों से मुक्ति। लेकिन फिर भी मैं हारे बिना लिखता रहा। एक वर्ष पूरा हो गया। 2026 से मैं चाहता हूँ, कुछ शांति.. बीते वर्ष में मनोमंथन का उत्पात मैंने खूब झेला है। मैंने अपनी सहनशक्ति का सम्पूर्ण उपयोग किया है। आने वाले इस नववर्ष में, मैं शांति चाहता हूँ। जानता हूँ, शांति का उद्गम भीतर से होता है। लेकिन वह भीतर का पथ बाहर के प्रसंगों से निर्माण होता है।
प्रियम्वदा, मेरी चाहत पूरी नहीं होती, लेकिन मेरे साथीदारों का स्नेह मैं सदैव चाहूंगा। 11:11 बज रहे है। मैं अब उन संकल्पों से तो ऊब ही चुका हूँ, जो वर्ष के आरंभ में तो साथ रहते है, मध्य में डगमगाने लगते है, और अंत तक तो भूले बिसरे हो जाते है। मैं मानता हूँ, दृढ़ निश्चय में, कटिबद्धता में। मैं इन्ही का पालन करना चाहूंगा। लेकिन मैं जानता हूं अपनी सुपरपावर, जिसे आलस कही जाती है। नववर्ष में, आलस का साथ मैं खुद छोड़ना चाहता हूँ। इसके लिए हथेली में जल लेकर किया गया संकल्प भी सिद्ध न होगा मेरा। यही एक आशा को मैं निराशा मानता हूँ। बाकी तमाम आशाओं में जरा सी भी संभावना तो होती है कम से कम।
प्रियम्वदा ! मैं चाहता तो हूँ, कि तुम सदैव यूँही मेरी बनी रहो, लेकिन फिर सोचता हूँ, भविष्य पर मेरा अपना अधिकार है कहाँ? किसी का भी नहीं रहा है। भविष्य को हम सोच सकते है, लेकिन उसका शत प्रतिशत निर्माण हमारे हाथों में नहीं होता। हम भविष्य की कुछ रेखाएं खींच सकते है। लेकिन फिर एक रेखा हमारे हाथ मे बनी होती है शायद.. जो हमारे कर्मों से निर्माणाधीन भविष्य की रेखा को भी लांघ जाती है। वर्ष 2025 की इस अंतिम दिलायरी में भी मैं यही तुलना कर रहा हूँ, कि तुम सिर्फ मेरे शब्दों में क्यों हो.. मेरे पास क्यों नहीं? मुझे पसंदगी की साम्यता चाहिए थी, लेकिन विपरीत दिशा में दिशाहीन दौड़ना पड़ रहा है। मैं आलस का आराधक, तुम पर निर्भर होकर, तुम्हारे आलिंगन में स्वप्न देखना चाहता था। लेकिन दोनों कंधों पर दुनिया के बोझ ढोना पड़ रहा है। मेरी मनोकामना थी, तुम्हारी कविताओं को अपनी लेखनी से डायरी में भरूँ, लेकिन स्याही की कालिख डायरी के पन्नो को लिखने लायक नहीं छोड़ती अब।
प्रियम्वदा,
ग्रेगोरियन कैलेंडर की इस अंतिम रात्रि में तुम्हारे ही स्वप्न का आकांक्षी।
शुभरात्रि।
३१/१२/२०२५
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
अगर यह दिलायरी आपको अपने बीते वर्ष की याद दिला गई हो, तो इसे साझा करें और अपनी प्रतिक्रिया शब्दों में छोड़ें। आपकी पढ़त ही इस लेखन की सबसे बड़ी संगति है।
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Aapko bhi nav varsh ki hardik shubhkamnaye shriman! ✨️
ReplyDeleteDhanywad..!
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