प्रिय खाली वक़्त | एक आलसी इंसान की खाली समय से बातचीत | Hindi Literary Letter

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प्रिय खाली वक़्त

    प्रिय खाली वक़्त,

    तुझे तो केवल प्रिय कह देने से कैसे चल सकता है.. तू तो मेरा पसंदीदा है..! तुझे मैं लिंग में नहीं बाँट सकता। तू सबके पास होता है, और सब ही तेरा सदुपयोग ही करते होंगे.. सिवा मुझ जैसे आलसी के। देख मैं हूँ आलसी उसमे कोई शंका नहीं। मैं संभव हो तब तक तो आलस को त्यागता भी नहीं। और कईं बार तो मैं यह भी सोचता हूँ, कि काश दुनिया में ऐसा होता, कि खाना-खाने भी उठना न पड़ता। कोई ऐसी सिस्टम होती, एक गोली खाओ, पेट भर गया। एक गोली खाओ, नाहा लिया। वैसे फिर यह ख्याल भी तुरंत ही आता है, कि गोली खाने के लिए भी थोड़ी सी महेनत तो लगती ही है। 


Cartoon illustration of a person sitting at a desk writing a letter titled “Dear Free Time” on a plain white background, in a thoughtful and calm mood.

खाली समय और दुनिया

    शाम के पौने आठ हो रहे हैं। धीरे धीरे तुम्हारा साथ छूटता जा रहा है। तुम्हारी सौबत में देख पा रहा था, भागती हुई दुनिया को, भागते हुए लोगों को, विकास की रेल को, ढलते सूरज को, और उगते अँधेरे को। तुम्हारी सौबत में लिख पा रहा था मैं, उन तमाम लोगों को चिट्ठियां, जिन्हे मैंने कभी प्रत्यक्ष नहीं पाया है। तुम्हारी सौबत मुझे मुझसे मिलाती है, मेरे शब्दों से, किताबों से, और कभी कभी खालीपन से भी। 


खाली समय या व्यस्त समय?

    वैसे मैं अभी सोच रहा था, कि अगर मैं अपने मित्रों के साथ हूँ, तो क्या मेरे पास खाली समय कहा जाएगा, या फिर वह व्यस्त समय है? मित्रों से मिलना भी अब तो खाली समय और स्वार्थ के अधीन है। अगर मैं कोई किताब पढ़ रहा हूँ, तब क्या मेरे पास खाली समय है, या फिर मैंने किताब पढ़ने में खाली समय को खर्च दिया? रील्स स्क्रॉल करते हुए खाली समय जल्दी ख़त्म क्यों जाता है? या फिर वह खाली समय था ही नहीं?


खाली समय एक मेहमान है

    कभी कभी मुझे लगता है, तुम मेहमान हो। आज वाला मेहमान तो फोन करके पूछता है, तुम पहले वाले मेहमान हो। जो अचानक से आता है। बिना दरवाजा खटखटाए। हक़ से। जैसे मेहमान अपने साथ सौगादें लाते थे, तुम यादें लाते हो, और कमरें को पुरानी आवाज़ों से भर देते हो। कमरा फिर खाली नहीं रहता, खालीपन भी खाली नहीं रहता। वह सब कुछ भर जाता है, जैसे अगत्स्य के समुद्रपान के पश्चात भर गए थे सातों महासागर।


मोबाइल युग और खालीपन

    तुम्हे तो यह घड़ी भी नहीं दर्शा सकती, कि तुम हो कहाँ? तुम वहां मिलते हों, जहाँ कोई नोटिफिकेशन्स नहीं होती। मोबाइलयुग में तुम इतने करीब हो कर भी बहुत दूर बसते हो। पर फिर तुम्हारे आते ही लोग सबसे पहले मोबाइल को ही पकड़ते हैं। तुम द्योतक हो। तुम सूचित करते हो, कहाँ-कहाँ मुझमे क्या क्षतियाँ है, और क्या क्या मेरी क्षमताएं है। तुम संशोधन का साधन हो - तुम्हारी सहायता से मेरे भीतर का इंजीनियर जाग जाता है, और पंखों की कोइल तक खोल लेता है। फिर भले ही उसे वापिस जैसे थे की स्थिति में न ला पाऊं।


तुम चिढ़ाते हो बहुत हो यार। क्योंकि खाली समय में लोग उसे सबसे ज्यादा याद करते है, जिन्हे दिनभर में भूलने की कोशिश करते रहते हैं। तुम साथ होते हों, तो घड़ी की टिकटिक गिनी जा सकती है। तुम साथ होते हो, तो एक किलो चावल में कितने दाने है, वह गिनती की जा सकती है। आखरीबार लोगों ने कोरोना की उपस्थिति में ही तुमसे सामूहिक साक्षात्कार किया था। 


किताबें, सोशल मीडिया और मैं

    नौकरी करते हुए जब भी तुम टकराते हो, आजकल मैं अपने इस ब्लॉग के लिए शिड्यूल पोस्ट्स लिख लेता हूँ, और बाकी बचा हुआ समय बुक्स पढ़ने में व्यतीत करता हूँ, जैसे आज की ही बात ले लो.. आज सवेरे थोड़ा बहुत काम था, वह निपटा लेने के बाद तुम ही तुम थे मेरे पास.. ब्लॉग की डिजाइनिंग वगैरह सीखी। chatgpt भी आजकल शिक्षक का काम कर लेता है। html और java की कोडिंग जो मुझे डिप्लोमा वाले न सीखा पाए, वही कोडिंग आज chatgpt फ्री में कर देता है। 


    इसी पत्र के अंत में एक ब्लॉक ऐड किया है, वह chatgpt द्वारा बनाए कोड का नतीजा है। फ़िलहाल सोचा एक किताब इंतजार कर रही है, डाउनलोड में पड़ी पड़ी, उसे न्याय दूँ, लेकिन याद आया, यह खत भी तो दो दिनों से ड्राफ्ट्स में अधूरा पड़ा है। अरे हाँ.. लगे हाथों तुम्हे एक बात और बता दू। आजकल बचा हुआ समय इंस्टाग्राम पर पोस्ट्स करने में भी व्यतीत करता हूँ। 


    नीलोत्पल मृणाल की तीन किताब पढ़ी है मैंने। और चौथी 'विश्वगुरु' मुझे मिली नहीं है। तो उन तीनों बुक की समीक्षा के कुछ अंश इंस्टाग्राम पर भी डाले थे। तो उस पर नीलोत्पल का भी लाइक आया। मतलब एक तरह से उपलब्धि भी है, और नहीं भी। नहीं इस लिए, क्योंकि आजकल प्रत्येक लोग सोशल मीडिया पर होतें ही है। तो एक लाइक आ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। पर अच्छा लगता है, जिसकी बुक पढ़ी हो आपने, और उससे एक छोटी सी मुलाक़ात हो जाए। और हाँ ! लगे हाथों नीलोत्पल को मेसेज भी कर दिया, कि "भाईसाहब 'विश्वगुरु' बुक भेज दो, फ्री में मिली हुई चीजों का मजा ही अलग होता है..!"


    खैर, अब इस पत्र को यहाँ समाप्त करतें है। मुझे अब एक और पुस्तक भी पढ़ना है। 

    शुभरात्रि,

    १९/०५/२०२६

|| अस्तु ||


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