चुप रहने की आदत को पत्र
मेरी चुप्पी और बना हुआ व्यक्तित्व
प्रिय चुप रहने की आदत..
तुमने तो हमेशा ही कमाल बिखेरा है मेरे व्यवहार में। मेरे व्यक्तित्व को गूढ़ बना दिया है तुमने लोगों की नज़रों में। और मैं तो हूँ ही आडम्बर का उपासक। जब कोई मुझे थोड़ा बहुत जानता हो, और मेरी चुप रहने की आदत को देखता है, तो सोचता है, कि यह बहुत बड़ा ज्ञानी है। जितनी जरुरत है उतना ही बोलता है। और मैं मनोमन ही खुश होता हूँ.. अपने इस बने हुए प्रभाव पर।
चुप रहने का भ्रम : ज्ञान या आडम्बर?
खैर, मैंने तुम्हे धारण किया है, या फिर तुमने मुझे क़ैद डाला है, मुझे नहीं पता। मैं नहीं जानता, तुम मेरे लिए हितकारी हो, या नुकसानदेह। लेकिन मुझे तुम पसंद हो। एक नज़रिये से जब तक कोई कुछ बोलता नहीं है, तब तक वह एक महाज्ञानी है। बोल देने के बाद तो सुनने वाले व्यक्तित्व का निष्कर्ष निकालने लगते है। गुजराती में कहावत है, 'बाँधी मुठ्ठी लाख नी'.. मतलब, जब तक गुप्त है, तब तक कीमती है।
जगन्नाथ के प्रांगण की एक घटना
कल की ही बात है, क्या हुआ कि मैं जगन्नाथ के प्रांगण में बैठा था। दिनभर की आग पर संध्या थोड़ी सी ठंड फेरने का विफल प्रयत्न कर रही थी। कुछ बूढ़े लोग बैठे थे, बूढ़े अनुभव के धनी लगते थे। सारे ही रिटायर जीवनी वाले है, तो बस गप्पे लड़ाने के अलावा और कोई पुरषार्थ उन्हें करना नहीं था। ठहाके मारकर हँसते थे, तो लगता डूबते सूर्य को चिढ़ा रहे है कि, 'तू कितना ही जल, हम तो यूँही रहेंगे।'
फिर वह बूढ़े आपस में एक दूसरे की टांग-खिंचाई में लग गए। मेरा ध्यान पड़ा, एक बूढ़ा गुस्से में था। वह बहरा था, और दूसरे बूढ़े उसके बेहरे होने का मजाक बना रहे थे। वह बहरा बूढ़ा अपने कान में सुनने वाले मशीन को खोसे हुए था। बहरा क्या करता, वह अपनी भड़ास निकालता, और साथ ही अपने कान से मशीन निकाल लेता। मतलब उसे जो सुनाना था, वह सुना देता, और अपने सुनने की बारी आती तो मशीन हटाकर बहरा बन जाता। इस बात पर बाकी बूढ़े बड़े चिढ़े।
मैं चुप रहकर इन रिटायर बूढ़ों के बर्ताव पर गौर कर रहा था, और मैंने पाया, बहरे कितने भाग्यशाली है, उन्हें तो कोई भी नहीं सुना सकते। न लोग, न जीवन। हमें हमसे जुड़े हुए लोगों की कितनी सारी बाते - अच्छी-भली - सुननी पड़ती है। लेकिन बहरे को कोई कुछ नहीं सुना सकता। ऐसा ही एक 'चालू' बहरा मेरे पास काम करता था। वह क्या करता, उसके मतलब की बात हो, तब तो वह नॉर्मली सबकुछ सुन लेता। लेकिन जब उसकी कोई गलती हो, और डांट सुनने का अवसर आए, तब वह ऐसा दिखावा करता, कि जैसे वह होंठों को पढ़कर सुनने-समझने की कोशिश कर रहा हो।
चुप्पी के फायदे : बचाव और ऊर्जा
वैसे मैं तुमसे चिढ़ता नहीं हूँ, तुम मेरे लिए ठीक हो। क्योंकि मैं वाद-विवाद से दूर रहना चाहता हूँ। और तुम्हारे मेरे साथ होने के कारण कोई मुझसे विवाद करने में सक्षम नहीं रहता। चुप रहने का सबसे बड़ा लाभ यह है, की ऊर्जा बचती है। दूसरी बात, चुप रहकर घूरते रहने से सामने वाला प्रतिवादी और चिढ़ता है। वह अपनी अधिक ऊर्जा बर्बाद करता है। कईं बार चुप रह जाने से भी हम विजेता हो सकते है।
चुप्पी के नुकसान : छूटे हुए मौके
तुम मेरे जीवन में कब से बस गए हो, यह तो मुझे याद नहीं आ रहा है, लेकिन मैंने तुम्हे अपनी एक क्षमता के तौर पर ही लिया है.. तुमसे मुझे कईं लाभ हुए, मैं सारे बिनजरूरी विवादों से बचा हूँ। मैं बहुत सारे झगड़ों में उलझने से बचा हूँ। मैं उनमे से हूँ, जो झगड़ा होने पर या तो वह या तो मैं वाली श्रेणी में आते है। तुमने मेरे बहुत सारे अपशब्दों को भी अपनी आवाज़ न उठाने दी। और अगर बात करूँ तुमसे हुई हानिओं की, तो कईं सारे ऐसे मौके छूट गए, जहाँ मुझे अपने विचार प्रस्तुत करने थे। और कईं मौकों पर लोगों ने मुझे गलत समझा। मुझे कमजोर समझा। खैर, उनकी समझ पर मुझे कोई अफ़सोस नहीं है।
मैं बनाम मेरी चुप रहने की आदत
मैं अब बोलना चाहता हूँ, लेकिन अपनी बात को, अपने विचार को व्यक्त कैसे करना है, वह तरीका नहीं खोज पाता हूँ। लेकिन मैंने अपनी बातों को लिखना सीख लिया। हो तो तुम मेरी कमजोरी ही, लेकिन मैं उसे ही क्षमता की तरह पाल रहा हूँ। बिना बोले भी आवाज़ उठायी जा सकती है। लिखकर, सन्देश दिया जा सकता है, अपना मत रख सकता हूँ। प्रत्यक्ष हुए बिना, पत्र द्वारा, सुधार करवा सकता हूँ।
क्या हर जगह चुप रहना सही है?
तुम हमेशा जरुरी नहीं। कैसा होता अगर संसद में हो-हल्ला के बजाए, हर कोई चुप रहकर पत्रों का आदान-प्रदान करते। या फिर रणमैदान में कोई भी आवाज़ किए बिना शत्रु एकदूसरे को भाले-तलवार चुभोते। कैसा सुनाता फिर वह वीर रस का कवि अपनी कविता, किसी कवि सम्मेलन में। दुनिया में वक्तव्यों का अस्तित्व न होता, अगर हर कोई चुप रहना चुनता। कोई भी छींकता नहीं, चुप रहता। सबसे बड़ी हानि होती वैवाहिक युगलों की। स्त्री की किचकिच के लिए पति तरस जाता।
मैं कल भी एक इवेंट में जुड़ा था। वही ऑनलाइन मीटिंग्स। मैंने वहां भी चुप रहना सर्वथा उपयुक्त समझा। क्यों? क्योंकि मुझे आशंका थी, जिस विषय पर मुझे बोलना था, उसे तो मैं विषय समझता ही नहीं। वह मेरे लिए टाइमपास का साधन मात्र है। सिनेमा। बहुत कम बार ऐसा हुआ है, कि मैं सिनेमा से प्रभावित हुआ हूँ। खैर, गुजराती में एक और मुहावरा है, "न बोलवा मां नव गुण"
शुभरात्रि।
वही मैं, जो तुम्हारी कृपा से लिखता हूँ।
०४/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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