अनकही बातों का जन्म कैसे होता है?
प्रिय अनकही बात..
दुनिया में बहुत कुछ अधूरा है..! समंदर की गहराईयों का नक्शा अधूरा है। मानव मष्तिष्क का विज्ञान अधूरा है। मानव इतिहास का पन्ना अधूरा है। हर इंसान का काश अधूरा है। अरे २९ दिनों का तो चाँद भी अधूरा है। फिर तुम अधूरी रह जाओ, इसमें आश्चर्य की सम्भावना ही क्यों है? पर तुम्हे आदत है शायद खटकने की। तुम शांत सलिल में फेंके कंकर सी हो।
तुम केवल शब्द मात्र नहीं हो.. एक पूरा का पूरा भाव, अहसास हो। जो समय पर व्यक्त न हो पायी। तुम्हारी अभिव्यक्ति को नियंत्रित किया गया। भय के ही तो कारन.. भय एक अकेला होता, यह बहुरूपी है.. संबंध का भय, आबरू का भय, अस्तित्व का भय.. तरह तरह के भय प्रकटते है, और बात को रोक लेते है।
कुछ बातें कह देना जरूरी क्यों नहीं होता
तुम्हारा जन्म उस क्षण हुआ था, जब शब्द होंठों तक आकर वापस लौट गए थे। तुमने बहुत बार प्रकट होने की कोशिशें की थी, पर हर बार तुम्हे नियंत्रण में ला पाया। तुम्हारे प्रकट हो जाने भर से बहुत कुछ बदल जाता। तुम्हे जब जिह्वा का साथ न मिला, तब तुम आँखों में उतर आयी थी। आँखों से तुमने सारा बयान दिया था। पर आँखे कईं बार सब कुछ कहाँ कह पाती है? वे जब बहुत कुछ कहना चाहती होती है, तब उनपर भी एक तरल पर्दा गिर जाता है।
तुम हर बार आकर रूक गयी, कभी डरकर, कभी संकोच बनकर, तो कभी यह सोचकर कि, "अब कहने से क्या होगा..?" तुम कही न गयी, न लेकिन हमेशा के लिए बस गयी। अब जब भी, उसी जगह जाता हूँ, कहीं से भी उसकी खबर पाता हूँ, या फिर उसकी याद भी आ जाए, तो सबसे पहले तुम ही मेरे सामने उठ खड़ी होती हो, प्रतिपक्ष में से सवालों की गोलियां दागती हो, और मेरे पास सिवा छलनी होने के कोई समाधान नहीं होता है।
मौन का भी अपना शोर होता है
तुम्हे कहाँ पता होगा, तुम्हारा अप्राकट्य से अब वह स्थान मौन ने ले लिया है। मौन रहना, मौन दिखना। लेकिन कभी तो यह भी लगता है, कि उस मौन की अपनी आवाज़ भी कितनी ऊँची है, उस मौन के पास अपना एक शोर है। मौन का शोर बहुत ज्यादा तंग करता है। शायद तुम्हारे ही कारण यह मौन इतना शोर मचाता है। कईं बार हमे कुछ रिश्ते खो देने के बजाए, बदल जाने से ज्यादा डरते है।
वैसे भी हर बात कह देना जरुरी नहीं होता। कोई कोई बात अपने भीतर रख लेने से, वह एक मजबूत याद बन जाती है। सदैव हमारे साथ रहती है। उस व्यक्ति का काल्पनिक विकल्प बनकर। यह एक अनुभव का विषय है, जैसे सबकी अपनी सच्चाई होती है, जैसे सबका अपना निदान। अब तुम एक खेद नहीं, एक सच्चाई हो। मेरे हिस्से की एक अधूरी कहानी..
शायद कह देता तो मन हल्का जरूर हो जाता, लेकिन फिर आज इस पत्र का अस्तित्व कहाँ होता? शायद किसी और स्मृति में.. शायद किसी और शब्दों के साथ.. तुम्हे कहना रह गया, यही तुम्हारी आज की पहचान है।
शुभरात्रि।
१८/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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